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Saturday, June 6, 2020

झुुसिया दमाइ

झूसिया दमाई : कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की जीवंत कड़ी

झूसिया दमाई : कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की जीवंत कड़ी
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बस्कोट (नेपाल) में जन्मे झूसिया दमाई (जन्म: 1910, मृत्युः 16 नवम्बर 2005) जितने नेपाल के थे उतने ही भारत के भी और जितने भारत में फैले हैं उतने ही नेपाल में भी. उनकी रिश्तेदारी, जाति-बिरादरी दोनों देशों में समान रूप से है. स्वयं उनके कुछ विवाह भारत में हुये तो कुछ नेपाल में. उनके कुछ ‘गुसाँई’ भारत में हैं तो कुछ नेपाल में. उनकी कुछ जमीन नेपाल में हैं तो कुछ भारत में. वह रणसैनी मन्दिर (नेपाल) के खानदानी दमुवाँ-वादक और वीरगाथा- गायक थे तो ढूंगातोली (भारत) में वह मन्दिर में जाकर ‘द्योल’ (नौबत) बजाते, चैत के महीने में घर-घर जाकर ऋतुरैण गाते/सुनाते थे-
जो भागी जी रौलो सो ऋतु सुणलो.
जो पापी बड़न्छ कहाँ ई सुणन्छ रीत्यो.
द्विय दिन का ज्यूना म भलो नै बोलनू,
गिड़ला ऊँछी पलती भड़ पाय बिन्दी की बिनती,
कै भाँती करी हालछा साबा सर्द की.

(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
(इस ऋतु में मैं हर वर्ष यह कथा तुम्हें सुनाऊँगा. कि भाग्यवान, पुण्यवान लोग इसे सुनेंगे. इस दो दिन की जिन्दगी में बोल-वचन ही तो रह जाते हैं आदमी के.)
यद्यपि झूसिया की बोली प्रचलित कुमाउँनी से कुछ भिन्न है. इस पर भी जब वह गाते थे तो शब्दों का संगीतमय तथा लयात्मक उच्चारण जटिलता को और बढ़ा देता था. किन्तु जब हम थोड़ा-सा गौर से उनकी मौखिक परम्परा को समझने की कोशिश करते हैं, उसे तत्कालीन ऐतिहासिक सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हैं, तो झूसिया धीरे-धीरे समझ में आने लगते हैं.
Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand
रणसैनी नेपाल में वीरगाथा गाते झूसिया
दरअसल ‘लोक-थात’ की मौखिक परम्परा में वीरगाथा गायन ‘झूसिया’ का खानदानी पेशा था. सामान्यतया ‘ऋतुरैण’, जो कि भाई बहिन के स्नेहिल और वेदनापूर्ण उदास कथानक पर आधारित है और जिसे सुनकर आज भी माँ-बहिनें अनायास ही रुआंसी हो उठती हैं या रो पड़ती हैं- ऐसे कथानक भी ‘झूसिया’ वीरगाथा के अंदाज में ही गाते-सुनाते थे. इसलिये ‘झूसिया’ वीरगाथा गायक थे. वह जो कुछ गाते थे, उसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा था. उनके पिता ‘रनुवां दमाई’ और उनके अन्य पूर्वज भी गाथा-गायन, दमुवाँ-वादन ही किया करते थे. झूसिया की दोनों पत्नियाँ ‘सरस्वती’ और ‘हजारी’ उनके साथ ‘ह्योव’ भरतीं ‘भाग’ लगाती थीं. अभिप्राय यह कि झूसिया जो कुछ गाते थे वह उनकी परम्परा-परिपाटी रही. इसलिये उसमें तत्कालीन कुमाऊँ और नेपाल का सम्मिलित इतिहास, भूगोल, समाज व्यवस्था, आर्थिक-राजनैतिक दशा, धार्मिक- सांस्कृतिक मान्यताएँ सभी कुछ सन्निहित है.
बस्कोट, रणसैनी, पुजारागाँव-झूसिया जहाँ जन्मे, पले और बड़े हुये तक पहुँचने के लिये पिथौरागढ़ से जाना होता है झूलाघाट. फिर सीधी चढ़ाई (पैदल मार्ग) पहुँचाती है रणसैनी के पास कच्चे मोटर मार्ग में. जिस पर अभी जीपें ही चलती हैं. बैतड़ी से नेपाल के अन्य स्थानों के लिये ‘गोठलापानी’ से बसें मिलती हैं. ‘गोठलापानी’ की चोटी पर है ‘गढ़ी’. पश्चिमी नेपाल का यह क्षेत्र नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री लोक बहादुर चंद का भी इलाका है. यहीं जन्मे थे राजशाही के खिलाफ लोकतंत्र के समर्थक शहीद दशरथ चंद और यहीं जन्मे इन ‘चन्दों’ की, इनके पूर्वजों की वंशावली जानने-सुनाने वाले झूसिया दमाई.
यहीं पर मैं याद करना चाहता हूँ ‘झूसिया’ के बड़े बेटे चक्रराम दमाई को जो गीत और नाटक प्रभाग नैनीताल में कलाकार थे और जिन्हें ‘झूसिया’ के साथ गाते-बजाते-नाचते हमने देखा-सुना है. चक्रराम दमाई कई अर्थों में ‘झूसिया’ के टक्कर के ही नहीं बल्कि उनसे आगे के थे- खास तौर पर ढोल वादन में. दुर्भाग्यवश वह पहले ही चल दिये.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
हाँ, तो हम फिर आ जाते हैं ‘झूसिया’ पर. झूसिया माने-सामन्ती मानसिकता लिये वर्तमान के द्वंद्वों को बड़ी सहनशीलता और चातुर्य के साथ समरस करने वाला एक गपोड़’ व्यक्ति. ‘नोटों’ और विक्टोरियाई रुपयों की खन-खन से औरत खरीदने वाला व्यक्ति. एक मछली कम हो जाने पर या मछली खा लेने पर, औरत को घर से निकाल देने वाला व्यक्ति. और अपने जीवन की इन घटनाओं को गर्व से सुनाने वाला व्यक्ति. जीवन में पाँच शादियाँ करने वाला व्यक्ति, दो पत्नियों में बड़ी सहजता से सामंजस्य बिठाये रखने वाला व्यक्ति.
Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand
और इन सबके साथ-साथ कालीतट की भारतीय और नेपाली साझी संस्कृति की मौखिक परम्परा की महत्वपूर्ण और जीवंत कड़ी बन जाने वाला व्यक्ति. कहने का मतलब एक इतिहास थे झूसिया दमाई जिसमें उनकी ‘जग-सुनी’ भी है और ‘आप-बीती’ भी. बड़ी कुशलता के साथ ‘जग-बीती’ में ‘आप-बीती’ जोड़ देते थे वह
गंगा बीच छाड़ि गे छै, न वार नै पार
तेरा पीछा लागी रयूँ,
हाँ ऽऽ बयासी साल में तुमार शरण में आयूँ राजा,
है ऽ राजा उ ऽ ता ऽ रिऽ ये पार हा ऽऽ आ ऽऽ
(बीच गंगा-धार में छूटा हुआ बेसहारा मैं, तुम्हारा सहारा पा रहा हूँ अब- बयासी वर्ष की उम्र में. सो हे मित्रो! पार लगा देना मेरी नय्या.)
यह ‘संग्राम कार्की’ वीरगाथा में गाया गया ‘बैर’ का टुकड़ा है. जिसमें झूसिया अपना दुख, अपनी बात कह गये हैं. वीरगाथा में वर्तमान को जोड़ गये हैं. वर्तमान को जोड़ने का यह क्रम झूसिया में ही नहीं सभी ‘असल’ लोक-गायकों में अकसर मिलता ही है. और यही रचनात्मकता किसी भी लोकगायक को अपने समय का लोक नायक’ बनाने में महत्वपूर्ण कारक बनती है. हमारे समय के अन्य लोकगायकों-गोपीदास, जोगाराम, मोहन सिंह रीठागाड़ी- सभी में यह गुण मौजूद था.  
यहाँ पर प्रसंगवश यह बात कही जानी चाहिए कि जीवन तो सदा प्रवहमान है ही लेकिन उसकी ‘लोकथात’ के प्रवाह को बनाये रखने में उसे अभिव्यक्ति देने वाले लोककलाकार मुख्य भूमिका निभाते हैं. वेदपाठी और ‘लोक-कण्ठी’ में एक अन्तर यह भी है. लोक कलाकारों के इसी महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही लोक की मौखिक परम्परा सदा प्रवहमान, गतिशील और जीवंत रहती है. किसी भी लोककलाकार का योगदान यही होता है कि वह अपनी रचनात्मकता उस ‘लोकथात’ में जोड़ देता है जो उसे पीढ़ी दर पीढ़ी से मिली होती है
गढ़ चम्पावत को दरबार म
बड़ी राजा ईजड़, का पाठ बीजड़
का पाठ कलिश, का पाठ गुणापिङा….
(गढ़ चम्पावत में- बड़े राजा ईजड़, ईजड़ के पुत्र बीजड़, बीजड़ के कलिष, कलिष के गुणापिङा….)
झूसिया दमाई मूलत: वीरगाथा-गायक थे. ‘संग्राम-कार्की’ उनकी प्रिय वीरगाथा है. झूसिया इसे जहाँ से चाहें शुरू कर सकते थे, जहाँ से चाहें समेट सकते थे. संग्राम-गाथा झूसिया की जेब में समझिये. संभवत: यही कारण है कि लोक की मौखिक परम्परा की जितनी भी शैलियाँ झूसिया के पास थीं, लोकाभिव्यक्ति की जो बहुरंगी अभिव्यंजना और स्पष्टता उनके पास थी, सौन्दर्यबोध की जो गहराई थी, मुहावरों और ध्वनि बिम्बों का जो खजाना था, लोकसंगीत-लोक लयकारी की जो विविधता थी, उन सबका सर्वाधिक प्रयोग झूसिया इस गाथा को गाने-सुनाने में करते थे.
झूसिया का संग्राम कार्की सुन लिया तो शिल्प (फॉर्म) के स्तर पर समझिये झूसिया पूरे सुन और देख लिये. ‘देख लिये’ इसलिए कि झूसिया वीरगाथा सिर्फ सुनाते नहीं बल्कि सुनाने के साथ-साथ उसकी नृत्यात्मक अभिनयात्मक अभिव्यक्ति भी करते थे.
वीरगाथा-गायन में उनके इतना चर्चित होने का एक मुख्य कारण उनकी अभिनयात्मक-नृत्यात्मक अभिव्यक्ति भी है, जो उन्हें छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पण्डवानी गायिका तीजनबाई के नजदीक ले जाती है. झूसिया दमाई को देखकर तीजनबाई और तीजनबाई को देखकर झूसिया दमाई बरबस याद आ जाते हैं. कथा-बखानी में, बात को समझाने में, कथा आगे बढ़ाने में ‘तीजन’ का शिल्प जिस तरह उनकी मदद करता है, कथा-गायन की एकरसता तोड़ता है- बिलकुल वही बात, वही तेवर झूसिया में देखने को मिलते थे. बल्कि तीजन से झूसिया एक कदम आगे ठहरते हैं अपने हुड़का-वादन के कारण. यहाँ पर मैं झूसिया को तीजन से महान साबित नहीं कर रहा हूँ, यह न मेरा उद्देश्य है और न वास्तविकता. मैं बस अपनी बात को समझाने के लिए तीजन का सहारा भर ले रहा हूँ. यह सच्चाई है कि नाचते-नाचते हुड़का बजाना, उस पर लयकारी दिखाना, ताल से खेलना अद्भुत होता था झूसिया का.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
गाथा-गायन प्रस्तुत करते समय ‘झूसिया’ की एक निश्चित वेष-भूषा होती थी- रंग-बिरंगा घेरदार पेटीकोट नुमा झगुला, कुर्ता, वास्कट, पगड़ी, कमर में फेटा और हुड़के में बँधी चँवर गाय के पूँछ की लटी, जो उनकी पीठ पर नृत्य के साथ अद्भुत गति से डोलती रहती थी. उनका ‘हुड़का’ भी सामान्य हुड़का नहीं था, उसमें अपेक्षाकृत भारी-भारी घाँट-घण्टियाँ लगी थीं, जो उन्हें अलग-अलग मन्दिरों से सम्मान के तौर पर मिली थीं. हुड़के के इसी वजन के कारण वह हुड़के को कंधे में डालने के साथ-साथ उसक एक ‘ताँणा’ (डोरी-संतुलित करने के लिये) कमर में भी बाँधते थे, जो सिर्फ उनकी ही विशेषता थी. अपनी उक्त वेश-भूषा में सज-सँवर कर नृत्य के साथ गाथा गायन करते हुए ‘झूसिया’ कथा के सूत्रधार होते थे और पात्र भी, गायक होते थे और वादक-नर्तक भी. बिना वेश-भूषा के अपने गायन को तो वह कार्यक्रम ही नहीं मानते थे.
एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने आकाशवाणी कार्यक्रमों के संदर्भ में कहा है-‘खाली ‘ट्यैस्ट’ होता है वहाँ आवाज का, बंद कमरे में, और सिर्फ ढाई हजार रुपया मिलता है हमेशा. कोई प्रोग्राम नहीं होता वहाँ.’ मतलब स्टूडियो रिकार्डिंग कोई कार्यक्रम नहीं था उनकी नजर में.
(Jhusia Damai Folk Music artiste Uttarakhand)
गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ का यह लेख पहाड़ पत्रिका के पिथौरागढ़-चम्पावत अंक में छपा है. काफल ट्री ने पहाड़ पत्रिका के पिथौरागढ़-चम्पावत अंक से यह लेख साभार लिया है.

Friday, May 8, 2020

मष्टो , कुलदेवता र परम्परा

( साभार- नयाँपत्रिकामा प्रकाशित डा, माधब प्रसाद पोखरेलको मष्टो हाम्रो कुलदेवता शिर्षकको लेखबाट )
 सबैजसो पहाडे खस नेपालीले दिनहुँ ‘कुलाइन’ (कुलायन, कुलदेउता) लाई साँझ बत्ती बाल्नु पर्छ । कुलाइनको दियो कसैलाई छुन दिनु हुँदैन, मूल खाट र मूल ओच्छ्यानमा अरुलाई सुत्न अथवा छुन दिइँदैन । कुलाइनको दियो बालेको ठाउँमा पनि अरुलाई जान दिइँदैन । कुलाइनको पूजा गर्ने कोठामा अरुलाई छिर्न पनि दिइँदैन । वैशाखे पूर्णिमा र मङ्सिरे पूर्णिमामा सके देवाली (दीपावली) गरेर गोठको धूप हाल्नु पर्छ, नसके पनि कुलाइनको पूजा चाहिँ गर्नै पर्छ । कुलाइनको पूजा बर्तमन (व्रतबन्ध) गरेका छोराले मात्र गर्नु हुन्छ ।
कुलाइनको पूजामा नगरी नहुने र गर्नै नहुने अनेक औपचारिकताहरू छन् । परम्परादेखि आएको पूजा विधिमा भरसक फरक नपरोस् भन्ने हरेक खस नेपालीलाई थाहा हुन्छ । रमानन्द आचार्य (जुम्ला) के भन्दछन् भने, मस्टालाई अरुले छुनु हुँदैन, घर बाहेककाले मस्टाको थानमा जानु हुँदैन अनि नुहाएर मात्र मस्टाको थानमा जानु हुन्छ । औपचारिकतामा कतै अलिकति पनि त्रुटि भयो भने, पिरपिराउ हुन्छ भन्ने मानिन्छ । देवाली नगरेको अथवा गोठको धूप नहालेको वर्षमा आफ्ना गाईको दुधमा चिउरा हाल्नु हुँदैन । 
परम्परादेखि चलेर आएको कुल पूजामा भरसक फरक नपरोस् भनेर जति चिताए पनि समय क्रममा पश्चिम पहाडबाट पूर्व तिर सरेको कुल पूजामा ठावैँ पिच्छे औपचारिकतामा अलि अलि फरक पर्दो रहेछ । यसले गर्दा पूर्वको र पश्चिमका कुलदेवता, पूजा विधि र औपचारिकतामा धेरै फरक परेको देखिन्छ । जुम्लाबाटै मस्टा अरु तिर गएको मानिन्छ ।
सबै पहाडे खस (बाहुन, छेत्री, ठकुरी, कामी, दमाईँ, सार्की, गाइने, बादी, आदि) हरूको मूल कुल देवता मस्टो हो । उदाहरणका लागि पूर्वका पानी पोखरेलका एउटा मुख्य कुलदेउता काला मस्ट हुन् । अर्का कुलदेवताको नाम ‘आदि वाराह’ छ । मनोहर लामिछानेले एउटा मस्टाको नाम ‘वराह’ पनि लेखेका छन्, त्यसैलाई सिवाकोटी (२०१४ इ) ले ‘बारामस्टा’ लेखेको सूचना उनैले दिएका छन् । यसरी एक भाइ मस्टाको नाम ‘वराह’ नै हुन पनि सक्छ । खसान भरि मस्टाहरू १२ भाइ छन् भन्ने किंवदन्ति छ, त्यसै अनुसार एउटा मस्टाको नाउँ नै ‘बारमस्ट’ अथवा ‘बारामस्ट’ भएको पनि हुन सक्छ ।
खसहरू कुलाइनको पूजा चुलाको भर्सेलीमा पनि गर्छन् । कुलाइनको पूजा जुन ठाउँमा गरे पनि हामी भर्सेलीका बिचमा ‘मन्डाल्नी’ लाई कुलदेवी भनेर पूजा गर्छौँ । मन्डाल्नीलाई दुध र सेतो फुलले पूजा गर्नु पर्छ, उनलाई मासु चढ्दैन भनेर हुम्लाको सिमकोटमा एउटा माडौँ (मण्डप) का डाङ्रेले मलाई सुनाएका थिए । मन्डाल्नी हाम्री सबभन्दा ठुली कुलदेवी हुन् ।
कालिकोटमा चाहिँ तुलाराज बिस्टले ‘बन्डाल्नी’ भन्ने एउटी राक्षसीलाई खसहरू पूजा गर्छन् भन्ने सूचना दिएका थिए । त्यहाँ पचालो, खापर, नैनेल (नदी किनाराका देउता) र राँगा माचुलो जस्ता राक्षस देउता पनि पुजिन्छन् अरे । यसरी ठाउँ अनुसार कुनै खसले देउता मानी रहेकालाई अर्को ठाउँका खसले राक्षस मानेको पनि पाइने रहेछ । अवेस्तामा देउतालाई ‘असुर’ भनिन्छ भने राक्षसलाई चाहिँ ‘दएव’ (देव) भनिन्छ (विलियम मलन्द्रा, १९८३ इ, ‘एन इन्ट्रोडक्सन टु इरानियन इन्स्क्रिप्सन्स’, पृ० ४७)। ‘असुर’ शब्द ऋग्वेदमा १०५ पल्ट प्रयोग गरिएको छ, जस मध्ये नराम्रो अर्थमा चाहिँ १५ पल्ट मात्र र राम्रो अर्थमा चाहिँ ९० पल्ट प्रयोग भएको छ (विकिपिडिया)। आर्यहरूकै दुई खाले बगाल बिचमा भएको वैमनस्यले गर्दा ‘देव’ र ‘असुर’ शब्दमा अर्थ परिवर्तन भएको रहेछ । मन्डाल्नीलाई अन्यत्रका खसहरूले देवी मान्ने कालिकोटमा चाहिँ राक्षसी मानेर पूजा गर्ने चलनमा पनि त्यस्तै परेको हुन सक्छ ।
मनोहर लामिछाने र प्रेम कैदीले मस्टाका सूचनाको मूल स्रोत खसानका ‘फाग’, ‘सगुन’, ‘हुड्केली’ र ‘भारत’ जस्ता लोक गाथामा पाइने कुरो गरेका छन् ।
खसान क्षेत्र (कर्णाली र सुदूर पश्चिम) मा मस्टो नै सबै भन्दा ठुलो देउता हो । सबैलाई दुधको दुध पानीको पानी छुट्याएर न्याय दिन सक्ने भएकाले मस्टा नै त्यहाँ गरिबगुरुवामा सबै भन्दा प्यारा छन् । खसानमा मस्टाको निर्णय जुनसुकै मुद्दामा सर्वस्वीकार्य हुन्छ । त्यहाँ मस्टालाई ‘दैलाका देउ’ का रूपमा पुजिन्छ । मस्टाका धामीको ठुलो सामाजिक भूमिका हुन्छ । खसानमा धामीका माध्यमबाट मस्टा नै क्षेत्र रक्षक र न्याय कर्ता हुन् । मस्टाको धामीले पतुर्दै अक्षताको टीको लगाई दिने, घण्टले टाउको छोई दिने र आसिक दिने गर्दा सुब्बेफाब्बे हुन्छ भन्ने जन विश्वास पाइन्छ ।
आफुले चिताएको सबै कुरो पु‍¥याई दिने भएकाले ठुलो आस्थाले खसानका मानिसहरू मस्टाको पूजा गर्छन् । मस्टाको पूजा विधि पनि ठाउँ अनुसार फरक पर्छ । लामिछाने (सल्यान) को सूचना अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमीमा थानमा पूजा गर्ने चलन भएपनि साउन शुक्ल पूर्णिमामा मस्टाको पूजा धूमधामसित हुन्छ । कुल पूजा (देवाली) चाहिँ कार्तिक पूर्णिमा र जेठ पूर्णिमामा गरिन्छ । देवाली ३, ५, ७, ८, १२ वर्षमा गरिन्छ, तर प्रायजसो वर्षको २ पल्ट गरिन्छ । पूर्वी नेपालमा चाहिँ कुल पूजा वैसाखे पुर्नियाँ र मङ्सिरे पुर्नियाँमा गरिन्छ । कुलदेउतालाई कात्तिक पूर्णिमामा न्वागी चढाउने गरिन्छ । न्वागी खानकै लागि धामीहरू विभिन्न गाउँमा जाने चलन छ । नयाँ बालीलाई न्वागी भन्दछन् । कुनै ठाउँमा चाहिँ मस्टाको पूजा आइत बार र बुध बार गरिन्छ भन्ने लामिछानेको सूचना छ ।
आर डी प्रभास ‘चटौत’ (डँडेल्धुरा), मनोहर लामिछाने (सल्यान) र रमानन्द आचार्य (जुम्ला) ले दिएको सूचना अनुसार मस्टाको थान, माडौँ, माणु खुल्ला हुन्छ, त्यहाँ छानो हुँदैन, मूर्ति हुँदैन, ढुङ्गो थापेर अथवा खोपामै पूजा गरिन्छ। आफुलाई समस्या पर्दा मस्टालाई जहाँ पनि स्मरण गरे पुग्छ । वन थलो माणु र घर थलो माणु गरी माणु पनि दुई किसिमको हुन्छ, वनमाणुमा चाहिँ लिङ्गो हुन्छ, विशेष पूजा मात्र हुन्छ, तर घरमाणुमा नै दैनिक पूजा हुन्छ । मस्टाको थानमा ‘आलम’ (ध्वजा पताकाको लिङ्गो) गाडिएको हुन्छ ।
मस्टाको आगम (वा गुह्य स्थान) लाई ‘गब्युर’ (गर्भगृह?) भनिन्छ । मस्टाको थानमा तिन ओटा गर्भगृह हुन्छन् (रमानन्द)। गब्युरसँगै गाडिने आलम सहितकै लिङ्गो प्राय धामीले पतुर्ने मस्टाको थानमा मात्रै फहराउँछ । मस्टाको थान भित्र र वरपर ढुङ्गा, काठ, तामा, पित्तल, काँस, आदिका मूर्ति, त्रिशूल, रुद्राक्षका माला, दियो, र शङ्खघण्ट हुन्छ (आचार्य)। बझाङमा चाहिँ मस्टाले गद्धी (‘पाट’ भनिने काठको खाट) मा दर्शन दिने कुरो सुनाउँदै डा. लक्ष्मी पण्डित के भन्दछन् भने त्यहाँ ‘वनमाणु र घरमाणुको भेद हुँदैन, पुजारीको घरमै मस्टाको कम्पन हुन्छ । 
मस्टाको थान भित्रै एक भागमा माटाको मैरो बनाइएको हुन्छ, जसलाई गादी भन्दछन् । मन्दिरमा चारै तिर ढुङ्गाले बारेर सामान्य धजा, फलामको सोटा (एक प्रकारको राजदण्ड) र घण्टहरू राखिएका हुन्छन् । थान वा मन्दिर प्राय उत्तर (कैलास?) तिर फर्केका हुन्छन् (लामिछाने) । मस्टाको नजिकै देवी थान हुन्छ, (जस्तै, डोटीको शैलेश्वरी मन्दिरकै पछाडि चण्डेश्वरी भैरव थानको २० मिटर जति दूरीमा छेत्रपाल दुधे मस्टाको थान छ) । मस्टा र भवानीको नाउँसँगै भैरव, झाँक्री, सिद्ध, बेताल, जस्ता देउताहरूको नाउँ प्राय जोडिन्छ (लक्ष्मीदत्त अवस्थी) ।
