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Saturday, June 6, 2020

झुुसिया दमाइ

झूसिया दमाई : कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की जीवंत कड़ी

झूसिया दमाई : कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की जीवंत कड़ी
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बस्कोट (नेपाल) में जन्मे झूसिया दमाई (जन्म: 1910, मृत्युः 16 नवम्बर 2005) जितने नेपाल के थे उतने ही भारत के भी और जितने भारत में फैले हैं उतने ही नेपाल में भी. उनकी रिश्तेदारी, जाति-बिरादरी दोनों देशों में समान रूप से है. स्वयं उनके कुछ विवाह भारत में हुये तो कुछ नेपाल में. उनके कुछ ‘गुसाँई’ भारत में हैं तो कुछ नेपाल में. उनकी कुछ जमीन नेपाल में हैं तो कुछ भारत में. वह रणसैनी मन्दिर (नेपाल) के खानदानी दमुवाँ-वादक और वीरगाथा- गायक थे तो ढूंगातोली (भारत) में वह मन्दिर में जाकर ‘द्योल’ (नौबत) बजाते, चैत के महीने में घर-घर जाकर ऋतुरैण गाते/सुनाते थे-
जो भागी जी रौलो सो ऋतु सुणलो.
जो पापी बड़न्छ कहाँ ई सुणन्छ रीत्यो.
द्विय दिन का ज्यूना म भलो नै बोलनू,
गिड़ला ऊँछी पलती भड़ पाय बिन्दी की बिनती,
कै भाँती करी हालछा साबा सर्द की.

(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
(इस ऋतु में मैं हर वर्ष यह कथा तुम्हें सुनाऊँगा. कि भाग्यवान, पुण्यवान लोग इसे सुनेंगे. इस दो दिन की जिन्दगी में बोल-वचन ही तो रह जाते हैं आदमी के.)
यद्यपि झूसिया की बोली प्रचलित कुमाउँनी से कुछ भिन्न है. इस पर भी जब वह गाते थे तो शब्दों का संगीतमय तथा लयात्मक उच्चारण जटिलता को और बढ़ा देता था. किन्तु जब हम थोड़ा-सा गौर से उनकी मौखिक परम्परा को समझने की कोशिश करते हैं, उसे तत्कालीन ऐतिहासिक सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हैं, तो झूसिया धीरे-धीरे समझ में आने लगते हैं.
Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand
रणसैनी नेपाल में वीरगाथा गाते झूसिया
दरअसल ‘लोक-थात’ की मौखिक परम्परा में वीरगाथा गायन ‘झूसिया’ का खानदानी पेशा था. सामान्यतया ‘ऋतुरैण’, जो कि भाई बहिन के स्नेहिल और वेदनापूर्ण उदास कथानक पर आधारित है और जिसे सुनकर आज भी माँ-बहिनें अनायास ही रुआंसी हो उठती हैं या रो पड़ती हैं- ऐसे कथानक भी ‘झूसिया’ वीरगाथा के अंदाज में ही गाते-सुनाते थे. इसलिये ‘झूसिया’ वीरगाथा गायक थे. वह जो कुछ गाते थे, उसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा था. उनके पिता ‘रनुवां दमाई’ और उनके अन्य पूर्वज भी गाथा-गायन, दमुवाँ-वादन ही किया करते थे. झूसिया की दोनों पत्नियाँ ‘सरस्वती’ और ‘हजारी’ उनके साथ ‘ह्योव’ भरतीं ‘भाग’ लगाती थीं. अभिप्राय यह कि झूसिया जो कुछ गाते थे वह उनकी परम्परा-परिपाटी रही. इसलिये उसमें तत्कालीन कुमाऊँ और नेपाल का सम्मिलित इतिहास, भूगोल, समाज व्यवस्था, आर्थिक-राजनैतिक दशा, धार्मिक- सांस्कृतिक मान्यताएँ सभी कुछ सन्निहित है.
बस्कोट, रणसैनी, पुजारागाँव-झूसिया जहाँ जन्मे, पले और बड़े हुये तक पहुँचने के लिये पिथौरागढ़ से जाना होता है झूलाघाट. फिर सीधी चढ़ाई (पैदल मार्ग) पहुँचाती है रणसैनी के पास कच्चे मोटर मार्ग में. जिस पर अभी जीपें ही चलती हैं. बैतड़ी से नेपाल के अन्य स्थानों के लिये ‘गोठलापानी’ से बसें मिलती हैं. ‘गोठलापानी’ की चोटी पर है ‘गढ़ी’. पश्चिमी नेपाल का यह क्षेत्र नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री लोक बहादुर चंद का भी इलाका है. यहीं जन्मे थे राजशाही के खिलाफ लोकतंत्र के समर्थक शहीद दशरथ चंद और यहीं जन्मे इन ‘चन्दों’ की, इनके पूर्वजों की वंशावली जानने-सुनाने वाले झूसिया दमाई.
यहीं पर मैं याद करना चाहता हूँ ‘झूसिया’ के बड़े बेटे चक्रराम दमाई को जो गीत और नाटक प्रभाग नैनीताल में कलाकार थे और जिन्हें ‘झूसिया’ के साथ गाते-बजाते-नाचते हमने देखा-सुना है. चक्रराम दमाई कई अर्थों में ‘झूसिया’ के टक्कर के ही नहीं बल्कि उनसे आगे के थे- खास तौर पर ढोल वादन में. दुर्भाग्यवश वह पहले ही चल दिये.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
हाँ, तो हम फिर आ जाते हैं ‘झूसिया’ पर. झूसिया माने-सामन्ती मानसिकता लिये वर्तमान के द्वंद्वों को बड़ी सहनशीलता और चातुर्य के साथ समरस करने वाला एक गपोड़’ व्यक्ति. ‘नोटों’ और विक्टोरियाई रुपयों की खन-खन से औरत खरीदने वाला व्यक्ति. एक मछली कम हो जाने पर या मछली खा लेने पर, औरत को घर से निकाल देने वाला व्यक्ति. और अपने जीवन की इन घटनाओं को गर्व से सुनाने वाला व्यक्ति. जीवन में पाँच शादियाँ करने वाला व्यक्ति, दो पत्नियों में बड़ी सहजता से सामंजस्य बिठाये रखने वाला व्यक्ति.
Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand
और इन सबके साथ-साथ कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की महत्वपूर्ण और जीवंत कड़ी बन जाने वाला व्यक्ति. कहने का मतलब एक इतिहास थे झूसिया दमाई जिसमें उनकी ‘जग-सुनी’ भी है और ‘आप-बीती’ भी. बड़ी कुशलता के साथ ‘जग-बीती’ में ‘आप-बीती’ जोड़ देते थे वह
गंगा बीच छाड़ि गे छै, न वार नै पार
तेरा पीछा लागी रयूँ,
हाँ ऽऽ बयासी साल में तुमार शरण में आयूँ राजा,
है ऽ राजा उ ऽ ता ऽ रिऽ ये पार हा ऽऽ आ ऽऽ
(बीच गंगा-धार में छूटा हुआ बेसहारा मैं, तुम्हारा सहारा पा रहा हूँ अब- बयासी वर्ष की उम्र में. सो हे मित्रो! पार लगा देना मेरी नय्या.)
यह ‘संग्राम कार्की’ वीरगाथा में गाया गया ‘बैर’ का टुकड़ा है. जिसमें झूसिया अपना दुख, अपनी बात कह गये हैं. वीरगाथा में वर्तमान को जोड़ गये हैं. वर्तमान को जोड़ने का यह क्रम झूसिया में ही नहीं सभी ‘असल’ लोक-गायकों में अकसर मिलता ही है. और यही रचनात्मकता किसी भी लोकगायक को अपने समय का लोक नायक’ बनाने में महत्वपूर्ण कारक बनती है. हमारे समय के अन्य लोकगायकों-गोपीदास, जोगाराम, मोहन सिंह रीठागाड़ी- सभी में यह गुण मौजूद था.  
यहाँ पर प्रसंगवश यह बात कही जानी चाहिए कि जीवन तो सदा प्रवहमान है ही लेकिन उसकी ‘लोकथात’ के प्रवाह को बनाये रखने में उसे अभिव्यक्ति देने वाले लोककलाकार मुख्य भूमिका निभाते हैं. वेदपाठी और ‘लोक-कण्ठी’ में एक अन्तर यह भी है. लोक कलाकारों के इसी महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही लोक की मौखिक परम्परा सदा प्रवहमान, गतिशील और जीवंत रहती है. किसी भी लोककलाकार का योगदान यही होता है कि वह अपनी रचनात्मकता उस ‘लोकथात’ में जोड़ देता है जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी से मिली होती है
गढ़ चम्पावत को दरबार म
बड़ी राजा ईजड़, का पाठ बीजड़
का पाठ कलिश, का पाठ गुणापिङा….
(गढ़ चम्पावत में- बड़े राजा ईजड़, ईजड़ के पुत्र बीजड़, बीजड़ के कलिष, कलिष के गुणापिङा….)
झूसिया दमाई मूलत: वीरगाथा-गायक थे. ‘संग्राम-कार्की’ उनकी प्रिय वीरगाथा है. झूसिया इसे जहाँ से चाहें शुरू कर सकते थे, जहाँ से चाहें समेट सकते थे. संग्राम-गाथा झूसिया की जेब में समझिये. संभवत: यही कारण है कि लोक की मौखिक परम्परा की जितनी भी शैलियाँ झूसिया के पास थीं, लोकाभिव्यक्ति की जो बहुरंगी अभिव्यंजना और स्पष्टता उनके पास थी, सौन्दर्यबोध की जो गहराई थी, मुहावरों और ध्वनि बिम्बों का जो खजाना था, लोकसंगीत-लोक लयकारी की जो विविधता थी, उन सबका सर्वाधिक प्रयोग झूसिया इस गाथा को गाने-सुनाने में करते थे.
झूसिया का संग्राम कार्की सुन लिया तो शिल्प (फॉर्म) के स्तर पर समझिये झूसिया पूरे सुन और देख लिये. ‘देख लिये’ इसलिए कि झूसिया वीरगाथा सिर्फ सुनाते नहीं बल्कि सुनाने के साथ-साथ उसकी नृत्यात्मक अभिनयात्मक अभिव्यक्ति भी करते थे.
वीरगाथा-गायन में उनके इतना चर्चित होने का एक मुख्य कारण उनकी अभिनयात्मक-नृत्यात्मक अभिव्यक्ति भी है, जो उन्हें छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पण्डवानी गायिका तीजनबाई के नजदीक ले जाती है. झूसिया दमाई को देखकर तीजनबाई और तीजनबाई को देखकर झूसिया दमाई बरबस याद आ जाते हैं. कथा-बखानी में, बात को समझाने में, कथा आगे बढ़ाने में ‘तीजन’ का शिल्प जिस तरह उनकी मदद करता है, कथा-गायन की एकरसता तोड़ता है- बिलकुल वही बात, वही तेवर झूसिया में देखने को मिलते थे. बल्कि तीजन से झूसिया एक कदम आगे ठहरते हैं अपने हुड़का-वादन के कारण. यहाँ पर मैं झूसिया को तीजन से महान साबित नहीं कर रहा हूँ, यह न मेरा उद्देश्य है और न वास्तविकता. मैं बस अपनी बात को समझाने के लिए तीजन का सहारा भर ले रहा हूँ. यह सच्चाई है कि नाचते-नाचते हुड़का बजाना, उस पर लयकारी दिखाना, ताल से खेलना अद्भुत होता था झूसिया का.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
गाथा-गायन प्रस्तुत करते समय ‘झूसिया’ की एक निश्चित वेष-भूषा होती थी- रंग-बिरंगा घेरदार पेटीकोट नुमा झगुला, कुर्ता, वास्कट, पगड़ी, कमर में फेटा और हुड़के में बँधी चँवर गाय के पूँछ की लटी, जो उनकी पीठ पर नृत्य के साथ अद्भुत गति से डोलती रहती थी. उनका ‘हुड़का’ भी सामान्य हुड़का नहीं था, उसमें अपेक्षाकृत भारी-भारी घाँट-घण्टियाँ लगी थीं, जो उन्हें अलग-अलग मन्दिरों से सम्मान के तौर पर मिली थीं. हुड़के के इसी वजन के कारण वह हुड़के को कंधे में डालने के साथ-साथ उसक एक ‘ताँणा’ (डोरी-संतुलित करने के लिये) कमर में भी बाँधते थे, जो सिर्फ उनकी ही विशेषता थी. अपनी उक्त वेश-भूषा में सज-सँवर कर नृत्य के साथ गाथा गायन करते हुए ‘झूसिया’ कथा के सूत्रधार होते थे और पात्र भी, गायक होते थे और वादक-नर्तक भी. बिना वेश-भूषा के अपने गायन को तो वह कार्यक्रम ही नहीं मानते थे.
एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने आकाशवाणी कार्यक्रमों के संदर्भ में कहा है-‘खाली ‘ट्यैस्ट’ होता है वहाँ आवाज का, बंद कमरे में, और सिर्फ ढाई हजार रुपया मिलता है हमेशा. कोई प्रोग्राम नहीं होता वहाँ.’ मतलब स्टूडियो रिकार्डिंग कोई कार्यक्रम नहीं था उनकी नजर में.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ का यह लेख पहाड़ पत्रिका के पिथौरागढ़-चम्पावत अंक में छपा है. काफल ट्री ने पहाड़ पत्रिका के पिथौरागढ़-चम्पावत अंक से यह लेख साभार लिया है.