लामिछाने अनुसार मस्टा र भवानी दाजु बहिनी भए पनि मस्टाका परिवारमा मस्टाका भतिजा, मामा, भान्जा, भान्जी र सेवकहरू पनि भएको विश्वास गरिन्छ । मस्टाको थान नजिकै दायाँ बायाँ अलिक पर विभिन्न प्रकारका स्थानीय भूत, प्रेत, पितर, भैयार, सासल्या, बज्रठिङ्ग्याल, खोल्या, महाकाल (मकाल), भैरव, लाटो, तेडी, समैजी र बेताल जस्ता डुलुवाहरूको भाग मस्टाको छुट्याइएको हुन्छ । यस्ता स्थानीय देव र भूतप्रेतलाई मस्टाले नै नियन्त्रण गर्ने विश्वास गरिन्छ । मुगु र हुम्ला तिर लामाज्यु भनेर पनि मस्टासितै पूजा गरिन्छ (बौद्ध प्रभाव?) । 
मस्टाको पूजाआजामा धामी, डाङ्री, पुजारी, दमाईँ र कबिलास (कैलास भाक्ने) नियुक्त हुन्छन् । मस्टाको धामीले रुद्राक्षको माला लगाउँछन्, कपाल पाल्छन्, त्रिशूल, चिम्टा र फलामको लौरो लिन्छन् (आचार्य)। मस्टाको धामी ईश्वरीय शक्ति भएको मानिन्छ । धेरै धामी भएका ठाउँमा एक जना मुख्य धामी र अरु सहायक धामी हुन्छन् । मूल धामी गादीको मुख्य अधिकारी हुन्छ । मस्टा उत्पत्तिका मुख्य ठाउँबाट अरु ठाउँका धामीलाई छाप अथवा लालमोहर दिने पनि चलन हुन्छ । मस्टाको धामी र पुजारीको जुनसुकै जात हुन सक्छ । धामी पछिको अधिकारी डाङ्रीले थानको रेखदेख, पूजाका भाँडाकुँडा र अरु सामग्रीको सुरक्षा गर्छ । मस्टाको धामी नाच्ता दमाईँहरूले दमाहा बजाउने हुनाले दमाईँहरू पनि मन्दिरकै सहायक मानिन्छन् (लामिछाने) ।
मस्टाको सबै भन्दा ठुलो प्रभाव क्षेत्र जुम्ला हो । जुम्लाको पश्चिम तिर पनि पूर्व तिर पनि मस्टाको प्रभाव कम छ, कालिकोटमा मस्टाका विशिष्ट बेहोराहरू देखिन्छन् । कुमाउँ र गढवालमा पनि मस्टो मानिन्छ । मस्टाको उत्पत्ति स्थल मानसरोवरदेखि कर्णाली सम्म मानिन्छ । आचार्य भन्दछन्, ‘धामीका पडेली (भकाइ)’ मा इन्द्रलाई मस्टाका बाबु भन्छन्, मस्टा ‘भोटमा उब्जेका’ भनेर चिनाउँछन्, मस्टाको पूजामा आराध्य देव शिव नै हुन्छन्, अनि वन, पाटन हुँदै मस्टा हिँडडुल गर्छन् । 
मनोहर लेख्छन्, बाल ब्रह्मचारी मस्टालाई निराकार मानेर रूपमा पूजा गरिँदैन । मस्टाको मूर्ति हुँदैन, ढुङ्गो थापेर पूजा गरिन्छ । मस्टालाई वायु रूपको हुन्छ पनि भनिन्छ । शिवजीले सबै प्राणीको पालन, पोषण र रक्षा गर्न खटाएका गण मस्टा हुन् । मस्टो उदारता र समन्वयको प्रतिमूर्ति हो । कुलचन्द्र कोइराला मस्टो शब्दको व्युत्पत्ति नै ‘मरुत्, मरुत्तस्’ (वायु) बाट भएको मान्दछन् ।
मस्टालाई खसान क्षेत्रका कुलदेउता, क्षेत्रपाल अर्थात् त्यस क्षेत्रका रक्षक, भूमिपति, अरु स्थानीय देउतालाई पनि नियन्त्रण गर्न सक्ने, परम शक्तिशाली देउता मानिन्छ । आचार्य मस्टाको गोत्र वामदेव (शिवकै नाउँ) हो भन्दछन् । डा. जयराज पन्त (डोटी) ले शिवजी र पार्वतीको गणका रूपमा मस्टो लोक कल्याण कार्यमा खटिएको जनाएका छन् । मस्टाको धामीले पडेली र कैरण पतुर्दा खस प्राकृत भाषा बोल्छ । भारत, हुड्केली, गाथा, फाग र सगुनमा जस्तो भाषा पाइन्छ, त्यताको धामीले पतुर्दा त्यतै तिरको बोली प्रयोग गरेको देखिन्छ (लामिछाने)।
चटौतले अमरकोशमा ‘मश्’ धातुको अर्थ ‘रिसाउनु’, ‘कराउनु’, ‘तपस्या गर्नु’, ‘हिंसा गर्नु’ बाट मस्टाको अर्थ खोजेका छन् । ‘शब्दकल्पद्रुम’ मा त्यसै सम्बन्धी ‘मक्ष’ धातुको अर्थ पनि ‘रिसाउनु’, ‘कुट्नु’, ‘कराउनु’, ‘मार्नु’, ‘फल दिनु’ पाइन्छ । चटौतले भेस बदलेर वा प्रकट भएर कसैको परीक्षा लिनु, भविष्यवाणी गर्नु, भलो हुने कुरो बोली दिनु (सात्विक गुण), अनि ‘चोट पु‍-याउनु’, ‘क्षति गर्नु’ (रजोगुण) भन्ने अर्थ मस्टासित मिल्ने ‘मश्’ धातुबाट निकालेका छन् । आचार्यले ‘शिवमहिम्नस्तोत्र’ मा शिवलाई ‘महिष्ठः’ भनेको कुरो अघि सार्दै ‘मस्टो’ शब्द त्यसै शब्दबाट व्युत्पन्न भएको निर्णय दिएका छन् । ‘मस्टो’ लाई स्थानीय जन जिब्राले ‘मइठो देउ’ (महिष्ठ देवः) भन्दछ । यसबाट ‘मस्टो’, ‘महिठो’ अथवा ‘मइठो’ शब्द भगवान शिव जनाउने ‘महिष्ठः’ शब्दबाट बनेको रहेछ भन्ने अर्थ निस्किन्छ । इरानीहरूको ‘अवेस्ता’ मा मुख्य देवताको नाउँ ‘अहुर मज्दा’ भन्ने पाइन्छ । आचार्यको भनाइ मान्नु हो भने, ‘अहुर मज्दा’ भन्ने शब्द संस्कृतको ‘असुर महिष्ठः’ भन्ने शब्दबाट बनेको प्रमाणित हुन्छ । आप्टेको ‘संस्कृत शब्द कोश’ अनुसार ‘महिष्ठः’ शब्दको अर्थ ‘महान् देव’ (अर्थात् महादेव) हुन्छ । 
विलियम मलन्द्रा (१९८३ इ, एन इन्ट्रोडक्सन टु एन्सिएन्ट इरानियन रिलिजन) ले इरानी अखामनीहरूको अभिलेख (पृ० ४५) मा ‘अहुरस्य मज्दाह्’ (असुरस्य महिष्ठ?) भेटेका छन् । त्यस अभिलेखमा ‘अन्तिम जनाधिक्यका वेलामा मज्दाले यिमसित (शिवले यमसित?) सामूहिक सल्लाह गरे’ (१७६) भन्ने लेखिएको छ । कुज्मिना (२००७ इ, हिष्ट्रियर अफ इन्डोइरानियन्स) ले इरानी आर्यहरू वैदिक आर्यसँग छुट्टिएर दक्षिण तिर लाग्दा यमले नेतृत्व गरेका थिए भन्ने लेखेकी छिन् । यमलाई अवेस्तामा ‘यिम’ भनिएको छ । हिन्दुकुशको स्वात उपत्यकामा इन्द्रलाई ‘यिम्र’ भनिएको छ ।
यसरी ‘यिम’, ‘यम’, ‘यिम्र’ र ‘इन्द्र’ को साइनो गाँसिन्छ (पर्पोला, २०१५ इ, ‘रुट्स अफ हिन्दुइज्म’) । लामिछानेले मस्टालाई इन्द्रको सन्तान मानिने भएकाले ‘इन्द्र गादी’ (इन्द्रासन) इन्द्रबाटै मस्टाले अधिकारमा पाएको विश्वास गरिन्छ, त्यसैले धामीहरू गादी (मैरो) मा काम्दै उफ्रेर चढ्छन् अनि यसरी काम्दा ‘देउता चढ्नेङ चढ्ने, जिउ चढ्ने, औतार लिने’ हुनाले मस्टाको बोली देव वाणीमा परिणत हुन्छ भन्ने लेखेका छन् । मस्टाहरू आफुलाई इन्द्रका छोरा (शिवजी इन्द्रका छोरा?) भनेर चिनाउँछन् भन्दै लक्ष्मी पण्डित ‘इन्द्रको जायो (छोरो) मइठो (मस्टो) बोलायो’ भन्ने बझाङको उखान सुनाउँछन् । पण्डितको भनाइ अनुसार मस्टाकी ‘आमा मन्डाल्नी, बाबु इन्द्र’ हुन् । इन्द्रको मूल्याहा छोरो भएकाले मस्टालाई इन्द्रले पातालमा फ्याँकी दिएको किंवदन्ति बझाङमा छ अरे । सोमयाग, महाव्रत, राजसूय, वाजपेय र अश्वमेध यज्ञमा व्रात्यहरूलाई देउताले स्वर्ग लगेनन् भन्ने प्रसङ्ग आउँछ । अथर्व वेदमा शिवजीलाई नै व्रात्य भनिएको छ (पर्पोला, २०१५ इ) ।
खसान क्षेत्रमा प्रचलित लोक कथा र गाथा अनुसार दक्ष यज्ञ नाश गरेपछि शिव गण मध्ये वीरभद्र जस्ता केही चाहिँ शिवजीमा लीन हुन चाहे, तर केहीले चाहिँ वायु रूपमा घुम्ने, मान्छेको जिब्राले बोल्ने इच्छा गरे । मस्टा तिनै शिव गण हुन् (आचार्य)। अर्को लोक कथा अनुसार असुर (दक्ष?, रावण?, जालन्धर?, शङ्खचूड?, अन्धकासुर?) हरूले शिवकी भगवतीलाई दुव्र्यवहार गरी बन्दी बनाएकाले शिवजीले आफ्ना गण (विनायक?, गणेश?, स्कन्द?) हरूलाई मुक्त गर्न लगाए । गणहरूले मस्तक थापेर युद्ध गरी जिती ल्याएका (मस्तकमा राखेर भगवतीलाई ल्याएका?) हुनाले त्यही मस्तकबाट मस्टो शब्द बनेको हो (लामिछाने) । मानसरोवरमा विहार गर्ने क्रममा शिवजीको वीर्यपात भएर दन्दनी बलेको आगो स्वर्गबाट नुहाउन आएका दुइटी अप्सराले तापेकाले एउटीले कालिका, मालिका र दुर्गा जन्माएको र अर्कीले मस्टो जन्माएको पनि मिथक छ (लामिछाने) । भैरव र सिद्धका रूपमा पनि मस्टा पुजिएको सूचना पनि पाइएको छ ।घोडा नै मस्टाको प्रमुख वाहन हो, तर भेडा, चितुवा र जाड्या पनि मस्टाका वाहन मानिएका छन् ।
घोडा नै मस्टाको प्रमुख वाहन हो, तर भेडा, चितुवा र जाड्या पनि मस्टाका वाहन मानिएका छन्
मस्टाहरू १२ भाइ छन् र उपभेद ८४ छन् भन्ने किंवदन्ति खसानभरमा छ अनि त्यो उपभेदको आधार धामी हो (आचार्य), तर सूचकहरूबाट बटुलेका मस्टाका नामहरू गनी साध्य छैन, जस्तै, (१) उखाडी, उखड्या (मनोहर):आचार्य अनुसार यो मस्टाको मूल थलो जुम्लाको उखाडी हो । (२) कवा, कः, कावु (मनोहर): ‘कवा’ मस्टाको मूल थान मुगु हो । ‘कवा’ मस्टालाई केश अर्थात् कपालको आँठो चढाउँछन्, (आचार्य)। मनोहर ‘कौवा’ मस्टाको मूल थलो ‘कौवा लेक’ लेख्छन् । (३) कालोसिल्टो, कालसिला, काल्सिला, काला, काल्या, ‘कालाशिला विनायक मस्टो’ (बिस्ट, कालिकोट), (४) क्षेत्रपाल, छेत्रपाल्या : पूर्ण धितालको भनाइ अनुसार क्षेत्रपाल मस्टालाई समन्वयकारी मस्टो मानिन्छ, क्षेत्रपाल मस्टाको माडौँ जुम्लाको धिताल्नी गाउँ हो । (५) खापड, खापर : खापर मस्टाको माडौँ कालिकोटको पलाँता गाउँ हो (धिताल)। लामिछाने चाहिँ कालो खापडे अर्थात्, खापर मस्टाको माडौँ खप्तड हो भन्दछन् । 
(६) ढणार, ढँडार, ढँडारे : आदि मस्टाका रूपमा पुजिने यो जेठो भाइको मूल थलो बझाङको ढँडार हो । ‘रातो ढँडार’ भन्ने बेग्लै मस्टो पनि छ कि? ‘ढँणार फुट्यो, पखान छुट्यो’ भन्ने उखानको अर्थ हो : ढँडारको प्रवाहमा प्रवाहित हुँदै जल, थल, पाखापखेरा सबै मस्टामय भए (पण्डित)। (७) थार्पा, थापर, थापरे, थार्प, थार्पो मस्टालाई सर्वज्ञ र विद्वान् मस्टो मानिन्छ । मुगुको थार्पा भन्ने ठाउँ यसको मूल थलो हो । मुगुमा ‘मस्टो पोखरी’ छ (धिताल)। (८) दाढ्या, ढाडे, दाढे, दारे : धिताल अनुसार चमत्कारी दाढ्या मस्टाको माडौँ मुगु हो । जुम्लाकै आचार्य चाहिँ दाढ्या मस्टाको मूल थलो दुल्लु हो भन्दछन् । सल्यानका लामिछाने चाहिँ ‘दारे’ मस्टाको मूल थलो जुम्ला, मुगु र जाजरकोट लेख्छन् । (९) दुध्या, दुधे, दुधेसिल्टो : यो ‘दुध खाने सात्विक’ मस्टाको मूल थलो दुल्लु हो (आचार्य) । यो मस्टो शाकाहारी हो अरे । (१०) बाम, बाओँ, बाहाँ : धिताल अनुसार बाओँ मस्टाको माडौँ जुम्लाको बाओँ गाउँ हो । बाओँलाई सुरक्षा दिने देउता मानिन्छ । आचार्य चाहिँ ‘बाहाँ’, ‘बाम’ मस्टाको मूल थलो मुगु भन्दछन् ।)
(११) बाबिरो, बाबिरा : धिताल अनुसार जुम्लाको खलङ्गा नजिकैको बाबिरा गाउँ बाबिरो मस्टाको माडौँ हो। आचार्य बाबिरो मस्टालाई कान्छो भाइ भनेर चिनाउँछन् । बालकृष्ण पोखरेल (२०५५, खस जातिको इतिहास, २४०) ले ‘(बाबिरो) मस्टा’ शब्दको साइनो इरानी ‘(बाबैरुरा) मज्दा’ सँग जोडेका छन् र बाबिरो मस्टाले खसहरूलाई एकातिर असुरसित अर्कातिर बेबिलोनसित जोड्छ भन्ने विचार व्यक्त गरेका छन् (लामिछाने)। (१२) बिजुल्डाणो : आचार्य यस मस्टाको मूल थलो जाजरकोटको ब्वारेकोट मान्दछन् । (१३) बुढो, बुढाल, बुडु, बड : जुम्लामा बुडु मस्टालाई नै सर्वशक्तिमान् मस्टो मानिन्छ । बुडु मस्टाको माडौँ जुम्लाको बुडु गाउँ हो (धिताल) । बुडु नै सबै भन्दा जेठो मस्टो हो । (१४) रमाल, रुमाल, रुमाल्या मस्टाको मूल थलो लामिछाने (अछामको?) ‘खिड्कीसैनी’ लेख्छन् । (१५) लाडे, लरे, लाट्या, लाटो, ‘लट्टे, जटाधारी’ मस्टो इमान र न्यायको देउता हो, जसको माडौँ जुम्लाको सन्जेलबाडा हो (धिताल), तर जुम्लाकै आचार्य चाहिँ लाटो मस्टाको मूल थलो हुम्ला भन्दछन् । (१६) सुनारगाउँ, सुनारगाउँले मस्टाको मूल थलो जुम्लाकै सुनारगाउँ हो (आचार्य) । 
लामिछानेले दिएका मस्टाका अरु नाउँ यस्ता छन् : उडिसिला, कमल, कलि, कुर्मी, कैडल्यो, कैलास, क्यँडालो, खुन्दात, खुन्दाल, गुणे, गुरौ, ‘गुरो’ (मूल थलो हुम्ला र मुगु), घुरापानी, जिय, टेठ्या, टेढी, ‘तेडी’ (मूल थलो डोटी), डाङ्री, डोग्री, तुसापानी (ढुसापानी), पुवाँले, बान्नी, बाँसकोट‍¥या, बाँस्यालो, माङ्ले, मुण्डा, रुद्र, लाकुड्या, लाङ्खुरे, लिउडी, वनपाला, वराह, बारामस्टा, सुकिलो हंस र सुन्दरगाउँले । 
तुलाराज बिस्ट लिङ्गासैनी मस्टलाई भगवान शिव मान्दछन् । उल्लेख गरिएका सूचकहरूले मस्टाका अरु नाम र किसिम पनि चिनाएका छन्, जस्तै कामत, कैल्या, डढी सिमल, डाँडा, थोते, धौलपुरा, धौलपुर, धौलपुरे, धवलपुरी, बिजुल, मण्डल्या, मुढ्या, म्हावै, वाँ, लरिचाल, लाङ्डा, लेखाडी, लोखाडी, साइन, सिम । स्थान भेद र उच्चारण भेदले पनि मस्टाको सङ्ख्या बढेको पाइन्छ । 
स्वभावका दृष्टिले मस्टा तिन किसिमका पाइएका छन् : (अ) रजोगुणी मस्टाले रगतको वलि खान्छन्, जस्तै,  जेठो आदि मस्टो, रुमाल मस्टो, दाह्रे, खप्पर, खपरे, र टेढी । दारे मस्टाको धामीले दाँतले बोकाको घाँटी टोकेर वलि स्वीकार्छ । दारेबाटै थोते मस्टो जन्मेको मानिन्छ । (आ) सत्वगुणी मस्टाले दुध र खिरको वलि मात्र खान्छन्, जस्तै, दुधे र लडे । (इ) सर्वाहारी मस्टाले जस्तो वलि पनि खान्छन्, जस्तै, मुण्डा, रुद्र, कैली, काला र रानी मस्टाहरू ।
पण्डित के भन्छन् भने, ठाउँका नाउँले मात्र मस्टाको सत्या धेरै देखिएको हो, नत्र मस्टो एउटै मात्र हो । त्यसका मूलतः ३ किसिमका रूप हुन्छन् : (अ) दाढ्या (दाँत देखाउने अर्थात्, भोग खाने), (आ) दुध्या (दुध खाने), (इ) रोड्या (न्यायाधीश)। उनको भनाइ अनुसार बझाङमा मस्टालाई मासु चढाइँदैन, दही चामलले मात्र पुजिन्छ । 
बाह्र भाइ मस्टा र नौ बहिनी भवानी भन्ने प्रसिद्ध भए पनि भवानीका नाउँमा पनि एकरूपता पाइँदैन । लक्ष्मी पण्डित भन्दछन्, मस्टालाई बझाङ तिर १६ बहिनीको ‘एकलो भाइ’ भनेर चिनाउने चलन छ । भवानीहरूका नाउँ यस्ता भेटिन्छन् :
अलकनन्दा, कनकसुन्दरी, कालिका, खेसमालिनी, चुली मालिका (कालिकोट), जालपादेवी, ठिङ्ग्याल्ली, डिँग्याल्नी (.गद्धीनसिन), थिगेल्नी, त्रिपुरासुन्दरी, दुधे भवानी (जुम्ला), दुलेल्ली, नदई (जुम्ला), निगालासैनी (डोटी, बैतडी), पुँगेल्नी, पुँग्याल्नी (.अधिकारिणी), पुगमालिका (कालिकोट), पोटलासैनी (डोटी, बैतडी), बडी मालिका (कालिकोट), बन्डाल्नी (पूर्ण धितालको भनाइ अनुसार यिनै सबभन्दा ठुली देवी हुन् ।
आचार्य यी देवीको वैकल्पिक नाम मण्डाल्नी भन्दछन् । बिस्टले चाहिँ बन्डाल्नीलाई जङ्गलमा पूजा गरिने राक्षसी देवी भनेर चिनाए । आचार्य इन्द्र पत्नी ‘मस्टाली’ लाई चाहिँ दैत्य मानिन्छ भन्दछन् ।), बिन्द्रवासिनी, (डोटी, बैतडी, अवस्थी), बिन्दासैनी, भवानी, भुजेल्नी (जुम्ला), मङ्गलासैनी (डोटी, बैतडी),मालिका, रामारानी (रामारानीका रूपमा खसानसँग जडान संस्कृतिको एउटा बाहोँ मिसिएको पाइन्छ), शैलेश्वरी वा शिलादेवी (डोटी, बैतडी), सुन्दरादेवी, ह्रूपा देवी (अग्ला टाकुरामा बस्ने, ऋषितर्पणीमा मात्र पुजिने, कालिकोट)। आचार्य भवानीहरूलाई मस्टाका अनुचरी भनेर चिनाउँछन् भने अरुले बहिनी भनेर चिनाएका छन् ।

Monday, February 17, 2020

कालापानी सिमानाका पुराना सम्झना

कालापानी सिमानाका पुराना सम्झना

  कालापानी- कल्लाताल
बैतडी दार्चुलातिर धेरै होहल्लालाइ कल्लाताल भनिन्छ । आजभोली सुदुर पश्चिमोत्तरको त्रिदेशीय सीमाक्षेत्र कालापानी- लिम्पियाधुरा-लिपुलेक क्षेत्रका बारेमा देशैभरि कल्लाताल भएको अवस्था छ । यो उहिले हुनु पर्थ्यो । तर थाहै नभएर होइन, निहित स्वार्थका कारण लामो समयसम्म नेतृत्वले धुँवाएको समस्यामाथि पातपतिंगर हाली रह्यो । आगो बल्न थालेपछि बल्ल पानी खोज्न थालेकोछ । देशभरी हल्लैहल्ला भएकोछ ।
  कालापानी त्यसै पनि श्रुतिमधुर शब्द लाग्दैन । अती दुर्गम अस्वास्थ्यकर टाढाको अप्ठ्यारो ठाउलाई पनि बोलचालमा कालापानी भनिने प्रचलन छ । तर चर्चित कालापानी क्षेत्र दुर्गम भए पनि हेर्न बुझ्न लायक थियो र अझै सामरिक महत्वको छ । यस बारेमा भैरहेको कल्लाताल सुनेर त्यहाँको पुराना अस्पष्ट बिंबहरुले शब्दचित्र कोर्न थाल्दा अझै पुर्ब- सम्झनाले शरीरमा काँडा उम्रिन्छन् । 
उहिलेको पहिलो कालापानी यात्रा
 बिक्रम सम्बत २०३६ को कुरा हो । एक छोराको बाबू भैसक्दा पनि उमेरले गधेपच्चिसी नाघेको थिएन । एस एल सी सकेर तीन बर्ष जति ग्राम समितिमा काम गरेको मात्र अनुभव थियो । लोकसेवा आयोगको जाँच दिदा दार्चुलाको जिल्ला प्रशासन कार्यालयमा सिफारिस पाए । सरकारी नौकरीतर्फको यो पहिलो यात्रामा त अर्कैै संयोग जुरेको रहेछ। अफिस पुगेपछि मात्र थाहा भयो, हाजिर नहुँदै मेरो पदस्थापन उत्तरी सीमा प्रशासन व्यासमा  भैैसकेको थियो । केही चलाक मित्रहरुले आफुु अनुकुल हुने दाउ हानिसकेका रहेछन् । 