Friday, May 8, 2020

मष्टो , कुलदेवता र परम्परा

( साभार- नयाँपत्रिकामा प्रकाशित डा, माधब प्रसाद पोखरेलको मष्टो हाम्रो कुलदेवता शिर्षकको लेखबाट )
 सबैजसो पहाडे खस नेपालीले दिनहुँ ‘कुलाइन’ (कुलायन, कुलदेउता) लाई साँझ बत्ती बाल्नु पर्छ । कुलाइनको दियो कसैलाई छुन दिनु हुँदैन, मूल खाट र मूल ओच्छ्यानमा अरुलाई सुत्न अथवा छुन दिइँदैन । कुलाइनको दियो बालेको ठाउँमा पनि अरुलाई जान दिइँदैन । कुलाइनको पूजा गर्ने कोठामा अरुलाई छिर्न पनि दिइँदैन । वैशाखे पूर्णिमा र मङ्सिरे पूर्णिमामा सके देवाली (दीपावली) गरेर गोठको धूप हाल्नु पर्छ, नसके पनि कुलाइनको पूजा चाहिँ गर्नै पर्छ । कुलाइनको पूजा बर्तमन (व्रतबन्ध) गरेका छोराले मात्र गर्नु हुन्छ ।
कुलाइनको पूजामा नगरी नहुने र गर्नै नहुने अनेक औपचारिकताहरू छन् । परम्परादेखि आएको पूजा विधिमा भरसक फरक नपरोस् भन्ने हरेक खस नेपालीलाई थाहा हुन्छ । रमानन्द आचार्य (जुम्ला) के भन्दछन् भने, मस्टालाई अरुले छुनु हुँदैन, घर बाहेककाले मस्टाको थानमा जानु हुँदैन अनि नुहाएर मात्र मस्टाको थानमा जानु हुन्छ । औपचारिकतामा कतै अलिकति पनि त्रुटि भयो भने, पिरपिराउ हुन्छ भन्ने मानिन्छ । देवाली नगरेको अथवा गोठको धूप नहालेको वर्षमा आफ्ना गाईको दुधमा चिउरा हाल्नु हुँदैन । 
परम्परादेखि चलेर आएको कुल पूजामा भरसक फरक नपरोस् भनेर जति चिताए पनि समय क्रममा पश्चिम पहाडबाट पूर्व तिर सरेको कुल पूजामा ठावैँ पिच्छे औपचारिकतामा अलि अलि फरक पर्दो रहेछ । यसले गर्दा पूर्वको र पश्चिमका कुलदेवता, पूजा विधि र औपचारिकतामा धेरै फरक परेको देखिन्छ । जुम्लाबाटै मस्टा अरु तिर गएको मानिन्छ ।
सबै पहाडे खस (बाहुन, छेत्री, ठकुरी, कामी, दमाईँ, सार्की, गाइने, बादी, आदि) हरूको मूल कुल देवता मस्टो हो । उदाहरणका लागि पूर्वका पानी पोखरेलका एउटा मुख्य कुलदेउता काला मस्ट हुन् । अर्का कुलदेवताको नाम ‘आदि वाराह’ छ । मनोहर लामिछानेले एउटा मस्टाको नाम ‘वराह’ पनि लेखेका छन्, त्यसैलाई सिवाकोटी (२०१४ इ) ले ‘बारामस्टा’ लेखेको सूचना उनैले दिएका छन् । यसरी एक भाइ मस्टाको नाम ‘वराह’ नै हुन पनि सक्छ । खसान भरि मस्टाहरू १२ भाइ छन् भन्ने किंवदन्ति छ, त्यसै अनुसार एउटा मस्टाको नाउँ नै ‘बारमस्ट’ अथवा ‘बारामस्ट’ भएको पनि हुन सक्छ ।
खसहरू कुलाइनको पूजा चुलाको भर्सेलीमा पनि गर्छन् । कुलाइनको पूजा जुन ठाउँमा गरे पनि हामी भर्सेलीका बिचमा ‘मन्डाल्नी’ लाई कुलदेवी भनेर पूजा गर्छौँ । मन्डाल्नीलाई दुध र सेतो फुलले पूजा गर्नु पर्छ, उनलाई मासु चढ्दैन भनेर हुम्लाको सिमकोटमा एउटा माडौँ (मण्डप) का डाङ्रेले मलाई सुनाएका थिए । मन्डाल्नी हाम्री सबभन्दा ठुली कुलदेवी हुन् ।
कालिकोटमा चाहिँ तुलाराज बिस्टले ‘बन्डाल्नी’ भन्ने एउटी राक्षसीलाई खसहरू पूजा गर्छन् भन्ने सूचना दिएका थिए । त्यहाँ पचालो, खापर, नैनेल (नदी किनाराका देउता) र राँगा माचुलो जस्ता राक्षस देउता पनि पुजिन्छन् अरे । यसरी ठाउँ अनुसार कुनै खसले देउता मानी रहेकालाई अर्को ठाउँका खसले राक्षस मानेको पनि पाइने रहेछ । अवेस्तामा देउतालाई ‘असुर’ भनिन्छ भने राक्षसलाई चाहिँ ‘दएव’ (देव) भनिन्छ (विलियम मलन्द्रा, १९८३ इ, ‘एन इन्ट्रोडक्सन टु इरानियन इन्स्क्रिप्सन्स’, पृ० ४७)। ‘असुर’ शब्द ऋग्वेदमा १०५ पल्ट प्रयोग गरिएको छ, जस मध्ये नराम्रो अर्थमा चाहिँ १५ पल्ट मात्र र राम्रो अर्थमा चाहिँ ९० पल्ट प्रयोग भएको छ (विकिपिडिया)। आर्यहरूकै दुई खाले बगाल बिचमा भएको वैमनस्यले गर्दा ‘देव’ र ‘असुर’ शब्दमा अर्थ परिवर्तन भएको रहेछ । मन्डाल्नीलाई अन्यत्रका खसहरूले देवी मान्ने कालिकोटमा चाहिँ राक्षसी मानेर पूजा गर्ने चलनमा पनि त्यस्तै परेको हुन सक्छ ।
मनोहर लामिछाने र प्रेम कैदीले मस्टाका सूचनाको मूल स्रोत खसानका ‘फाग’, ‘सगुन’, ‘हुड्केली’ र ‘भारत’ जस्ता लोक गाथामा पाइने कुरो गरेका छन् ।
खसान क्षेत्र (कर्णाली र सुदूर पश्चिम) मा मस्टो नै सबै भन्दा ठुलो देउता हो । सबैलाई दुधको दुध पानीको पानी छुट्याएर न्याय दिन सक्ने भएकाले मस्टा नै त्यहाँ गरिबगुरुवामा सबै भन्दा प्यारा छन् । खसानमा मस्टाको निर्णय जुनसुकै मुद्दामा सर्वस्वीकार्य हुन्छ । त्यहाँ मस्टालाई ‘दैलाका देउ’ का रूपमा पुजिन्छ । मस्टाका धामीको ठुलो सामाजिक भूमिका हुन्छ । खसानमा धामीका माध्यमबाट मस्टा नै क्षेत्र रक्षक र न्याय कर्ता हुन् । मस्टाको धामीले पतुर्दै अक्षताको टीको लगाई दिने, घण्टले टाउको छोई दिने र आसिक दिने गर्दा सुब्बेफाब्बे हुन्छ भन्ने जन विश्वास पाइन्छ ।
आफुले चिताएको सबै कुरो पु‍¥याई दिने भएकाले ठुलो आस्थाले खसानका मानिसहरू मस्टाको पूजा गर्छन् । मस्टाको पूजा विधि पनि ठाउँ अनुसार फरक पर्छ । लामिछाने (सल्यान) को सूचना अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमीमा थानमा पूजा गर्ने चलन भएपनि साउन शुक्ल पूर्णिमामा मस्टाको पूजा धूमधामसित हुन्छ । कुल पूजा (देवाली) चाहिँ कार्तिक पूर्णिमा र जेठ पूर्णिमामा गरिन्छ । देवाली ३, ५, ७, ८, १२ वर्षमा गरिन्छ, तर प्रायजसो वर्षको २ पल्ट गरिन्छ । पूर्वी नेपालमा चाहिँ कुल पूजा वैसाखे पुर्नियाँ र मङ्सिरे पुर्नियाँमा गरिन्छ । कुलदेउतालाई कात्तिक पूर्णिमामा न्वागी चढाउने गरिन्छ । न्वागी खानकै लागि धामीहरू विभिन्न गाउँमा जाने चलन छ । नयाँ बालीलाई न्वागी भन्दछन् । कुनै ठाउँमा चाहिँ मस्टाको पूजा आइत बार र बुध बार गरिन्छ भन्ने लामिछानेको सूचना छ ।
आर डी प्रभास ‘चटौत’ (डँडेल्धुरा), मनोहर लामिछाने (सल्यान) र रमानन्द आचार्य (जुम्ला) ले दिएको सूचना अनुसार मस्टाको थान, माडौँ, माणु खुल्ला हुन्छ, त्यहाँ छानो हुँदैन, मूर्ति हुँदैन, ढुङ्गो थापेर अथवा खोपामै पूजा गरिन्छ। आफुलाई समस्या पर्दा मस्टालाई जहाँ पनि स्मरण गरे पुग्छ । वन थलो माणु र घर थलो माणु गरी माणु पनि दुई किसिमको हुन्छ, वनमाणुमा चाहिँ लिङ्गो हुन्छ, विशेष पूजा मात्र हुन्छ, तर घरमाणुमा नै दैनिक पूजा हुन्छ । मस्टाको थानमा ‘आलम’ (ध्वजा पताकाको लिङ्गो) गाडिएको हुन्छ ।
मस्टाको आगम (वा गुह्य स्थान) लाई ‘गब्युर’ (गर्भगृह?) भनिन्छ । मस्टाको थानमा तिन ओटा गर्भगृह हुन्छन् (रमानन्द)। गब्युरसँगै गाडिने आलम सहितकै लिङ्गो प्राय धामीले पतुर्ने मस्टाको थानमा मात्रै फहराउँछ । मस्टाको थान भित्र र वरपर ढुङ्गा, काठ, तामा, पित्तल, काँस, आदिका मूर्ति, त्रिशूल, रुद्राक्षका माला, दियो, र शङ्खघण्ट हुन्छ (आचार्य)। बझाङमा चाहिँ मस्टाले गद्धी (‘पाट’ भनिने काठको खाट) मा दर्शन दिने कुरो सुनाउँदै डा. लक्ष्मी पण्डित के भन्दछन् भने त्यहाँ ‘वनमाणु र घरमाणुको भेद हुँदैन, पुजारीको घरमै मस्टाको कम्पन हुन्छ । 
मस्टाको थान भित्रै एक भागमा माटाको मैरो बनाइएको हुन्छ, जसलाई गादी भन्दछन् । मन्दिरमा चारै तिर ढुङ्गाले बारेर सामान्य धजा, फलामको सोटा (एक प्रकारको राजदण्ड) र घण्टहरू राखिएका हुन्छन् । थान वा मन्दिर प्राय उत्तर (कैलास?) तिर फर्केका हुन्छन् (लामिछाने) । मस्टाको नजिकै देवी थान हुन्छ, (जस्तै, डोटीको शैलेश्वरी मन्दिरकै पछाडि चण्डेश्वरी भैरव थानको २० मिटर जति दूरीमा छेत्रपाल दुधे मस्टाको थान छ) । मस्टा र भवानीको नाउँसँगै भैरव, झाँक्री, सिद्ध, बेताल, जस्ता देउताहरूको नाउँ प्राय जोडिन्छ (लक्ष्मीदत्त अवस्थी) ।