तीन दिनको बिकट बाटो । दार्चुला सदर मुकामबाट झण्डैै सय किलोमिटर टाढाको छांग्रुमा गर्मी  ६ महिना र जाडो ६ महिना खलंगामा कार्यालय खोल्नुपर्ने प्रचलन रहेछ । अती बिकट ब्यास गर्खामा जानुपर्ने गरि दरबन्दि पारेकोमा त्यहाँ नजाउ कि जस्तो पनि लाग्यो । साथीहरुसंग सल्लाह गरे । नियतिले यसपालि हिमालयकै हावा खान खटाएको मानेर चित्त बुझाए । 
  निदानत: सीमा प्रशासन शाखामामा जानै पर्ने भएको हुदा ब्यासबाट खलंगा आउने भएका सीमा प्रशासन अधिकृतलाई पर्खि बसे ।  उनले हाजिर भएको मितिदेखि तलब भत्ता खाने गरि नियुक्ति दिने भनेर ठाडो तोक आदेश लेखी दिए र आफु लुस्सुक्क काठमाण्डौ लागे । ब्यासमा एक जना मुखिया मात्र अफिस कुरुवा बस्नु भएको रहेछ । त्यहाँ हाजिर हुन जान ३ दिन हिडनु पर्ने थियो ।  न माथि न तल हुने गरि सदरमुकाममै झुन्डिएर केही दिन सारै तनावमा बिताए । २८ भाद्रमा सीमा प्रशासन कार्यालयमा मेरो बारे भएको निर्णय पत्र पठाए । असौजमा कार्यालय नै तल खलंगामा सर्ने भएकोले ` देखा जायेगा´ भन्दै आफू भने बैतडी फर्के र घर कुरेर बसे ।
  दशै  सकिएपछि घरमा कामको चटारो थियो । सौका मात्र बस्ने अति टाढाको अपरिचित गाउँठाउँमा जान कसैको सहमति थिएन ।  भेडाको बथानमा करपछ भरी बोकेर ल्याइएको ढिके नून अनाजसंग साटन हिउदमा हाम्रा गाउँतिर पनि आइरहने सौका ब्यापारीलाइ  हुनिया( हुण ) बस्ने दूरदेशका बासिन्दा मानिन्थे । 
त्यहि जान हिडेको बिहान गजाल( खरबारी ) को बाटोमा शीतका दाना चम्किदै थिए । झ्याउकिरी कराउदै केही भनि रहेको थियो । उदास मन लिएर बुवा आमा र घरलाई ढोके । इष्ट कुलदेवता बस्ने ग्वाल्लेकधाम तिर हात जोडे । तिहारको रमझम नकुरी म ब्यासभुमीको यात्रामा निक्लिए । झन्डै आधा घन्टा हिडेर पदमपुरबाट फर्कि हेरेको त सानो कुटुरो पिठ्युमा र अढाइ महिने शिशु तेर्सो गरि काखमा बोकेर आफनै घरवाली हुत्तिदै ओरालो झरी रहेकी देखे । पर्खिए । एक्लै बस्न नसक्ने ठानेर छोरो बोकी जिद्दी गरेर आएकी रे । नाना विधि हप्काए, सम्झाए । अन्तत: उनलाइ माइतमा छोडेर झुलाघाट  पिथौरागढको बाटो दोस्रो दिन धारचुला हुँदै दार्चुला पुगे । नयाँ नौकरी र नयाँ परीबेशसित जुध्नु पर्ने जो थियो ।
  पहिलो ब्यास बसाइ सर्नका लागि केही जोरजाम गरियो । ०३६ असौज २३ गते जिबनको  लामो र बिकट उत्तरापन्थको यात्रामा सहयात्री बन्यौ - म र हरीदत्त २ खरिदार, १/१ मुखिया, पियन, जुनियर हेल्थवर्कर, हवल्दार र कन्सटेबल । जम्मा ७ जना । दार्चुलाको उत्तरी सीमा प्रशासनमा खटिएको यस सिजनको अन्तिम सरकारी टोली थियो यो ।
श्रीभावर, बडुगाँव, स्याकु, हुति, सुनसेरा, राप्ला, दुमलिङ,थिँ ,निगु, बुदि, छियालेक, गर्ब्याङ, सितापुल जस्ता कैयौ स्थान छिचोल्न पुरै तिनदिन लाग्यो । विहान साढे चार बजे अँध्यारोमै उठिन्थ्यो । कहिले त राति आठ बजेसम्म हिडिन्थ्यो । बिकट भिर, निपट जंगल, बाँदर लोटने बाटो, सुनसान बस्ति, तिंकर घोडेटो काटने काममा खटिएका ज्यामीहरु बसेका ओढार । यात्रा दुष्कर थियो । यात्रि हौसलावान थियौ । र पो महाकालीको किनारै किनार बुदिबाट प्रबेशाज्ञा बेगर भारत प्रबेश गरि सितापुलबाट सुटुक्क नेपालको छांगरु छिरेका थियौ । यो कालापानी पुग्ने नेपालको निकटतमबस्ती थियो । यहि थियो सीमा प्रशासन कार्यालय,मेरो पहिलो जागिरे थलो र मेरो पहिलो पाँचदिने यात्राको अन्तिम गन्तव्य । 
  आगनमै हिमालय । चौरी र झुपुका बथान । सौकाहरुको भावभुमी । कालिदासको मेघदुत पिथौरागढबाट किनेर लगेको थिए । थकित शरीर र आल्हादित मनले आद्योपान्त पढें । पुराना साथिहरुले खानपिनको जुगाडबाजी मिलाउथे । भ्याङ्कर, चिपु  भनिने सिङ्गै तिब्बतियन खसी सय पचासमै पाइन्थे । च्याक्ति भनिने मत्ताउने घरेलु मदिराको छेलोखेलो थियो । गोर्खाली जागिरेको चल्तिको खान्गी नै यहि हुन्थ्यो । काम गराइ यस्तो थियो कि गत महिनाको निर्णयको आधारमा आफुले आफुलाइ नै नियुक्तिपत्र दिनुपर्ने भयो निमित्त हाकिम बनेर । नियुक्ति पहिला लिने कि निमित्त हाकिम पहिला बन्ने प्रश्नमा पहिलो निर्णयबाट एक थान अर्को जागिरको श्रीगणेश गरियो । मेसको सहभोज चलाएका थियौ । खाँदिएर लहरै सुत्थ्यौ । मन लागे जति तास खेलिन्थ्यो  । कसैसंग वा भनौ शेष दुनियासंग सम्पर्क थिएन । रेडियो समेत सपष्ट नसुनिने एउटो मायावी संसार थियो । 
  हिउँका सेता चुुचुराहरु मुनिका बृक्षबिहीन पखेरा । त्यस मुनि ससाना झाडी हुँदै कहालिलाग्दा लेकहरु । तल बेसीमा जता हेर्यो त्यतै राम्रो लाग्ने फूूलका मैदानहरु । नेपाल यति विशाल छ र यहाँ विबिध भाषा-उपभाषा, संस्कृति- उपसंस्कृतिहरु भए पनि एक अर्काको हृदयको भाषा सबै नेपालीले बुझ्छन भन्ने मैले पहिलोचोटि महसूस गरे ।  जिब्रोले मात्र हैन, आँँखाले, औलाले, दाँत-ओठ, अनुहारले पनि बोलिदो रहेछ । स्थानिय बोली पट्टकै नआउने हुदा यस्तै " सार्बभौम " भाषाले काम चलाए । हिमाली पर्वतहरुको सियालोमा २०३६ को तिहार ब्यास क्षेत्र रुङेर सकियो ।
  आजभोलि प्रेस रिपोर्टको भरमा बनेका कालापानी बारेका थुुप्रो जानकार भेेट्टिन्छन् । हामीले त्यसबेलाको  त्यो विषम परिस्थितिमा पनि सरकारलाई स्थलगत प्रतिबेदन दिएका थियौ । कालापानीको अतिक्रमण र महाकाली मूलको निरुपणबारे सरकारको सपष्ट निर्देशन चाहन्थ्यौ ।  सुनेका थियौ, पहिले भारतको प्राइमरि कक्षाको भुुगोलमा समेत " महाकाली नदि जोलिङकाङ पर्बत से निकलति है" भनेर पढाइन्थ्यो रे । हामीले नेपाली बिश्वज्ञान अनुसार सबभन्दा ठुलो भनेर फेवा ताल र महाकालीको मुहान भनेर कालापानीलाई जानेका थयौ ।  विडम्बना, कालापानी(?!) बाट काली नदि निक्लिएको बिबादित तथ्य बारे एकीन गरेर केही भन्न सक्ने अझै भएका छैनौ । सरकारी नौकरीको पहिलो चरण त्यहि कालापानीबाट मात्र १०/१५ किमि तल छांग्रु स्थित जिल्ला प्रशासन कार्यालय, सीमा प्रशासन शााखा, ब्यासको खरिदारको हैसियतमा धेरै कुरा देखि जान्ने भएर खेपियो  ।
  पहिलो खेपको यो यात्राबाट खलंगातिर फर्कदा भारतको मात्र बाटो हिडेर धारचुलाबाट दार्चुला छिर्ने योजना बनाए । एक जना मुखिया र स्वास्थ्यकर्मि साथमा लिई  गर्ब्याङ, छियालेक, बुदि माल्पा, सिर्खा सिरदाङ, रङलिङटाप, पाङ्गु र तावाधाटको बाटो हिडियो । बाटोमा भारी बोकाएका कुन्जाहरु ( झुपु खच्चरका बथान) देखिन्थे । अप्ठ्यारा मोडहरुमा " साबधान, खच्चर गिरनेका भय है" भनेर ळेखिएको देखिन्थ्यो । सबै ठाउँमा नेपालको जस्तै भुगोल  थियो । तावाघाट माथि घोडेटो बाटो नजिक ठाउठाउँमा सरकारी डाकबंगला( गेष्ट हाउस ) थिए । आपतको बेला बिजुली बाल्नका लागी बिजुलीका तारहरु तान्न मिल्ने गरि पोल समेत गाडिएका र ठाउ ठाउमा ब्यारेक बङ्कर देखिन्थे । तीन दिनपछि धारचुलाबाट दार्चुला सदरमुकाम पुगेर मात्र पहिलो कुल तलबभत्ता ५२८/- बुझियो  । नियुक्ति लिएको ४ महिनापछि हाकिमको मातहत काम गर्ने मौका मिलेको थियो । बस्तुस्थितिको जानकारी गराउने बिषयको काज लिएर काठमाण्डौ गएर फर्केका हाकिमको गफ सुन्नुपर्ने बाहेक केही नयाँ काम थिएन । त्यो हिउद दार्चुला सदरमुकाममा काटियो ।
  यसैताका ब्यास जाने बाटोतिर राप्लापारीको एक जना भारतिय चेकपोष्ट अफिसरले रक्सी खान र रमाइलो गर्न अबैध पुलबाट सिमावारी नेपाल पसेर उधुम मचाएछ । गाउलेहरुसंग झगडा परेर राति भाग्न खोज्दा लडेर खुट्टा भाँचिइ पक्रिएको थियो  । सीमाक्षेत्रको घटना हुँदा यो काण्ड ब्यबस्थापन गर्न केही दिन लाग्यो । टुटेको खुट्टा सहित भारतलाइ बुझाउदा उ “पशुपतिनाथ ने मुझे मेरी करनी कि सजाय दि है “ भनेर रुदै थियो । यस्तै पशुपतिनाथले रक्षा गर्नेछन भन्ने बिश्वासका साथ हामीले पनि अफिसको  काम यथाक्रम मिलाएका थियौ । पाक्षिक र मासिक प्रतिबेदन नियमित पठाउथ्यौ । प्राय: " कालापानी सीमानामा अतिक्रमण भएकोछ, हुदैछ । आबश्यक कारवाहि यथाशिघ्र शुरु गरियोस " भनेर एउटै कुरा केही शब्द फरक पारेर लेख्न छुटाउदैनथ्यौ ।
 त्यसै बर्ष पुस १ गते पंचायति सम्बिधान संशोधन भै बालिग मताधिकाारको प्राबधान राखिएको थियो । दलीय कि निर्दलिय भन्नेमा जनमत संग्रह हुनुपर्ने थियो । यो जनमत संग्रह बैसाख २० मा तय भयो । म चैत्र १४ गतेदेखि नै निर्बाचनमा काज गए । दिनचर्याले गियर बदल्यो । जनमतसंग्रहको कारण दोस्रो  बर्ष गर्मीमा ब्यास जान नपर्ने होला कि भनेर उत्साहित थिए । प्रतिदिनको सातरुपैया ओभरटाइममा चुनाव आयोगमा थप काम समेत गरेको थिए । केही दिन तत्कालिन अंचलाधिश ऋतुबर्ण तुम्बाहाम्फे र अंचल प्रहरी उपरिक्षक को मुकाम दार्चुलामै राखिएको थियो । 
  मलाइ पनि पहिलो पल्ट कनिष्ट कर्मचारीबाटै जनमत संग्रहको काममा खंडेश्वरी गाउँ पन्चायतको घुसा मतदान केन्द्रमा  मतदान अधिकृत तोकियो । ब्यास गर्खाको पुर्बमा पर्ने अपि हिमालको दक्षिणी पाखो । ठ्याक्कै ब्यासको जस्तै भुगोल भएका तीन बस्ति थिए-लिथि, पाटु र घुसा । चमेलिया सिरानका उतरी अन्तिम बस्ती मध्येका थिए यी गाउँहरु । विशेष भत्ता १४/-, ढुवानी १३५/-, मसलंद३२/-, बुथ निर्माण १५०/-, टि ए १९८/-, डि ए ३२५/- गरि ८५४/- रुपिया बुझे । चुनावमा सहयोगी थिए मु खेमराज भट्ट पियन मनोरथ बडु , प्र ह बहादुर बोहरा समेत छ जना । दल्लेक, सिप्टि, सेरि चौलानेको किनारै किनार लटिनाथ मकरिगाड हुँदै घुसा पुग्न चार दिन लाग्यो । भीरमा अडिएको सानो स्कुल अपि नाम्फा हिमालको फेदमै थियो । मतदान केन्द्र यहि स्कुल तोकिएको थियो ।५ कक्षासम्म २ शिक्षकले पढाउथे। नजिकै हेल्थपोष्ट  थियो । बैसाख २० मा रमाइलो बाताबरणमा भोटिङ भयो । ३३१ अर्थात ७३% मत खसेर । तेस्रो दिन आठ बजे राति मतबक्स बुझाउन भ्याए । 
दोस्रो पटकको यात्रा ; हिमालपारी मानसरोबरसम्म
    २४ गते मार्शल टिटो को अवसानमा राष्टिय शोकको बिदा थियो । मलाइ भने दोस्रोपल्ट पनि ब्यास जानैपर्ने आदेश भयो । तयारीस्वरुप कपडा धुदाधुदै छाला खुइलिएर हातमा रगत आएको थाहा भएन । २ दिन आराम गर्नु पर्ने भयो । चलेका औलाले लेख्दैजादा पछि आँसुले यसलाई पखाल्न सक्दैन भन्ने लागेर डायरीमा मनोबाद लेखेको रहेछु  । ब्यासतिर पठाउन लागि सामान किनमेल गरि ६ क्विन्टलसम्मका बोझा भरिया कुन्जावालहरुको जिम्मा लगाउने प्रबन्ध मिलाएर भेटघाट गर्न बैतडी घरतिर लागे ।
   मानसरोबरको नजिक पर्ने ब्यास क्षेत्रमा फेरी फर्कनुपर्ने कुरागर्दा गाउँमा गुरुजी र पिताजीले मानसरोबर तिर्थाटनका कुरा निकाले । त्यतिबेला मानसरोबर जाने एकमेब मार्ग यहि थियो । पाण्डबहरु पनि यसै बाटो स्वर्ग गएका थिए रे । मलाई पनि उत्तरी सीमासम्म जानै पर्ने थियो । सबै सामान्य तयारी पूरा गरी  पिताजी, गुरुजी, म र प्र ह बहादुर बोहरा मानस यात्री हुने भयौ । पछि एक जना भगत भट्टजी बाटोमा थपिए । सेकेन सटरडेको बिदा हुदा पिथौरागढबाट पास ( अनुमतिपत्र) बनाउन तीन दिन लाग्ने भयो । त्यसबेला जोलजीबीभन्दा उभो जाँदा पिथौरागढको जिल्ला मजिष्ट्रेटबाट यात्रा अनुमति लिनु पर्दथ्यो । जे जस्तो पर्ला भन्दै यतिकै हिडियो । जोलजीबी चेकपोष्टमा पुलिससंग अनुनय बिनय गरेर धारचुला पार ग-यौ । आफनै अफिसमा बासको ब्यबस्था मिलाइयो ।   साउन संक्रान्ति दार्चुला सदरमुकाममा मनाई अर्को दिन लागियो कैलाश मानसरोबरको यात्रामा । भंसारका एक जना बहिदार हामीसंगै जाने भए । प्र जि अ द्वारिकानाथका पिताजी, प्रशासकीय अधिकृत भुबनेश्वर जोशी र दार्चुला तिंकर घोडेटो बाटोका केही कर्मचारीको अर्को ग्रुप पनि हाराहारीमै हिडेका हुन्थे । श्रीबगर, बडुगाँव, स्याकू हुँदै सुनसेरा पुग्दा झमक्कै रात परिसकेको थियो । घोडेटोको गोदाममा थन्कियौ । येनकेन खाना पकाउने जुगाड पनि गरियो । तुषरपानि, राप्ला हुँदै राङथलमा नुहाई खाना खाइयो । बेलुका दुमलिङ बस्यौ । अर्को दिनको बाटो पुर्णरुपमा निर्जन थियो । बाटोमा उदरपुर्तिको मेसो  मिलाउन सकिएन । बाँकी ईश्वरेच्छामा छोडी अगाडी लाग्यौ । तंबाकुबाट २ जना भरिया भेटिए । हाम्रा निम्ति ती पथप्रदर्शक भै दिए । दिनभर थिङको ठाडो उकालो, अनि त्यस्तै ओरालो । बोकेको भुटेको पिठोको भरमा हिड्यौ । राति निगुको गीताभवनमा बाटो भन्दा एकडेढ कि मि पर गएर एउटै घर थियो । त्यतै लाग्यौ । हामीजस्तै २०/२५ जना पहिले नै जम्मा थिए । बृद्ध सौका दम्पतिको नित्यचर्या नै यस्तै तीर्थयात्री सम्हाल्नु रहेछ । रात आगो तापेर काटियो । 
  बुदि र कुन्तिसाउको घुमाउरो बाटो काट्न कम्ति सकस थिएन । छायालेक उक्लिए पछि देखियो ब्यास उपत्यकाको उपबन । हिमालपारी जाने पुर्ब तयारीको निम्ति एक दिन छाग्रुमा आराम गरियो । अर्को दिन साउन ६ गते तिङ्कर मुकाम भयो। अर्को ग्रुपले घोडाको ब्यबस्था गरेको रहेछ । तर तिर्थयात्रा भएकोले पैदल नै बेश भन्ने मानेर तिङ्करबाट पैदल हिड्यौ ।  
  जिबनमा पहिलोचोटी तेस्रो मुलुक जाँदै थिए । हावा शुष्क हुँदै गयो । ( चल्तीको भाषामा बीख लाग्न थाल्यो । ) लिपुको बिकट उकालोमा बान्ता आएर बेहोशै हुने स्थितिमा पुगेछु । बुवा र भगतजी बाहेक सबै लथालिङ्ग हुँदै गयौ । बुवाले नसक्ने भए फर्कने प्रस्ताव राखे । मेरो कारणले यात्रा स्थगित नहोस भन्ने हिम्मत गरेर येनकेन लिपु भंज्याङ कट्यो । तिब्बततिरको ओरालोमा होस बेहोस हुँदै ओर्लियो । ज्युँज्युँ खोलाको किनारमा पुगेपछि संयत भयौ । दिउँसो पग्लिएको हिउँ बोकेर ल्याएको हिमाली खोलामा खुट्टा हाल्नै धौ थियो । गुरुजी बैतरणि नदि यहि हो भनेर व्याख्या गर्न थाले ।  टाढा कतै हिमशिला बगेका गडगड डमडम आवाज आउथे । भगतजी गाँजाको सूरमा शिब- डमरुको आवाज आएको बताउथे । हुण समुदायका भयंकर डिलडौल भएका यदाकदा भेटिने गोपकुमार गरुडपुराणका दूत जस्ता लाग्थे । यात्रा रोमान्चक हुँदै थियो । अर्को ग्रुपको घोडचढीको पिछा गर्दै राति ताक्लाकोटको कुनै पालमुनि तेर्सियौ । यहि तेर्सिने ठाउ पाउनु पनि ठूलो उपलब्धि थियो ।
ताकलाकोट मध्यकालमा पश्चिम नेपाल हिमाली प्रान्तका हिमाली मल्लहरुको कोट बनेको थियो । कशमीर ( खशमिहिर)बाट ताक्लाकोट , जुम्ला र दुल्लुमा समेत उनीहरुले राजधानी बसालेका थिए । हामीले ताक्लाकोट टेकेकोबेला तिब्बततिर माओको पतलून - बुसर्ट र क्याप मात्र लगाएको भेटिन्थे । टाढा परम्परागत शिबलिङ गुम्पाको भग्नाबशेष देखिन्थ्यो । ताकलाकोट उपत्यकामा घरहरु फाटफुट खर्कहरु जस्ता लाग्थे । सोचिन्थ्यो,कालिदासका किन्नर कन्या यतै कतै होलान ।
  दोस्रो दिन दोभाषे मार्फत कुरा गरि अनुमति लिएर सरकारीगेष्ट हाउसमा बस्यौ । ८ कोठा , प्रतेक कोठामा तीन बिस्तर । परंपरागत चीनी तरिकाको सजावट,एक मेच दुई सोफा र चिनिया भोजन । गेष्टहाउसमा पनि भाषा बुझ्ने इन्टरपेटरको ब्यबस्था थियो । सीमासमस्या बारे समकक्षीहरुसंग गेष्टरुममै बार्ता पनि गरियो । बेलुका चिनियाँ सांस्कृतिक क्रान्तिको कुनै बिषयबस्तुमा आधारित फिल्म  देखाइयो । कम्युनिष्ट संस्कृतिका केही मर्मस्पर्शी परीदृश्य पनि देखिए । 
  बेलुका ससानो रमाइलो काण्ड भयो ।  मैले दोभाषे मार्फत तिर्थयात्रामा स्वयम् पकाएको मात्र खाने हुदा सुत्ने ५ जना भएपनि दुई जना मात्र खाना खाने कुरा सपष्ट गरिसकेको थिए । चिनिया बाहेक अरु भाषा नबुझ्ने चिनिया बुढीलाइ  आफुखुशी बढि मानिस गेष्टरुममा राखेको जस्तो शंका परेछ । उनी डराइन र कराउन थालिन, हामी केही बताउन नसक्ने थियौ । कम्पाउन्डमा ताला लगाएर हैरान पारीन ।हुँदा हुँदा बुढी त उफ्रन थाली । हैरान भएर मैले इन्टरपेटर बोलाउन अनुरोध गरे । बल्ल  कतै फोन गरिन । ५/१० मिनेटमा नेपाली बुझ्ने सरकारी मानिस आई पुगे । सबै कुरा बताए । उनले कागजपत्र हेरे । चिनियाँ लबजमा बुढियालाई सम्झाए । त्यसपछि भने सुनदाँते प्रौढा हाँसिन । सँरी भन्दै हात मिलाउन आइन । तिर्थस्नानको पुर्बसन्ध्यामा यसरी अज्ञात कुलशीला नारिको स्पर्श गर्नु पनि गुरुजी र पिताजीलाई मन्जुर थिएन । बुढी वर सर्दा वहाँहरु पर पर सर्न थाल्नु भयो । मैले हाँस्दै फेरि कुरा सपष्ट गरे । यसपछि पाहुनाघरको टोली सारै खुशि देखियो । हात जोडेर माफी मागे । हाम्रा निम्ति पाहुनाघर परिसर असाध्यै सहयोगी र आत्मीय बनिदियो  । तातो पानी र राम्रो गाडीको ब्यबस्था भयो । अर्की चिनिया पुतलीले त अंग्रेजि बुझे पनि बोल्नु हुदैन, माथिबाट हेरेको हुन्छ भन्ने दुखेसो पोखिन एकान्तमा । कुनै गल्ति देखिए कष्टकर काममा कतै पठाइन्थ्यो रे ।यो माओको मृत्यु पश्चात् ह्वाको समय थियो । माओकालिन ब्यबस्था त अझ कडा रे । त्यसबेला चिनियाहरु भारतीय घडीका लागि असाध्यै शौकीन हुन्थे । नेपाली ब्यापारीहरु लुकाएर घडी त्यहाँ लैजाने र चोरेर घडी बेच्दा रहेछन ।