लामिछाने अनुसार मस्टा र भवानी दाजु बहिनी भए पनि मस्टाका परिवारमा मस्टाका भतिजा, मामा, भान्जा, भान्जी र सेवकहरू पनि भएको विश्वास गरिन्छ । मस्टाको थान नजिकै दायाँ बायाँ अलिक पर विभिन्न प्रकारका स्थानीय भूत, प्रेत, पितर, भैयार, सासल्या, बज्रठिङ्ग्याल, खोल्या, महाकाल (मकाल), भैरव, लाटो, तेडी, समैजी र बेताल जस्ता डुलुवाहरूको भाग मस्टाको छुट्याइएको हुन्छ । यस्ता स्थानीय देव र भूतप्रेतलाई मस्टाले नै नियन्त्रण गर्ने विश्वास गरिन्छ । मुगु र हुम्ला तिर लामाज्यु भनेर पनि मस्टासितै पूजा गरिन्छ (बौद्ध प्रभाव?) । 
मस्टाको पूजाआजामा धामी, डाङ्री, पुजारी, दमाईँ र कबिलास (कैलास भाक्ने) नियुक्त हुन्छन् । मस्टाको धामीले रुद्राक्षको माला लगाउँछन्, कपाल पाल्छन्, त्रिशूल, चिम्टा र फलामको लौरो लिन्छन् (आचार्य)। मस्टाको धामी ईश्वरीय शक्ति भएको मानिन्छ । धेरै धामी भएका ठाउँमा एक जना मुख्य धामी र अरु सहायक धामी हुन्छन् । मूल धामी गादीको मुख्य अधिकारी हुन्छ । मस्टा उत्पत्तिका मुख्य ठाउँबाट अरु ठाउँका धामीलाई छाप अथवा लालमोहर दिने पनि चलन हुन्छ । मस्टाको धामी र पुजारीको जुनसुकै जात हुन सक्छ । धामी पछिको अधिकारी डाङ्रीले थानको रेखदेख, पूजाका भाँडाकुँडा र अरु सामग्रीको सुरक्षा गर्छ । मस्टाको धामी नाच्ता दमाईँहरूले दमाहा बजाउने हुनाले दमाईँहरू पनि मन्दिरकै सहायक मानिन्छन् (लामिछाने) ।
मस्टाको सबै भन्दा ठुलो प्रभाव क्षेत्र जुम्ला हो । जुम्लाको पश्चिम तिर पनि पूर्व तिर पनि मस्टाको प्रभाव कम छ, कालिकोटमा मस्टाका विशिष्ट बेहोराहरू देखिन्छन् । कुमाउँ र गढवालमा पनि मस्टो मानिन्छ । मस्टाको उत्पत्ति स्थल मानसरोवरदेखि कर्णाली सम्म मानिन्छ । आचार्य भन्दछन्, ‘धामीका पडेली (भकाइ)’ मा इन्द्रलाई मस्टाका बाबु भन्छन्, मस्टा ‘भोटमा उब्जेका’ भनेर चिनाउँछन्, मस्टाको पूजामा आराध्य देव शिव नै हुन्छन्, अनि वन, पाटन हुँदै मस्टा हिँडडुल गर्छन् । 
मनोहर लेख्छन्, बाल ब्रह्मचारी मस्टालाई निराकार मानेर रूपमा पूजा गरिँदैन । मस्टाको मूर्ति हुँदैन, ढुङ्गो थापेर पूजा गरिन्छ । मस्टालाई वायु रूपको हुन्छ पनि भनिन्छ । शिवजीले सबै प्राणीको पालन, पोषण र रक्षा गर्न खटाएका गण मस्टा हुन् । मस्टो उदारता र समन्वयको प्रतिमूर्ति हो । कुलचन्द्र कोइराला मस्टो शब्दको व्युत्पत्ति नै ‘मरुत्, मरुत्तस्’ (वायु) बाट भएको मान्दछन् ।
मस्टालाई खसान क्षेत्रका कुलदेउता, क्षेत्रपाल अर्थात् त्यस क्षेत्रका रक्षक, भूमिपति, अरु स्थानीय देउतालाई पनि नियन्त्रण गर्न सक्ने, परम शक्तिशाली देउता मानिन्छ । आचार्य मस्टाको गोत्र वामदेव (शिवकै नाउँ) हो भन्दछन् । डा. जयराज पन्त (डोटी) ले शिवजी र पार्वतीको गणका रूपमा मस्टो लोक कल्याण कार्यमा खटिएको जनाएका छन् । मस्टाको धामीले पडेली र कैरण पतुर्दा खस प्राकृत भाषा बोल्छ । भारत, हुड्केली, गाथा, फाग र सगुनमा जस्तो भाषा पाइन्छ, त्यताको धामीले पतुर्दा त्यतै तिरको बोली प्रयोग गरेको देखिन्छ (लामिछाने)।
चटौतले अमरकोशमा ‘मश्’ धातुको अर्थ ‘रिसाउनु’, ‘कराउनु’, ‘तपस्या गर्नु’, ‘हिंसा गर्नु’ बाट मस्टाको अर्थ खोजेका छन् । ‘शब्दकल्पद्रुम’ मा त्यसै सम्बन्धी ‘मक्ष’ धातुको अर्थ पनि ‘रिसाउनु’, ‘कुट्नु’, ‘कराउनु’, ‘मार्नु’, ‘फल दिनु’ पाइन्छ । चटौतले भेस बदलेर वा प्रकट भएर कसैको परीक्षा लिनु, भविष्यवाणी गर्नु, भलो हुने कुरो बोली दिनु (सात्विक गुण), अनि ‘चोट पु‍-याउनु’, ‘क्षति गर्नु’ (रजोगुण) भन्ने अर्थ मस्टासित मिल्ने ‘मश्’ धातुबाट निकालेका छन् । आचार्यले ‘शिवमहिम्नस्तोत्र’ मा शिवलाई ‘महिष्ठः’ भनेको कुरो अघि सार्दै ‘मस्टो’ शब्द त्यसै शब्दबाट व्युत्पन्न भएको निर्णय दिएका छन् । ‘मस्टो’ लाई स्थानीय जन जिब्राले ‘मइठो देउ’ (महिष्ठ देवः) भन्दछ । यसबाट ‘मस्टो’, ‘महिठो’ अथवा ‘मइठो’ शब्द भगवान शिव जनाउने ‘महिष्ठः’ शब्दबाट बनेको रहेछ भन्ने अर्थ निस्किन्छ । इरानीहरूको ‘अवेस्ता’ मा मुख्य देवताको नाउँ ‘अहुर मज्दा’ भन्ने पाइन्छ । आचार्यको भनाइ मान्नु हो भने, ‘अहुर मज्दा’ भन्ने शब्द संस्कृतको ‘असुर महिष्ठः’ भन्ने शब्दबाट बनेको प्रमाणित हुन्छ । आप्टेको ‘संस्कृत शब्द कोश’ अनुसार ‘महिष्ठः’ शब्दको अर्थ ‘महान् देव’ (अर्थात् महादेव) हुन्छ । 
विलियम मलन्द्रा (१९८३ इ, एन इन्ट्रोडक्सन टु एन्सिएन्ट इरानियन रिलिजन) ले इरानी अखामनीहरूको अभिलेख (पृ० ४५) मा ‘अहुरस्य मज्दाह्’ (असुरस्य महिष्ठ?) भेटेका छन् । त्यस अभिलेखमा ‘अन्तिम जनाधिक्यका वेलामा मज्दाले यिमसित (शिवले यमसित?) सामूहिक सल्लाह गरे’ (१७६) भन्ने लेखिएको छ । कुज्मिना (२००७ इ, हिष्ट्रियर अफ इन्डोइरानियन्स) ले इरानी आर्यहरू वैदिक आर्यसँग छुट्टिएर दक्षिण तिर लाग्दा यमले नेतृत्व गरेका थिए भन्ने लेखेकी छिन् । यमलाई अवेस्तामा ‘यिम’ भनिएको छ । हिन्दुकुशको स्वात उपत्यकामा इन्द्रलाई ‘यिम्र’ भनिएको छ ।
यसरी ‘यिम’, ‘यम’, ‘यिम्र’ र ‘इन्द्र’ को साइनो गाँसिन्छ (पर्पोला, २०१५ इ, ‘रुट्स अफ हिन्दुइज्म’) । लामिछानेले मस्टालाई इन्द्रको सन्तान मानिने भएकाले ‘इन्द्र गादी’ (इन्द्रासन) इन्द्रबाटै मस्टाले अधिकारमा पाएको विश्वास गरिन्छ, त्यसैले धामीहरू गादी (मैरो) मा काम्दै उफ्रेर चढ्छन् अनि यसरी काम्दा ‘देउता चढ्नेङ चढ्ने, जिउ चढ्ने, औतार लिने’ हुनाले मस्टाको बोली देव वाणीमा परिणत हुन्छ भन्ने लेखेका छन् । मस्टाहरू आफुलाई इन्द्रका छोरा (शिवजी इन्द्रका छोरा?) भनेर चिनाउँछन् भन्दै लक्ष्मी पण्डित ‘इन्द्रको जायो (छोरो) मइठो (मस्टो) बोलायो’ भन्ने बझाङको उखान सुनाउँछन् । पण्डितको भनाइ अनुसार मस्टाकी ‘आमा मन्डाल्नी, बाबु इन्द्र’ हुन् । इन्द्रको मूल्याहा छोरो भएकाले मस्टालाई इन्द्रले पातालमा फ्याँकी दिएको किंवदन्ति बझाङमा छ अरे । सोमयाग, महाव्रत, राजसूय, वाजपेय र अश्वमेध यज्ञमा व्रात्यहरूलाई देउताले स्वर्ग लगेनन् भन्ने प्रसङ्ग आउँछ । अथर्व वेदमा शिवजीलाई नै व्रात्य भनिएको छ (पर्पोला, २०१५ इ) ।
खसान क्षेत्रमा प्रचलित लोक कथा र गाथा अनुसार दक्ष यज्ञ नाश गरेपछि शिव गण मध्ये वीरभद्र जस्ता केही चाहिँ शिवजीमा लीन हुन चाहे, तर केहीले चाहिँ वायु रूपमा घुम्ने, मान्छेको जिब्राले बोल्ने इच्छा गरे । मस्टा तिनै शिव गण हुन् (आचार्य)। अर्को लोक कथा अनुसार असुर (दक्ष?, रावण?, जालन्धर?, शङ्खचूड?, अन्धकासुर?) हरूले शिवकी भगवतीलाई दुव्र्यवहार गरी बन्दी बनाएकाले शिवजीले आफ्ना गण (विनायक?, गणेश?, स्कन्द?) हरूलाई मुक्त गर्न लगाए । गणहरूले मस्तक थापेर युद्ध गरी जिती ल्याएका (मस्तकमा राखेर भगवतीलाई ल्याएका?) हुनाले त्यही मस्तकबाट मस्टो शब्द बनेको हो (लामिछाने) । मानसरोवरमा विहार गर्ने क्रममा शिवजीको वीर्यपात भएर दन्दनी बलेको आगो स्वर्गबाट नुहाउन आएका दुइटी अप्सराले तापेकाले एउटीले कालिका, मालिका र दुर्गा जन्माएको र अर्कीले मस्टो जन्माएको पनि मिथक छ (लामिछाने) । भैरव र सिद्धका रूपमा पनि मस्टा पुजिएको सूचना पनि पाइएको छ ।घोडा नै मस्टाको प्रमुख वाहन हो, तर भेडा, चितुवा र जाड्या पनि मस्टाका वाहन मानिएका छन् ।
घोडा नै मस्टाको प्रमुख वाहन हो, तर भेडा, चितुवा र जाड्या पनि मस्टाका वाहन मानिएका छन्
मस्टाहरू १२ भाइ छन् र उपभेद ८४ छन् भन्ने किंवदन्ति खसानभरमा छ अनि त्यो उपभेदको आधार धामी हो (आचार्य), तर सूचकहरूबाट बटुलेका मस्टाका नामहरू गनी साध्य छैन, जस्तै, (१) उखाडी, उखड्या (मनोहर):आचार्य अनुसार यो मस्टाको मूल थलो जुम्लाको उखाडी हो । (२) कवा, कः, कावु (मनोहर): ‘कवा’ मस्टाको मूल थान मुगु हो । ‘कवा’ मस्टालाई केश अर्थात् कपालको आँठो चढाउँछन्, (आचार्य)। मनोहर ‘कौवा’ मस्टाको मूल थलो ‘कौवा लेक’ लेख्छन् । (३) कालोसिल्टो, कालसिला, काल्सिला, काला, काल्या, ‘कालाशिला विनायक मस्टो’ (बिस्ट, कालिकोट), (४) क्षेत्रपाल, छेत्रपाल्या : पूर्ण धितालको भनाइ अनुसार क्षेत्रपाल मस्टालाई समन्वयकारी मस्टो मानिन्छ, क्षेत्रपाल मस्टाको माडौँ जुम्लाको धिताल्नी गाउँ हो । (५) खापड, खापर : खापर मस्टाको माडौँ कालिकोटको पलाँता गाउँ हो (धिताल)। लामिछाने चाहिँ कालो खापडे अर्थात्, खापर मस्टाको माडौँ खप्तड हो भन्दछन् । 
(६) ढणार, ढँडार, ढँडारे : आदि मस्टाका रूपमा पुजिने यो जेठो भाइको मूल थलो बझाङको ढँडार हो । ‘रातो ढँडार’ भन्ने बेग्लै मस्टो पनि छ कि? ‘ढँणार फुट्यो, पखान छुट्यो’ भन्ने उखानको अर्थ हो : ढँडारको प्रवाहमा प्रवाहित हुँदै जल, थल, पाखापखेरा सबै मस्टामय भए (पण्डित)। (७) थार्पा, थापर, थापरे, थार्प, थार्पो मस्टालाई सर्वज्ञ र विद्वान् मस्टो मानिन्छ । मुगुको थार्पा भन्ने ठाउँ यसको मूल थलो हो । मुगुमा ‘मस्टो पोखरी’ छ (धिताल)। (८) दाढ्या, ढाडे, दाढे, दारे : धिताल अनुसार चमत्कारी दाढ्या मस्टाको माडौँ मुगु हो । जुम्लाकै आचार्य चाहिँ दाढ्या मस्टाको मूल थलो दुल्लु हो भन्दछन् । सल्यानका लामिछाने चाहिँ ‘दारे’ मस्टाको मूल थलो जुम्ला, मुगु र जाजरकोट लेख्छन् । (९) दुध्या, दुधे, दुधेसिल्टो : यो ‘दुध खाने सात्विक’ मस्टाको मूल थलो दुल्लु हो (आचार्य) । यो मस्टो शाकाहारी हो अरे । (१०) बाम, बाओँ, बाहाँ : धिताल अनुसार बाओँ मस्टाको माडौँ जुम्लाको बाओँ गाउँ हो । बाओँलाई सुरक्षा दिने देउता मानिन्छ । आचार्य चाहिँ ‘बाहाँ’, ‘बाम’ मस्टाको मूल थलो मुगु भन्दछन् ।)
(११) बाबिरो, बाबिरा : धिताल अनुसार जुम्लाको खलङ्गा नजिकैको बाबिरा गाउँ बाबिरो मस्टाको माडौँ हो। आचार्य बाबिरो मस्टालाई कान्छो भाइ भनेर चिनाउँछन् । बालकृष्ण पोखरेल (२०५५, खस जातिको इतिहास, २४०) ले ‘(बाबिरो) मस्टा’ शब्दको साइनो इरानी ‘(बाबैरुरा) मज्दा’ सँग जोडेका छन् र बाबिरो मस्टाले खसहरूलाई एकातिर असुरसित अर्कातिर बेबिलोनसित जोड्छ भन्ने विचार व्यक्त गरेका छन् (लामिछाने)। (१२) बिजुल्डाणो : आचार्य यस मस्टाको मूल थलो जाजरकोटको ब्वारेकोट मान्दछन् । (१३) बुढो, बुढाल, बुडु, बड : जुम्लामा बुडु मस्टालाई नै सर्वशक्तिमान् मस्टो मानिन्छ । बुडु मस्टाको माडौँ जुम्लाको बुडु गाउँ हो (धिताल) । बुडु नै सबै भन्दा जेठो मस्टो हो । (१४) रमाल, रुमाल, रुमाल्या मस्टाको मूल थलो लामिछाने (अछामको?) ‘खिड्कीसैनी’ लेख्छन् । (१५) लाडे, लरे, लाट्या, लाटो, ‘लट्टे, जटाधारी’ मस्टो इमान र न्यायको देउता हो, जसको माडौँ जुम्लाको सन्जेलबाडा हो (धिताल), तर जुम्लाकै आचार्य चाहिँ लाटो मस्टाको मूल थलो हुम्ला भन्दछन् । (१६) सुनारगाउँ, सुनारगाउँले मस्टाको मूल थलो जुम्लाकै सुनारगाउँ हो (आचार्य) । 
लामिछानेले दिएका मस्टाका अरु नाउँ यस्ता छन् : उडिसिला, कमल, कलि, कुर्मी, कैडल्यो, कैलास, क्यँडालो, खुन्दात, खुन्दाल, गुणे, गुरौ, ‘गुरो’ (मूल थलो हुम्ला र मुगु), घुरापानी, जिय, टेठ्या, टेढी, ‘तेडी’ (मूल थलो डोटी), डाङ्री, डोग्री, तुसापानी (ढुसापानी), पुवाँले, बान्नी, बाँसकोट‍¥या, बाँस्यालो, माङ्ले, मुण्डा, रुद्र, लाकुड्या, लाङ्खुरे, लिउडी, वनपाला, वराह, बारामस्टा, सुकिलो हंस र सुन्दरगाउँले । 
तुलाराज बिस्ट लिङ्गासैनी मस्टलाई भगवान शिव मान्दछन् । उल्लेख गरिएका सूचकहरूले मस्टाका अरु नाम र किसिम पनि चिनाएका छन्, जस्तै कामत, कैल्या, डढी सिमल, डाँडा, थोते, धौलपुरा, धौलपुर, धौलपुरे, धवलपुरी, बिजुल, मण्डल्या, मुढ्या, म्हावै, वाँ, लरिचाल, लाङ्डा, लेखाडी, लोखाडी, साइन, सिम । स्थान भेद र उच्चारण भेदले पनि मस्टाको सङ्ख्या बढेको पाइन्छ । 
स्वभावका दृष्टिले मस्टा तिन किसिमका पाइएका छन् : (अ) रजोगुणी मस्टाले रगतको वलि खान्छन्, जस्तै,  जेठो आदि मस्टो, रुमाल मस्टो, दाह्रे, खप्पर, खपरे, र टेढी । दारे मस्टाको धामीले दाँतले बोकाको घाँटी टोकेर वलि स्वीकार्छ । दारेबाटै थोते मस्टो जन्मेको मानिन्छ । (आ) सत्वगुणी मस्टाले दुध र खिरको वलि मात्र खान्छन्, जस्तै, दुधे र लडे । (इ) सर्वाहारी मस्टाले जस्तो वलि पनि खान्छन्, जस्तै, मुण्डा, रुद्र, कैली, काला र रानी मस्टाहरू ।
पण्डित के भन्छन् भने, ठाउँका नाउँले मात्र मस्टाको सत्या धेरै देखिएको हो, नत्र मस्टो एउटै मात्र हो । त्यसका मूलतः ३ किसिमका रूप हुन्छन् : (अ) दाढ्या (दाँत देखाउने अर्थात्, भोग खाने), (आ) दुध्या (दुध खाने), (इ) रोड्या (न्यायाधीश)। उनको भनाइ अनुसार बझाङमा मस्टालाई मासु चढाइँदैन, दही चामलले मात्र पुजिन्छ । 
बाह्र भाइ मस्टा र नौ बहिनी भवानी भन्ने प्रसिद्ध भए पनि भवानीका नाउँमा पनि एकरूपता पाइँदैन । लक्ष्मी पण्डित भन्दछन्, मस्टालाई बझाङ तिर १६ बहिनीको ‘एकलो भाइ’ भनेर चिनाउने चलन छ । भवानीहरूका नाउँ यस्ता भेटिन्छन् :
अलकनन्दा, कनकसुन्दरी, कालिका, खेसमालिनी, चुली मालिका (कालिकोट), जालपादेवी, ठिङ्ग्याल्ली, डिँग्याल्नी (.गद्धीनसिन), थिगेल्नी, त्रिपुरासुन्दरी, दुधे भवानी (जुम्ला), दुलेल्ली, नदई (जुम्ला), निगालासैनी (डोटी, बैतडी), पुँगेल्नी, पुँग्याल्नी (.अधिकारिणी), पुगमालिका (कालिकोट), पोटलासैनी (डोटी, बैतडी), बडी मालिका (कालिकोट), बन्डाल्नी (पूर्ण धितालको भनाइ अनुसार यिनै सबभन्दा ठुली देवी हुन् ।
आचार्य यी देवीको वैकल्पिक नाम मण्डाल्नी भन्दछन् । बिस्टले चाहिँ बन्डाल्नीलाई जङ्गलमा पूजा गरिने राक्षसी देवी भनेर चिनाए । आचार्य इन्द्र पत्नी ‘मस्टाली’ लाई चाहिँ दैत्य मानिन्छ भन्दछन् ।), बिन्द्रवासिनी, (डोटी, बैतडी, अवस्थी), बिन्दासैनी, भवानी, भुजेल्नी (जुम्ला), मङ्गलासैनी (डोटी, बैतडी),मालिका, रामारानी (रामारानीका रूपमा खसानसँग जडान संस्कृतिको एउटा बाहोँ मिसिएको पाइन्छ), शैलेश्वरी वा शिलादेवी (डोटी, बैतडी), सुन्दरादेवी, ह्रूपा देवी (अग्ला टाकुरामा बस्ने, ऋषितर्पणीमा मात्र पुजिने, कालिकोट)। आचार्य भवानीहरूलाई मस्टाका अनुचरी भनेर चिनाउँछन् भने अरुले बहिनी भनेर चिनाएका छन् ।