  अर्को  बिहान गाडीबाटै हाम्रो टोली मानसरोबर हिड्यो । प्राणिशुन्य ढुङ्गेबाटो । निर्जन तिब्बति पठारमा टाढा कतै झुल्किन्थे त भेडाका झुन्ड र गोठाला मात्र । राबणको तपोभुमी (११६ किमी) राक्षसतालको छेउ हुँदै मान्धाता श्रृंखला काटेर डेढ घन्टामा मानसरोबर किनारामा उभिएका थियौ हामी । नेबि ब्ल्यु, निख्खर नीलो  मानसरोबरको ५१८ बर्ग किमी क्षेत्रफल र गहिराई औसत ९० मिटर मानिन्थ्यो । चारैतिरका पहिला आठ मठ अचेल खंडहर भएका थिए रे । श्राद्धकर्मका लागि अरुले कपालक्षौर गरे । मैले यतिकै नुहाए । किनारमा बसि गायत्रि जप गरि ध्यानमा बसे । कैलाशाधिपतिको संस्मरण गरे । आँखा खोल्दा त मानसको महाप्रसाद मानिने माछा पो भेटाएछु । शिरोपर गरे । सप्पै नबुझिने भएपनि ड्राइभरसंग जानकारी लिए । त्यसताका यात्रुहरुकालागि कैलाश खुला गरिएकै थिएन । मानसरोबर किनार बिल्कुलै खाली थियो । टाढा राजहंस कराएको स्वर मानसका छालसंग मिसिएर आउथे । जिउज्यान असाध्यै हलुङ्गो भएको थियो । बेलुका ऐजन पाहुनाघर परिसरमा फर्क्यौ र एउटा अर्को डकुमेन्टरी हेरेर बितायौ । मानसरोबर देखेर स्वर्गको कल्पना गर्नु सायद गलत मानिदैन । यहाँ मानिस र प्रकृति एकाकार हुन्छन । मानसरोबरलाई स्वयममा यौटा पौराणिक परिकल्पना, कबिता, संगीत भरिएको अल्कापुरको आश्चर्य नै भन्दा पनि हुन्छ ।  लाग्थ्यो समय थामिइ दिएको भए पनि हुन्थ्यो । तर तोकिए भन्दा कतै पनि बढि वस्न नपाइने ।
  दोस्रो दिन नेपाल फर्किदा सबै पैदल जाने भए । मैले भने घोडाको ब्यबस्था मिलाए । २ बजे लिपुलेक काट्यौ । ९ बजे राति तिङ्कर पुग्दा  बान्ता नै नगरे पनि टाउको र जिउ असाध्यै दुखेको थियो । तर ठूलो काम भ्याएको जस्तो मन भने मयुर बनेर नाचीरहेको थियो । सोच्दै थिए, मन, शरीर र आत्माको सत्ता नै फरक फरक रहेछ । बिचारमा नयाँ नयाँ दर्शन पलाएका थिए । तबै त यसलाई मानस यात्रा भनिएको होला । यसरी फरक फरक सत्तामा आफुलाई अभिब्यक्त गरिरहेको म को हुँ त ? यहि प्रश्नको उत्तर खोज्नमा अलमल छ, बिबाद छ ।
  यस्तै रङमङिएर छांग्रु आफ्नै अफिसमा आएपछि म हाकिम बने । बाटोमा गुरुजीको अगाडी शिष्य थिए । बुवाको अगाडी छोरा थिए । भगतजी मित्र थिए । हवल्दार सहकर्मि । यो विभिन्न अभिनयमा मेरो म को थियो त ? आफुलाई अभिब्यक्त्याउनु पनि त समय स्थान सापेक्ष हुँदो रहेछ  । ४० बर्षपछि यो संस्मरण लिपिबद्ध गर्दा म यस्तै सोच्दैछु । 
  छांग्रुमा एक दिन आराम गरियो । साउन १२ मा भारतिय पासको ब्यबस्था मिलाई चारै जनालाई गर्ब्याङ( भारत ) सम्म पुगी बिदा गरेर आफु सीतापुल हुँदै छांगरु फर्के । मानसरोबर आउने जाने ग्रुप बरोबर अफिसमा आइरहन्थे । अफिसका साथीहरु को नयाँ खेप आइ पुगेको थियो । हामी पुराना दार्चुला झर्ने तरखर गर्दै थियौ । 
०३७ सालको भुकम्प र कालापानी
साउन १४ गते भुकम्पका ठुलठुलै धक्काहरुले थरहरी गरायो । रेडियो समेत सपष्ट नसुनिने भयो । चिन्ता लागेर रातभरि निन्द्रै परेन । यसै अन्योलमा अर्कोदिन प्र.जि.अ द्वारिकानाथ ढुगेलको टोली समेत मानसरोबर यात्रा गर्न भनेर ब्यासमा आइपुग्यो । बाजागाजा सहित स्वागत भयो । मुकाम हाम्रै अफिस बन्यो । भुकम्पका जाहेरी आउन थाले ।  छाङ्गरुमै छ घर चर्केछन । तिङ्कर पनि त्यस्तै । सितापुल चेकपोष्ट निरीक्षण गरि प्र जि अ टोली तिंकर प्रस्थान ग-यो । बेलुका डी एफ ओ र रेन्जरहरुको टोली आइपुग्यो । तेस्रो दिन बल्ल् रेडियोले थप खबर सुनायो " सुदूरमा भुकम्प । दार्चुला ब्यारेक ध्वस्त । बैतडी जिल्ला कार्यालय पनि ध्वस्त । जम्मा ८३ जनाको ज्यान गयो । ७०० भन्दा बढि घर भत्के । आदि " । परिगाउको आफ्नो जिर्ण घर थियो । बुवा बाटोमै कतातिर अलपत्र होलान ? भाईको आफनो अलग्गैपन छ । पत्नीको आपति र छोराको बाल कोमलता याद आयो  । कति मात्रै सम्झनु र ? म ब्यास क्षेत्रमै कल्पेर बस्न बाध्य थिए ।
  साउन १७ मा प्र जि अ ज्यू मानसरोबर यात्रा रद्द गरि सदरमुकाम फर्कनु भयो । नेपालपट्टि बाटै बिग्रिएकोले भारतको बाटो झर्नु भएछ । पछि भारततिेर पनि बाटो बिग्रेको खवर सुन्यौ । केही गर्न सकिने अवस्था थिएन । यो भुकम्पले बझांङमा मात्रै ३० जना बिते रे । कुल जम्मा डेढसय जति परेछन । दार्चुलाका ९०% घरमा क्षति । गृहमन्त्री स्वयम् भ्रमणमा निक्लनु भएको छ रे । आदि जस्ता खबर सुनिए ।  तै साउन २२ गते बनको टोलीसंग कौवासम्म पुगियो । हिउदमा भारतीय पक्षले नेपालतर्फका रुख काटेका सुचना पाइएका थिए । जंगलमा क्षति सपष्टै देखिन्थ्यो । टाढा खेतबारीमा गहु जौ फापर र नप्पल देखिन्थे । कालापानी पनि टाढैबाट हेरियो । गुमनाम भएर कुनै सुचना बेगर साच्चिकै अजनवी भएको अनुभव भयो । भारतिय चेकपोष्टमार्फत आएका अफवाह अझ भयावह लाग्थे । ठाउँठाउँमा पैरोले महाकाली थुनिएका जस्ता प्रायोजित खवर समेत आइरहन्थे ।
  निबारक नजरबन्दीमा परेका जस्ता ती दिनमा २० दिनसम्म त नुहाउन नै जागर चलेन । यसैताका सुर्खेतमा बिखालु च्याउ खाएर ४५ जना मरे । मुरादाबादको हन्दु मुस्लिम दंगामा १०५ जना काटिए भन्ने खवर पनि रेडियो बाटै सुनियो ।
  भदौ १ को ओलके संक्रान्तिमा भने नुहाइ धोइ सौकाहरुको सगुन खाँदै बिताइयो  । ब्यास मन्दिरमा महर्षि दर्शन गरे । कुमारी केटिहरुको महफिलमा नाच पनि हेरियो । खानपिनमा मन खोलेर खाए । पहिलो हप्ता सुखसागर पढे । अनि बदनाम गली उपन्यास ।  रक्षाबन्धनको दिन सितापुल ब्यास मन्दिरको मेला हेरियो । राखि पनि बाधे छागरुकी बहिनीहरुबाट । राति नाचगानको प्रोग्राम थियो । बेलुका त कसैले केही गर्न नसक्ने, पचासौ हजार कमाएको , हाकिमलाइ हप्काएर ४०० रुपिया लिएको , कहिले भारी नबोकेको र आफु  भन्सारको परिचर भएको जस्ता धक्कु लाउदै मेरो अफिसको सज्जन कार्यलय सहयोगीका अगाडी ठूलो हुनपर्ने भन्सारको एक जना परिचरलाई सौकाहरुले राम्रै गरि भकुरेछन । मध्यस्थता गरि आधाराति पछि छुटाएर मेरै अफिसमा राखे ।
  भाद्र १२ गते मेरो पालो अफिसको कागजपत्र मिलाई गर्ब्याङकै बाटो बुदी हुँदै फेरी  खलंगा झरे । रुघाखोकीले ग्रस्त थिए । म हिडेको एक घन्टा पछि अंचलाधिश र गृह सहायक मन्त्रीले हेलिक्याप्टरबाट ब्यास भ्रमण गरेछन । पर्खिएको भए निश्चित पनि हेलिलिफ्टमा परिन्थ्यो । म छिटो हुन खोजेर बल्ल भदो १५ मा सिकिस्त बनेर सदरमुकाम पुगे । मेरो सामान राखेकै घर भत्किएको रहेछ । साथिहरु भुकम्प पिडितको उद्धारमा थिए । आफुले भने राम होटलमा शरण लिए । कतै खटिने शक्ति थिएन । बिदा मागी पिथौरागढको बाटो घरतिर लागे । गौरा पर्व घरतिरै मानियो ।
तेस्रोपल्ट फेरी छांग्रुतिर ; राजाको सम्भावित सवारीका लागि
तर  राजाको सम्भावित भ्रमणका कारण असौज ६ गते तेस्रो पल्ट फेरी ब्यासतिर जानु पर्ने भयो । जे पो होलाको मुडमा म पनि फेरी कसिए । जे भने पनि हुन्छ भन्ने तर रक्सी खाएपछि सबै भुल्ने तत्कालिन चेकपोष्ट अफिसर डम्मरसिंह खत्रीको रमाइलो तालमा परि २ दिन यतिकै बरालिए ।आखिर राजाको सवारीको मुकाम बैतडी पाटन निश्चित भयो । पहिलो भ्रमण कहाँ हुन्छ , एकीन थिएन । आआफ्नो स्थानमा तयार हुनुपर्ने थियो  । म पनि पुलिस टोलिसंग हतार गरेर जंगी दौडमा सहभागी भए । 