Tuesday, March 31, 2020

फरक तरिकाले बाच्न र समृद्ध हुन सिक्नु पर्छ





अब फरक तरिकाले बाच्न र समृद्ध हुन सिक्नु पर्छ 













केही यथार्थ

 बारे

  • निरन्तर परिबर्तन प्रकृतिको नियम हो, र हामीले पनि परिवर्तनलाई स्विकार्दै जानुपर्छ । तर फरक कुरा नै परिबर्तन भने हुंदैन । मैले सिकेको शिक्षामा नैतिकता थियो, विज्ञान पुरा थिएन होला । नैतिक शिक्षालाई कायम गर्दै, विज्ञान थप गर्नु पथ्र्यो होला । नैतिकताका नाममा रहेका अन्धविश्वासलाई हटाउदै, समाजलाई प्रगतिशील बनाउनुपथ्र्यो होला । तर हामीले देशको इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, गणित, नैतिक शिक्षा र साहित्यलाई सफाया गरिदियौं । आज हामीसंग आफ्नो पहिचान छैन, हामी घोर स्वार्थी, उपभोक्तवादी, ब्यक्तिवादी, अवसरवादी र आराजक भिडमा परिणत भएका छौँ । मानिसका प्रवृत्ति हेर्दा हामी पढेका मानिस भएछौं, तर अशिक्षित र आज्ञानी पनि भएछौं । हाम्रो शिक्षा गलत रहेछ । यो बिदेशी पैसा र योजनाको शिक्षाले हाम्रो सर्वनास गर्नेछ, शाशकको विचारधारा जेसुकै होस् । यस्तो माहामारी रोगलाई नियन्त्रण गर्न घरमा बस्नुहोस् भन्दा नमान्ने नागरिकको यो मति वर्तामान शिक्षाको उत्पादन वा परिणाम हो भन्न नसक्नु पर्ने कारण छैन ।
  • म गाउँमा पढ्थें । गाउँको स्कुल गाउँकै मानिस मिलेर बनाएको राम्रो भवन थियो । खेलकुदका लागि मैदान थियो, खेलकुदका प्रतिस्पर्धा हुन्थे । स्कुल जबसम्म समुदायले चलाए, शिक्षामा भ्रष्टाचार थिएन । तर जब शिक्षा निजीकरण मात्रै होइन ब्यापारीकरण भयो, त्यस्को परिणाम हाम्रो आँखा अगाडि छ । बिगत तीन वर्षदेखि प्रत्येक साल ४५ हजार विद्यार्थी विदेश गएका छन् पढ्न । प्रत्येक साल करिब ८० अरब रुपैयाँ कम्तीमा नेपाली आम्दानी विदेश गएको छ । हामीले टेक्सासमा बसेर टेकु अस्पतालमा कोरोनाले मानिस मेरेको हल्ला फिजाउने युवा उत्पादन गरेछौं । हातमा ६० हजारको मोबाइल आमाबाबुको आम्दानीबाट किनेर बिहान नौ बजे उठेर देशमा अवसर छैन भन्ने युवाको जमात सानो छैन । वर्तमान शिक्षाले देशप्रतिको जिम्मेवारी समाप्त पारेको रहेछ । जब मानिस आफ्नो परिवार, समाज र देशप्रती गौरव नगर्ने ठाउँमा पु¥याइन्छ, त्यो समाजमा अराजकताको डरलाग्दो भाइरस लागेको हुन्छ, अनि त्यो कोरोनाबाट के तर्सिन्छ ? हाम्रो शिक्षाले गुण होइन बैगुण शिकाएको रहेछ ।
  •  हाम्रा घरहरु अलिवरपर हुन्थे । गाइबस्तुका गोठ अलि पर हुन्थे । पानीका धारा मुहानबाट आउथे । रैथाने गाइ, भैंसी, बाख्रा, भेडा आदि थिए । नेपालमा पनि बिफर र दादुराको प्रकोप आयो । संसारमा अधिक मानिस त्यस ब्याधीबाट मरे । तर नेपालमा सिमित मानिस मात्र मरे । चीन र भारतमा पनि प्लेग आयो । तर नेपालमा त्यस ब्याधीले मानिस मरेका थिएनन । त्यसका पछाडि कारणहरु रहेछन् । हाम्रो बसोबास प्रणालीले सरुवा भाइरस रोक्दो रहेछ । बेलायती उपनिबेसले नेपालको जनसंख्यालाई उपनिबेस बनाएको थियो । सन् १९१४ देखि १९४५ सम्म हाम्रा आठ लाख मानिस युद्धमा प्रयोग ग¥यो, दस जानामा एकजाना मात्र देश फर्किए । दुइटा विश्व युद्धमा दुइलाख त मारिए नै । तर पनि हाम्रो जनसंख्या रोगले कहिल्यै घटेन । नेपालले बिनासक ब्याधी सामना गर्नु परेन ।
  • के कारण थिए ? पहिलो त हाम्रो बातावरण हो, जो अहिले डोजर आतंकको सामना गरिरहेको छ । हाम्रा बस्तीहरु, जहाँ घरहरु आलि वरपर थिए । हाम्रो अन्नबाली, तरकारी, सागपात र जडिबुटी हाम्रो शरीरलाई मिल्ने खालका थिए । जतिसुकै गरिबले पनि मकै, कोदो, स्थानीय धान, मस्याम, गहत, दाल र सागपात उत्पादन गररेर खाने चलन थियो । २०२५ सालतिरबाट विदेशी विकासे बोका आए रैथाने बाख्रा सकिए । विकासे आएपछि रैथाने गाई, भैंसी, भेडा सबै सकिए । किन र कसरी सकिए ? आज गाउँहरु उजाड भए । हाम्रो विकासका योजना कस्ले बनाए ?
  •  युभल नोह हरारी भन्छन्, कृषि क्रान्तिभन्दा पहिलाका होमो सेपिएन्सले समाज निर्माण गरे । मिथकहरु निर्माण गरी मानिसलाई समुहमा राख्ने आधार निर्माण गरे, भाषा र सञ्चारका प्रणाली निर्माण गरे । चिन्तन र मन्थनको क्रान्तिद्वारा आजको आधुनिक विश्वको जग निर्माण गरे । उनीहरु दिनमा छ–सात घन्टा खाना खोज्दथे । हरेक दिन फरक खाना खान्थे । उनीहरु समुहमा बसेर मनोरञ्जन गर्थे । उनीहरु खुसीसंग बाच्थे, भलै कतिबेला सिंहले माथ्र्यो थाह थिएन । तर हामीसंग कति समय छ, आराम गर्ने ? हाम्रो खाना त ‘कुर्कुरे र चाउचाउ’ भैसक्यो । ती आदिम मानिस अहिलेका मानिस भन्दा बलिया, अग्ला र तन्दुरुस्त थिए । उनीहरुले गाइबस्तु पालेका थिएनन, त्यसैले ब्याधीहरुका शिकार भएनन । जब मानिसले कृषि क्रान्ति ग¥यो, उस्ले खाने कुरा सिमित भए । मानिसले गाइबस्तु पाले । ब्याधीले मानिस मर्ने लागे । तरपनि उनिहरुसंग ब्याधीका विरुद्ध मुकाबिला गर्ने क्षमता थियोे र मानव जातीलाई मासिन दिएनन । आजको कथित विकास औद्योगिक क्रान्ति पछाडिको पुँजीवादको देन हो । यस्ले विज्ञान त निर्माण गर्याे, तर मानिसले हजारौं बर्ष देखि विकास गरेको मानव सभ्यता ध्वस्त पार्दै छैन ?
  • मेरा हजुरबुबा र बाबुको जति बल र ज्ञान मसंग छैन । मेरा हजुरबुबालाई गाउँको मात्र होइन जिल्लाभरीका मानिसका बारेमा थाह थियो, जनावरका बारेमा थाह थियो, बिरुवाका बारेमा थाह थियो, पुर्खाका नाम थाह थियो, कुन कुन ठाउँमा बसाइ सर्दै यहाँ आइपुगेको हो भन्ने इतिहास थाह थियो, नेपालको इतिहास थाह थियो, कुलो खन्ने प्रबिधि थाह थियो । अहिले हामीलाई के थाह छ ? मेरा मेरा हजुरबुबा औषधि नखाइ बांचे । हामी औषधिमा बांचिरहेका छौं । हामीसंग ठूलो बाटो छ, मोटर छ, अस्पताल छ । तर आज म अस्पताल गएँ भने डाक्टर डराउछन् । विज्ञानले खोइ त युरोप र अमेरीका बचाएको ? मलाई मेरो विज्ञानप्रति आज भरोसा छैन ।
  • के विज्ञानको दोष हो ? होइन, विज्ञानको दुरुपयोग समस्याका रुपमा आएको हो । युरोपले मानिसलाई जातका आधारमा विभाजीत गरेर, पुँजीवादी वर्गीयताको निर्माण गर्ने उपनिबेसको माध्यमले दुई सय वर्षको अधिनायकवाद नचलाएको भए, आजको दुनियाँ फरक हुने थियो । यो मेरो भनाइ होइन, पश्चिमलाई स्वर्ग देख्नेहरुलाई चित्त दुख्ला । यो इड्वार्ड सैडको भनाइ हो, उनी अमेरिकी हुन । पश्चिमको अहंकार हो, भनी नोम चोम्स्की भन्छन् । हरारी पनि त्यसै भन्छन् । आज मानिस सभ्यताका नाममा असभ्य देखियो । युरोपको उपनिबेसी अधिनायकवाद नआएको हुदों हो त कथित राष्ट्रियताको आन्दोलनले जन्म लिनुनै पर्ने थिएन । आज दुनियाँ राष्ट्रियताले ओतप्रोत छ । युरोपलाई चीनको प्रभावको डर छ । युरोपलाई एसियाको डर छ । किन, एसियामा आज राष्ट्रियता मौलाएको छ ? कारण, हिजो युरोपले दबायो । असभ्य ठान्यो । एसियाको औद्योगिकरण ध्वस्त पार्यो ।
  • ठिकै छ, हिजो जे जे भयो । तर खोइ युरोपमा मानिस जोगाउने सामाजिक र आर्थिक ब्यबस्था ? धन जति मुठीभर मानिसमा रहेछ । त्यो धन गरिबलाई काम लाग्दो रहेनछ । देश धनी छ । तर सरकार गरिब छ । उद्योग धनी छ, तर उस्को सामान विदेश जान्छ, देशलाई काम लाग्दैन । अमेरिकामा भेन्टिलेटर छैन । सबै उद्योगले अस्तिनै बेची सकेछन् । यिनै देशप्रति गैरजिम्मेवार पुँजीपतिसंग देशको अर्थतन्त्र छ ।
  • हामीले यही ढाँचा हो सिक्ने अब? होइन, यस त्रासदीबाट सिकौं :
    • हामीले ठुला शहर बनाउनु नहुने रहेछ । ससाना थुप्रै शहर बनाऊँ । शहरहरुलाई स्वावलम्बी बनाऊँ ।
    • हामीले पहाड ध्वस्त पार्नु नहुने रहेछ । पहाडमै र गाउमै बसोबास ठिक रहेछ । हामिले प्रकृतिसंग तालमेल गरेर बस्नु पर्ने रहेछ । हाम्रो विकासको ढाँचा आधुनिकता र प्रकृतिसंगको तालमेल रहेछ । अब देशको विकासको नयाँ ढाँचाका बारेमा सोच्न थालौं ।
    • हिजो हाम्रो प्राङ्गारिकता कस्ले तोडिदियो ? अब त्यस बाटोमा हिडौं । अब विदेश जान छोडौं । ब्याधी र दुख त त्यही रहेछ । आखिर देशनै चाहिने रहेछ । सबै युवाहरु, अब उत्पादनमा लागौं ।
    • नवउदारवादले ल्याएको उपभोक्तावादले सकेको रहेछ हामीलाई । अब यसबाट बाहिर आऔं ।
यो ब्याधी पछि कसरी दुनियाँ आगाडि जाने होला ? किसोर माभुवानीले र लि कवान युले भने जस्तै पश्चिम आफ्नो अहंकार र एकाधिकारवादको नीतिलाई पुनरावलोकन गर्न तयार भयो भने, दुनियाँ राम्रो हुनेछ । अन्यथा हामीले अब फरक तरिकाले बाच्न र समृद्ध हुन सिक्नु पर्छ ।
(साभार -परिसम्बाद डटकममा प्रकाशित प्रा डा युबराज संग्रौलाको लेख )

Saturday, February 1, 2020

तिम्रो देउतासँग के बर माग्दैछौ ? 

तिम्रो देउतासँग के बर माग्दैछौ ? 
( कबिता)

गरिबीको च्यादर ओढिरहेको मुटुमा 
टेकाउँदै धर्मका पाइताला
फलाक्दै शान्तिको मन्त्र
चढाउँदै सूर्यलाई अर्घको पानी
तम्रा देउतासँग के बर माग्दैछौ गोसाइँ
देउता त हाम्रा पनि छन् 
हाम्रा पुर्खाले पनि पुजेका हुन्
र, हामी पनि पुजिरहेकै छौं
तर हामीले त पूजामा 
मात्र मन चढाउँछौ मालिक
आकाशका तारा गन्दै बगर नाप्दै
दिन बताइरहेको फिरन्तेको बाटै बन्द गरेर
अग्निकुण्डको नक्सा कोर्दै 
जिन्दगीको दोबाटोलाई धुवाँदार बनाएर
कस्तो आकृति खोज्दैछौ मालिक ?
छाँद हालेर रुन खोज्दा गरिबले
थापेजस्तो गरेर अञ्जुली
धक्क्याउँदै उसको जिन्दगीकै ढिस्को
कर्मकाण्डको कुनचाहिँ पाना बढी पल्टाउँछौ ?
कयौंका मुटु मिचेर कचोल बनाइसकेका 
तिम्रा कपटी हात
टुनामुना लगाउने तिम्रो हेराइ
सबै बुझेको छु मालिक 
तिमीले योजनाका ड्याम बाँध्दै गर्दा
यता मजस्ता कयौंका मनमा परिसक्छ भुमरी
भत्किन सुरु हुन्छ जिन्दगीको सिँढी
देख्न सक्छु अचेल सजिलैसँग
सेती नदीको खोँचमा बनेका खुनिकुण्टाझंै
तिम्रा मनका खुनिकुण्टाहरु 
सेतीले त दिन्छ तैरिने अवसर 
कम्तीमा मृत्युपछि नै भए पनि 
तर सोझा मनहरु सक्दैनन् रे 
तिम्रो चातुर्यको भुमरीबाट उम्किन
यथार्थका टपरी जति पाइतालामुनि लुकाएर 
कस्तो टपरीमा राख्न लगाउँछौ छाक धान्ने चामल 
अनि कुनचाहिँ दुनामा बाल्न लगाउँछौ जिन्दगीको दियो ?
भन न गोसाइँ
चढाउन सिकाएर सूर्यलाई अर्घको जल
तम्रा देउतासँग के बर मागिदिन्छौ ?
( साभार- बाह्रखरी)
 रचनाकार- हेमन्त बिबश
फोटो साभार- गुगल
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Wednesday, November 6, 2019

कालापानी चर्चा ; तितो यथार्थ


( कालापानी र धामी; एउटा फ्ल्यासब्याक शिर्षकमा मिति ०७६ कातिक २० को अन्नपुर्ण टाइम्समा प्रकाशित सुधीर शर्माको लेखबाट साभार उदधृत / )
 चर्चामा आउने, तुरुन्तै हराउने, फेरि केही समयपछि बहसको विषय बन्ने, तर कहिल्यै नसुल्झिने मुद्दाहरू हामीकहाँ थुप्रै छन् । कालापानी त्यस्तैमध्येकोे एक हो । भर्खरै फेरि कालापानीको कुनो नेपालका सरकारी नक्साहरूमै नराखिएको समाचार चर्चामा आएको छ ।
कालापानी जहिले–जहिले समाचारको शीर्षक बन्छ, मेरो स्मरणमा प्रेमसिंह धामी आइहाल्छन् । वास्तवमा उनैले हो, यो मुद्दालाई दुर्गम दार्चुलाबाट राष्ट्रिय बहसमा प्रवेश गराएको– संसद्मा बोलेर, पत्रिकामा लेखेर, सडकमा भाषण गरेर । २०५० को दशकको सुरुमा उनी एकोहोरो ढंगले लागि नपरेका भए बाँकी नेपाललाई कालापानीको संवेदनशीलता ग्रहण गर्न अझै समय लाग्थ्यो होला । अनि पत्रकारको ध्यान पनि सायद त्यता तानिने थिएन । त्यसै पनि समाजका थुप्रै ‘इस्यु’ हामी पत्रकारका नजरबाट छुटिरहेकै हुन्छन् ।
जिल्लाको राजनीतिबाट केन्द्रमा उक्लेर स्थापित हुन जो कोहीलाई सजिलो हुँदैन । धामी दार्चुलाबाट उठेर राष्ट्रिय जीवनमा प्रवेश पाएका विरलै नेतामध्येमा पर्थे । सदरमुकामलगायत दार्चुलाको दक्षिणी क्षेत्रमा खस–आर्य समुदायको बसोबास छ, उत्तरतर्फ अपि हिमालमाथिको व्यास क्षेत्रमा सौका जनजाति बस्छन् । त्यही व्यास क्षेत्रको ठूलो भूखण्ड भारतीय फौजको नियन्त्रणमा छ ।
धामी चाहिँ दक्षिणतर्फको हराभरा मल्लिकार्जुन गाउँका हुन् । उनी पञ्चायतकालमा शिक्षक थिए, त्यही बेला वामपन्थी राजनीतितर्फ तानिए । उनलाई तानेको अर्को विषय देशभक्तिले थियो । सीमापारि बाटो र विकास, वारिचाहिँ किन यस्तो अविकास ?       पारि जानासाथ ‘डोट्याल’ भन्दै हेपिनुपर्ने नियति किन ?       आदि प्रश्न गर्दै जाँदा आफ्नै जिल्लाको उत्तरी कुनो विदेशी नियन्त्रणमा रहेको धामीले थाहा पाए । अनि, त्यो कुरोलाई चर्को गरी राजधानीसम्म ल्याए ।
खासगरी २०५१ सालको मध्यावधि निर्वाचन जितेपछि उनले कालापानी अतिक्रमणबारे संसद्मा कुरा राखेका थिए । धामीभन्दा पहिले पनि यो मुद्दा राज्यको जानकारीमा नरहेको होइन, तर सकभर लुकाउन खोजिन्थ्यो । धामीले यसलाई राष्ट्रिय बहसमा ल्याइदिए । बोले, लेखे र हामीजस्ता पत्रकारलाई बताइदिए । त्यसैताका भारतसँग महाकाली एकीकृत विकाससम्बन्धी सन्धि गरिएपछि त्यो राष्ट्रिय सरोकारको मुद्दा बन्यो । कालापानी अतिक्रमणका कारण महाकालीको उद्गम किटान हुन सकेको थिएन । त्यसलाई बेवास्ता गर्दै सन्धि गरिएपछि धामी झनै आक्रामक भए ।
दार्चुलामुन्तिर डँडेलधुराका शेरबहादुर देउवा पहिलोचोटी प्रधानमन्त्री बनेको बेला थियो । उनले धामीलाई बोलाएर ठाडै हप्काए– बेकारमा समस्या किन चर्काएको भन्दै । अरू पार्टीका भए पनि देउवाका निम्ति त्यस भेगका सबै ‘आफ्नै’ मान्छे थिए । अचेल मात्र हो, दलीय आधारमा राजनीतिक शिविरहरू बन्न थालेको, नत्र पहिले शक्ति संरचनामा उपल्लो हैसियत बनाएका व्यक्तित्व नै सम्बन्धित भेगमा सर्वमान्य मानिन्थे । सुदूरपश्चिममा पहिले पूर्वप्रधानमन्त्री लोकेन्द्रबहादुर चन्द शक्तिकेन्द्र थिए, पछि देउवा । त्यसैले उनले धामीलाई सहजै हप्काउन खोजेका रहेछन् । धामीले त्यहाँ के जवाफ दिए थाहा भएन तर लगत्तै लेखे, ‘१९ हजार ६ सय हेक्टर जमीन कता हरायो प्रधानमन्त्रीज्यू ? ’
हक्की पनि थिए । लागेको कुरा लेख्न–बोल्न नडराउने । अस्ति भर्खर धामीका परममित्र हरि रोका र मैले त्यो प्रसंग सम्झियौं । त्यसैताका हुनुपर्छ, मैले अनौपचारिक गफगाफमा सोधें, ‘तपाईंलाई महाकाली र कालापानीको मुद्दाले यति धेरै किन छोएको ? ’
धामीको जवाफ अलि ठूलो स्वरमा निस्कियो, ‘तपार्इंहरूका निम्ति यो काठमाडौंबाट हेरिने एउटा मुद्दामात्र होला, तर हाम्रो निम्ति त आँखैअगाडि भइरहेको अन्याय हो– कसरी भुल्न सकिन्छ ? ’
यस्तो बुझाइ थियो उनको । एमालेबाट सांसद चुनिएपछि २०५१–५२ मा उनी मनमोहन अधिकारी नेतृत्वको नौ महिने अल्पमत सरकारमा आवास तथा भौतिक योजनामन्त्री पनि बने । तर, हाम्रा निम्ति उनी नेता कम, लेखक बढी थिए । पत्रकार र लेखकको जस्तो सम्बन्ध हुन्छ, हाम्रो हिमचिम त्यसभन्दा अलि बढी नै थियो ।
संयोगले संगत भएको थियो उनीसँग । नारायण ढकाल, हरि रोका, घनश्याम भुसाल, किशोर       श्रेष्ठ, रवीन्द्र अधिकारी, गुणराज लुइँटेल, विज्ञान शर्मा, विनोद ढुंगेल, टीकाराम राई, रविन सायमी, कल्याणबन्धु अर्याल आदि कसै न कसैसँग कहीँ न कहीँ धामी भेटिइरहन्थे । म उनको टिमको जुनियर सदस्य थिएँ ।
भारतसँग मात्र होइन, धामीहरू आफ्नै पार्टीभित्र पनि लडिरहेका थिए त्यसबखत । अहिलेका कतिपय राष्ट्रवादी नेताहरू उसबेला महाकाली सन्धिलाई ‘महान्’ मान्थे र बेकारमा ‘कालापानीको काउसो’ लगाएको ठान्थे । धामी ‘जनआस्था’ साप्ताहिकमा ‘नोट अफ डिसेन्ट’ स्तम्भमार्फत उनीहरूसित भिडिरहन्थे । लछुवा कोठारी उनको विम्ब थियो । महाकाली वारिपारि दुवैतिर सुनिने लोककथाका एक चर्चित पात्र हुन्– लछुवा कोठारी, जसका नौ छोरा र       श्रीमतीसँग जोडिएका अनेक कथा–उपकथाहरू त्यस भेगमा सुनिन्छन् ।
धामी त्यसैलाई आधार बनाएर आफ्ना नेताहरूको आलोचना गर्थे । २०५३ सालमा लेखेको ‘लछुवाकी       श्रीमती र पार्टीका नेताहरू’ शीर्षकको लेख अहिले पनि सम्झन्छु । धामीले लेख्दाबोल्दा लछुवा कोठारीको प्रसंग यति धेरै ल्याए कि पछिपछि नारायण ढकालले उनलाई नै ‘लछुवा कोठारी’ भनेर जिस्क्याउन थालेका थिए । ढकालले ‘शोकमग्न यात्री’ पुस्तकमा त्यसको उल्लेख पनि गरेका छन् ।
धामीले एकपटक ‘ब्वाँसा, सुँगुर र माछाको कथा’ शीर्षकमा प्रतीकात्मक टिप्पणी लेखे । कसप्रति लक्षित हो भनेर मैले सोधें । ‘आफैं बुझ्नोस् न,’ उनी फिस्स हाँसे । राजनीतिक लेखनमा साहित्यिक स्वाद मिसाउन खोज्ने खुबी धामीमा त्यत्तिकै आएको होइन रहेछ । उनी पहिला कथाहरू पनि लेख्दा रहेछन्, पछि थाहा भयो ।
उनी लेख्ने–बोल्नेमा मात्र होइन, व्यक्तिगत जीवनमा पनि रमाइला र रसिक थिए । उसबेला आमिर खान र उर्मिला मातोन्डरको ‘रंगिला’ फिल्म हिट भएको थियो । काठमाडौंमा अहिलेजस्तो ‘मल्टिप्लेक्स’ आइसकेका थिएनन् । सिनेमा हलको भीडमा राम्रो फिल्मको टिकट हात पार्नु आफैंमा महाभारतजस्तो हुन्थ्यो । खोइ कताबाट हो, भनसुन गरेर जेनतेन टिकट किन्न पाइयो । अनि हामी जाने भयौं– जमलको विश्वज्योति हलमा । हरि रोका, किशोर       श्रेष्ठ र अरू पनि केही थिए । हामीलाई त फरक पर्ने थिएन । प्रेमसिंह धामीलाई रंगिला हेर्न गएको कसैले देख्यो भने अनावश्यक ‘स्क्यान्डल’ बन्न सक्थ्यो । उनी नेता, भर्खरै मन्त्री पदबाट हटेका । त्यतिबेलाको समाज अहिले जति खुला भइसकेको थिएन । धामीकै पार्टीसमेत ‘कोकाकोला पिउँदा पनि कार्बाही गर्ने’ धङधङीबाट भर्खर बाहिर निस्कँदै थियो । रंगिला हेर्न गएको कुरा पार्टीभित्रै ‘इस्यु’ बन्ने खतरा थियो । धामी अग्लो मान्छे, परैबाट चिनिने । अन्तिममा उपाय निस्कियो । उनले अनुहार पूरै मफलरले बेरे, अनि अलि ठूलो टोपी लगाएर छिरे । कसैले ख्याल गरेन । रंगीन रंगिला हेरेरै छाडियो !
धामीसँग लामो संगत त हुन पाएन, तर छोटै अवधिका पनि अनेक किस्सा छन् । उनीसँग कुराकानी ग¥यो कि घुमिफिरी बीचमा कालापानी आइहाल्थ्यो । अन्ततः हामी उनका कुरा सुन्दासुन्दै कालापानीको रिपोर्टिङमा जाने भयौं । सिनासका ध्रुव कुमार सरले ‘नेपाल्स इन्डिया पोलिसी’ पुस्तकमा कालापानीमा भारतीय फौज रहेको सन्दर्भ उहिल्यै लेखिसकेको तथ्य केहीअघि पढेको थिएँ । म उनलाई भेट्न मण्डला बुक पोइन्ट पुगेँ, जो अहिले पनि बौद्धिक–प्राज्ञिक ‘जक्सन’का रूपमा परिचित छ । एक वर्षलाई हिरोसिमा युनिभर्सिटीतर्फ जान लागेका ध्रुव सरले मण्डलापछाडि चिया पिउँदै कालापानीको पृष्ठभूमिबारे थप व्याख्या गरिदिए ।
थाहा भयो– नेपालको उत्तरी सीमाका १८ ठाउँमा राखिएका भारतीय सैन्य चेकपोस्टहरू २०२६ सालमा हटाइँदा राजा महेन्द्रले कालापानीको चौकी भने रहन दिएका रहेछन् । त्यसबारे जानकार पूर्वमन्त्री एवम् लेखक ऋषिकेश शाहलाई सोधें । राजा महेन्द्रले ‘भारत धेरै रिसाएको, थप नचिढ्याउने’ उद्देश्यले त्यसबेला कालापानीप्रति आँखा चिम्लेको उनको भनाइ थियो ।
महेन्द्रले चिम्लेको आँखा धामीले खोले । २०५३ असोज– दसैं आउन लागेको थियो; फोटोपत्रकार यात्रा थुलुङ, पत्रकार गणेश खत्री र म दार्चुलातर्फ लाग्यौं । महेन्द्रनगर पुगेर जिल्ला प्रशासन कार्यालयबाट भारतीय बाटो हिँड्न पाउने अनुमतिपत्र लियौं । पिथौरागढ पुगेर एक रात बस्यौं, अनि भोलिपल्ट जौलजीविमा पास देखाएर धार्चुला पुग्यौं, जहाँबाट झोलुंगे पुल तरेर दार्चुलातर्फ पस्यौं । नेपालतर्फबाट सडक पुगेको थिएन, मोटरमा दार्चुला पुग्न भारतकै बाटो प्रयोग गर्नुपथ्र्यो ।
सदरमुकामबाट हामी लाग्यौं– कालीको तीरैतीर उत्तरतिर । धामी हाम्रा अप्रत्यक्ष गाइड थिए । उनैले सुझाएको बाटो पहिल्याउँदै, खुइँय् गर्दै उकालो चढ्दै गयौं हामी । पारिपट्टि भारतीय सैन्य शिविरहरू देखिन्थे, वारि फाट्टफुट्ट बस्ती । प्रायः बास गोठमा भयो । अपिको छेउ भएर हिमालपारि पुगेपछि जोसले तान्यो । तीन दिनमा हामी पुग्यौं छाङ्रु– दार्चुलाको सबैभन्दा उत्तरी गाउँ, जहाँ अल्पसंख्यक सौका जाति बस्छन् ।
फैलिएर बसेको छाङ्रु गाउँ मलाई रमाइलो लाग्यो । तिब्बतको ताक्लाकोट व्यापार गर्न जाने रुटमा पर्दो रहेछ यो ठाउँ । यहाँका सौका जाति हिउँ परेपछि सदरमुकाम झर्ने, बाँकी समय त्यहीँ बस्ने गर्दा रहेछन् । पुरानो समृद्ध इतिहास रहेछ यो ठाउँ र यो जातिको । सौका समुदायकै गोपालसिंह बोहोरा उसबेला नेपाली सेनामा ब्रिगेडियर रहेछन्, जो पछि धामीकै पार्टीबाट सभासद् भए । र, ‘कालापानी ः कथा र व्यथा’ किताब पनि लेखे ।
विजया दशमीको दिन अरूहरू घरमा टीका थाप्दै थिए होलान्, हामी भने कालापानीको खोजीमा निस्कियौं । झाडी पन्छाउँदै हिँड्दा केहीबेरमा पहिले घरहरू भएजस्तो खण्डहर देखियो । त्यहाँ वास्तवमा कुनै जमानामा नेपाली बस्ती रहेछ, जसलाई भारतीय सैन्यले उठ्न बाध्य पारेका रहेछन् । झन्डै तीन घन्टा हिँडेपछि हामी एउटा सानो डाँडामा उक्लियौं, जहाँबाट तल हेर्दा सैन्य शिविरहरू देखिए । मित्र यात्रा थुलुङले टेलिलेन्स लगाएर भटाभट फोटो खिच्न थाले ।
तलबाट बन्दुक बोकेका सिपाहीहरू कराउँदै आइहाले, ‘बन्द करो, बन्द करो ।’ अनि मंगोलियन अनुहारका यात्रालाई चिनियाँ भन्दै केरकार गर्न थालिहाले । हामीले परिचयपत्र आदि देखाएर आफ्नै भूमिमा आफूलाई नेपाली प्रमाणित गर्नुप¥यो । तिनले यात्राको क्यामेराबाट रिल पनि निकाल्न खोजे । धन्य, उनले पहिल्यै एउटा रिल निकालेर लुकाइसकेका रहेछन्, जसबाट धुलाइएको फोटो पछि कालापानीको ‘आइकोनिक फोटो’ बन्न पुग्यो ।
हामी पत्रकार हौं भन्ने कुरा बुझेपछि त्यहाँ रहेको ‘आईटीबीपी’ भनिने भारतीय अर्धसैन्य दस्ताका कमान्डर आए । उनले कुराकानीमा त्यो भारतीय भूमि नै रहेको दाबी गरे, तर उनीहरू सीमा अतिक्रमण गरेर बसिरहेको वस्तुस्थितिले नै देखाउँथ्यो । धामीले भन्दै आएको कुरो हो रहेछ । भारतीय सैन्य कालीवारि आएर गुम्बज आकारका दर्जन जति क्याम्पहरू बनाई बसेको आँखैले देखियो ।
सन् १८१६ को सुगौली सन्धिअनुसार, नेपाल–भारतको पश्चिमी सीमा महाकाली नदी हो । उक्त सन्धिका आधारमा बनाइएका सुरुआती नक्साहरूमा लिम्पियाधुरालाई महाकालीको मुहान मानिएको छ । पछिपछि लिम्पियाधुराभन्दा अलि पूर्वको लिपुलेकबाट झर्ने चार गुणा सानो नदीलाई महाकाली भन्न थालियो । अनि सन् १९६२ को भारत–चीन युद्धपछि लिपुलेकभन्दा करिब १० किलोमिटर दक्षिणको कालापानीमा कृत्रिम खोल्सो बनाएर त्यसैलाई कालीको उद्गम दाबी गरिएको थियो । लिपुलेकलाई नै महाकालीको मुहान मान्दा पनि भारतले त्यहाँ ३५ वर्ग किमिभन्दा बढी भू–भाग मिचेको देखिन्छ ।
कालापानी हुँदै लिपुलेक नाकाबाट प्रायः सबै मौसममा तिब्बततर्फ आउजाउ गर्न सकिन्छ । कैलाश–मानसरोबर जाने भारतीय तीर्थयात्रीका लागि सबैभन्दा नजिकको बाटो हो यो । चीन र भारतको राजधानी दिल्लीलाई जोड्ने सबैभन्दा छोटो दूरीको नाका पनि यही हो । त्यसैले यसको धार्मिक, व्यापारिक र सामरिक सबैखाले महत्व छ । र, सायद यसैकारण भारतले यो क्षेत्र नछाड्न मरेहत्ते गर्दै आएको छ ।
काठमाडौं फर्केर मैले ‘कालापानी, जहाँ नेपालभित्र भारतको राज छ’ शीर्षकमा लामो रिपोर्टिङ गरेँ । ‘मूल्यांकन’, ‘जनआस्था’ र ‘काठमाडौं टुडे’मा पनि समाचारहरू लेखेँ । नारायण वाग्ले र जोगेन्द्र घिमिरेले पनि त्यसैताका कालापानीको स्थलगत रिपोर्टिङ गरेर ‘कान्तिपुर’ र ‘काठमान्डु पोस्ट’मा लगातार लेखिरहे । अरूहरूले पनि कलम चलाए । सीमाविद् बुद्धिनारायण       श्रेष्ठ पनि जोसिए, जसका तथ्यपरक विश्लेषणले कालापानीको ‘डिस्कोर्स’लाई अगाडि बढाउन मद्दत पु¥यायो । अब धामी एक्लै रहेनन् । मिडियामा व्यापक कभरेजसँगै कालापानी राजनीतिक राडारमा चढ्यो ।
२०५४ सालमा महाकाली सन्धिलाई प्रतिनिधिसभाबाट अनुमोदन गरिँदा सँगै पारित राष्ट्रिय संकल्पमा महाकालीको उद्गम तय गर्ने (अर्थात् कालापानीको विवाद टुंग्याउने) प्रतिबद्धता जनाइयो । तर, त्यसलाई कार्यान्वयन गर्ने अग्रसरता कहिल्यै कसैले लिएन । त्यसै वर्ष भारतका उदारवादी प्रधानमन्त्री इन्दरकुमार गुजराल काठमाडौं आउँदा कालापानी द्विपक्षीय वार्ताको कार्यसूचीमा चढ्यो । नेपालको संसदीय टोली पनि कालापानी निरीक्षणमा पुग्यो । अखिलको विद्यार्थी टोलीले त त्यहाँ गएर खुकुरी नचाउँदै उग्र राष्ट्रवाद प्रदर्शन ग¥यो । त्यसैलाई बहाना बनाएर भारतीय पक्षले अझै वरसम्म तारजाली लगायो । तर, नाराबाजी जति गरियो, त्यसअनुरूप नेपालले कूटनीतिक प्रयास गर्न सकेन या चाहेन ।
धामीले उठाएको कालापानी मुद्दा पछि उनकै पार्टीका नेताहरूलाई समेत घाँडो हुन थालेको थियो । महाकाली सन्धि, कालापानीलगायतका विवाद बढ्दै गएर अन्ततः एमाले नै फुट्यो । त्यसबेला पार्टी फुटाएर माले बनाउने वामदेव गौतम त केही वर्षमा मातृ पार्टीमै फर्किए, तर कालापानीबाट भारतीय फौज फर्केन ।
त्यसभन्दा अगावै, २०५४ भदौ २७ गते अचानक एउटा दुःखद् खबर सुन्नुप¥यो । राष्ट्र बैंकमा कार्यरत कल्याणबन्धु अर्याल र म हतारहतार धामीको सानेपा डेरामा पुग्यौं । त्यहाँ पुग्दा उनी नुवाकोटको मदनपुरमा मोटर दुर्घटनामा परेको थाहा भयो । हामी मोटरसाइकलमा हानियौं त्यतातिर । पानी झमझम परिरहेको थियो । ककनी नपुग्दै भिजेर निथ्रुक्कै भइयो । घटनास्थल पुग्दा ४५ वर्षे धामी यो दुनियाँबाट टाढा पुगिसकेका रहेछन् ।
जसरी कालापानी विस्मृतिमा धकेलिँदै गयो, धामी पनि विस्तारै ओझेलमा पर्दै गए । गत संसदीय निर्वाचनका बेला दार्चुला सदरमुकाम पुग्दा एउटा कुनामा अचानक उनको थोत्रो सालिक देखेँ । आफ्नो गृह जिल्लामा उनलाई सम्झन त खोजिएको रहेछ, तर त्यसको राम्रोसँग रेखदेख नगरिँदा सम्मानभन्दा बढी बिजोग अवस्था देखियो ।
अचेल कालापानी पत्रिकाको पानामा सीमित भएको छ । राजनीतिक दलका नेताहरू त सकभर यो प्रकरणतर्फ फर्कनै चाहँदैनन् । द्विदेशीय वार्ताको कार्यसूचीबाट पनि यो हटे सरह छ । धामीको अभाव यहीँनेर खट्किन्छ । उनी पनि समयक्रममा अरूजस्तै बद्लिन्थे कि थाहा छैन, तर भौतिक रूपमा नभएको हुँदा विश्वास गरिरहन सकिँदो रहेछ । त्यसैले जहिले–जहिले कालापानीको प्रसंग आउँछ, म धामीलाई सम्झिहाल्छु; अनि उनको प्रिय पात्र लछुवा कोठारीलाई ।