 त्यसबेला मौसम अनुसार ६/६ महिना तिङ्कर र हुतिमा प्रहरी चेकपोष्ट पनि सरि रहन्थ्यो ।  सी पि ओ को साबिक चीनजान हुँदा तीन दिन हुतितिरै सकियो । चौथो दिन बिहानको खाना नजिकै सुनसेरामा खायौ । तर बेलुका राप्लामै महफिल जम्यो । हरियो काँक्रोको सितनसंग अघाउन्जेल स्थानीय च्याक्ती खाएका आधा ग्रुप हिडनै नसक्ने भएपछि  चेकपोष्ट इन्चार्जसमेत बोकाएर राङ्थलमा लैजान धौ धौ भयो । यहाँ पनि रक्सी र नाचगानको रमिता । अर्को दिन भने बिहान दुमलिङबाट निर्जन प्रदेशको बिकट यात्रा शुरु भयो । थिङ्को आधा उकालोमा बोकेको खाना खायौ । मलाई त चिसो र ज्वरोले ग्रस्त गरेको थियो  । स्थानिय भाषामा बाटोको बलियो भूतले नै समात्यो रे ।राजाको सवारी बैतडीमा भैसकेको खबर प्रसारित भयो । अब भने टोलि २ ग्रुपमा बाँडियौ । एक टोलीले रातभरि हिडेर त्यसै दिन ब्यास पुग्ने गरि टाप ठोक्यो । म समेत ३ जना असंचोका कारण बिस्तारै आउनेमा पर्यौ । राति  पोला भन्ने ठाऊमा बाख्रावालाले टेन्ट हालेको देखियो । हिड्नै नसकेर त्यहि शरण माग्यौ । महाकाली किनारको हिमाली झाडी । चिसो बाताबरणमा खुला आकाश मुनी थाकेका बिमार यात्री । तीन जना एक कम्बल ओछ्याई अर्को एक साझा कम्बल ओढेर रात काट्यौ । बिहान भोक र रोगले कामीरहेका खुट्टा बाटोमा नसर्ने पो भए । जिउ झन झन कठ्यान्ग्रिन थाल्यो । म मनमनै अर्कोलोकको यात्राको लागि तयार हुँदै गए । केही नचले पछि साथमा रहेका प्रहरी भाइहरुले दाउरा खोजे । आगो बाले । जिउ सेकाए । एक जना यायाबर सौका भाईसंग केही खाना माँगे । बल्ल यो लोकको याद आयो । पाइला गन्दै कुन्तीसाउ उक्लियौ । त्यहाँ नून हालेको भोटे चिया खाएपछि अलि जोश आयो । चिया दिने युबति मासिक धर्ममा रहिछन क्यारे । अधोबस्त्रको पछाडी रगत लतपतिएको देखिन्थ्यो । टन्न चिया खाइसकेपछिको दिगमिग ब्यहोर्दै बान्ता गर्दै टर्च बालेर ३ घंटा राति नै हिडदा प्रहरी चेकपोष्टमा  होस बेहोसको अवस्थामा थियो ।
आफ्नो अफिस  मात्र आधा घंटाको बाटो भए पनि अर्को दिन पुगे । शाखा अधिकृत ओथारोमा बसेजस्ता देखिन्थे ।  २ मुखिया, १ पियन र त्यसबेला घोडेटोमा काम गर्ने प्रधानजी भनेर चिनिने दार्चुला सदरमुकामका चर्चित ब्यक्ति बिष्णु अवस्थी अर्को कोठामा थिए । म पनि बिमार बोकेर यसै समुहमा थपिए । बाटैबाट ज्वरो आउने खाना नरुच्ने आङ दुख्ने निन्द्रा नपर्ने ब्यथा लागेको थियो ।
राजाको सवारी-मुकाम सक्रीय भएको थियो । भुकम्पग्रस्त क्षेत्रमा जहाँ पनि हेलिक्याप्टरबाट निरिक्षण हुनसक्थ्यो । मुखियाहरु पनि सदरमुकाम लागे । बिष्णु अवस्थीजीलाइ पनि ज्वरो आयो । लामा झारफुकेहरु बोलाइए । नाडी हेरे । मलाइ त भूत नै लागेको  तय भयो । सेतो कपडा र सवा माना खिचडी र एक भाले माग्छ रे भन्न थाले स्थानिय लामा झाँक्री ले । तदनुसार ब्यबस्था मिलाए । नभन्दै तनिक हलुका भयो ।
अर्को दिन शाखा अधिकृतज्युले  मौखिक उपदेश र निर्देशन दिएर खलंगातिर काज बनाए । म एकलिए मात्र एकजना सहयोगीको भरमा । ब्यथा त बढन पो थाल्यो । चेकपोष्टको प्रहरी टीमले खुबै सहयोग गरे । लामाहरु र बिष्णुजीको सक्रीयतामा फेरी  लामा झाँक्री बोलाइए । तथाकथित भूतले खिचडी पाएन रे । पियन लालबहादुरले दिशा लगाएर फालेको रहेछ । अमुक ठाउमा खिचडी नपुगेको ठहरियो । प्रहरी टोलीका साथ खिचडी पकाएर फेरि पठाए । तर म झन झन सिकिस्त भए । नराम्रा सपनाहरु देखिन थाले । बरबराउन पनि थालेको रहेछु । सीतापुल भन्सारको सहयोगमा सीमाबर्ति भारतीय गाउँ गर्ब्याङका आयुर्बेद चिकित्सक मगायौ । जाँच्दा फोक्सो सुनिएको र जुकापरेको ठहराइ औषधि दिए । दुईवटा कुन्नी के इन्जेक्सन पनि लगाए । प्रहरी आ वा बाट सिकिस्त परेको खबर मजकूर कार्यालयहरुमा पठाई नियतिलाई पर्खेर बस्नु बाहेक अर्को उपाय थिएन ।  त्यहि गरे । त्यस पछि लगातार जसो २/२ का दरले १० इनजेक्सन लिए भारतिय बैद्यबाट । जुकाहरु परेकै रैछन ब्यासको काचो मासुले । आन्द्रामा घाउ परेपछि ज्वरो आउने नै भयो । बिस्तारै तन्ग्रीदै गए । असौज २६ गते प्र जि अ ज्यूले पठाएका औषधि सहित हेल्थ असिष्टेन्ट रिजन रायको नेपाली स्वास्थ्यकर्मी टोली पनि आइपुग्यो । तीन सय नगद पनि पठाउनु भएको रहेछ । बिस्तारै खाना रुच्न थाल्यो । हेल्थपोष्ट टीम पनि हाम्रै अफिसमा बस्यो । रु ४५/- मा सिङ्गै तिब्बति भेडा किनेर फेरी भोज चल्यो जंगलमा मंगल भने जस्तै ।  
  मौसममा चिसोपन थपिएसंगै क्रमस: गाउँ खाली हुन थालेका थिए । असौज मसान्तमा बाँकी रहेको एक मन(४० केजी) गहुँ घरपट्टि बुढियालाइ दिएर लालसिं र मैले पनि अफिस बन्द गरि ब्यास क्षेत्र छोडेका थियौ  । भारत गर्ब्याङको बाटो गएर भारतिय बैद्यलाई केही सामान्य उपहार सहित धन्यबाद दिएर बुदि तरी नेपाल भित्रिए । थिंमा चिया खाएर तम्बाकु झरे । भुतले उजाड पारेको ठाउ रहेछ यो । प्रतेक बर्ष एक हल गोरु भिरमा लोटाएर भूतलाई खुवाउनु पर्ने रहेछ । मलाई यहिको भूत लागेको भन्थे । झर्दा भने बिचरा भूतले केहि गरेनछ । अझ बाटोमा दर्माका भोटेको लस्कर समेत हामीसंगै मिसियो । उहीँ दुमलिङ बसि उहीँ बाटो श्रीबगर पुग्दा कार्तिक ३ भैसकेको थियो । दशैको जमरा हाले । तातोपानीमा मजाले नुहाए । केही लुगा धोए । केही महाकालीमा बगाए । एक हप्तासम्म धारचुलाको दुग्ताल डाक्टरसंग  उपचार गराएपछि बिशेक भयो । 
निर्बाचनका लागि चौथो चोटी तिङ्करतिर
यसरी  सन 1980 सकिनै लाग्दा चीनमा माओको आलोचना शुरु भैसकेको थियो । श्रीमती माओलाई सजाय निश्चित थियो  । यता दार्चुला ब्यासका बरिष्टतम ब्यक्तित्व बहादुरसिंह ऐतबालको पुस १३ मा मृत्यु भयो । यसै महिना महाकाली अंचलाधिशमा पशुपतिदेब पाण्डे नयाँ नियुक्ति भएर आए । राष्टिय पन्चायतको निर्बाचन हुने भयो । मेरो सरुवाको तारतम्य बिग्रेको जस्तो लाग्यो । बाङाबगर डेरा । खलंगाको अफिस । हिउद सकिएपछि ब्यासतिर जानुपर्ने बाध्यता टडकारै थियो । 
 ०३८ बैशाखमै निर्बाचनको खटनपटन हुँदै थियो । भुकम्पपछि जनमतसंग्रहको परकम्पमा परी म त सबभन्दा टाढाको केन्द्र ब्यासको तिङ्कर पो खटिनु प-यो । भएको के थियो भने निर्बाचनको  कन्ट्रोल रुममा काम गर्ने गरि जगेडामा राखिएको थिए । देश दर्शनको कार्यक्रममा दरबारमा बोलाइएका तिंकर गुम्बाका लामाले जनमतसंग्रह ताका आफनो गाउमा बुथ नराखिएको गुनासो जाहेर गरेका रहेछन् । त्यसैकारण अन्तिम तयारी पूरा भएपछि दरबारबाट हरहालतमा छांग्रु र तिङ्करमा बुथ कायम गर्ने भन्ने हुकुम बकस भएको रहेछ । हुकुमको जवाफ थिएन । सोधखोज गर्दा २३ जनामात्रको भोटरलिष्ट तयार भयो । भान्छामा बस्नेले कि राम्रो खान पाउछ, कि भोकै बस्नुपर्छ भन्दै प्र जि अ ज्युले मेरै नाम प्रस्तावित गर्नु भएको रहेछ । यसरी निर्बाचनको काममा घर न घाटको पण्डा बनी केही दिन काटे । निर्बाचन खर्च- टिएडिए-७२७/- भाडा१३०/- बुथ निर्माण ७५/- प्रकाश६०/- अन्य खर्च २२२/- स्वयमसेवक६० /-=८३०/- खर्च पाइएको थियो । मैलै नै छाने अनुसारको युबा निर्वाचन टोली टिंकरतर्फ प्रस्थान ग-यो । त्यो दिन दाहुतिमा खाना खाई सुनसेरा बस्यौ । अर्को दिन सुनसेरा राप्ला राङ्थल हुँदै दुमलिङ पुगेर खाना खायौ । निर्माणाधिन घोडेटो बाटोले ट्रयाक खोलिसकेको सुचना पाएर अब थिङ्को एकदिने उकालो हिडनु पर्ने भएन भन्ने ठान्यौ । त्यसैले घाटिबगर पुगिएला भन्ने हिसाब लगाएर अबेर गरि हिड्यौ । तम्बाकु पुग्दा नपुग्दै असिनापानी पर्न थाल्यो । पानी रोकिएपछि माथि भिरबाट बन्यजन्तु बाँदर लंगुरहरुका बथान ओतबाट निक्लि बासबस्नपट्टि लागेका बेला लोटाएका ढुंगा बर्षन थाले । पाखामा टाउको जोगाउदै टेक्नमात्र पुग्ने अक्कर भीरमा सम्हालिदै हिडनु पर्ने भयो । साँझ पर्न थालेको थियो । छंगाछूर भीरमा अलिकति यताउति टेकियो भने जीउ महाकाली पारी भारततिर र ज्यान माथि स्वर्गतिर जाने निश्चित थियो । आधा भिर कटि सके पछि आधा ग्रुपले भिर छिचोली सक्दा अर्को आधाग्रुप हिडनै नसक्ने देखिएकोले एउटा ठाडो सानो ओडारमा बास बस्न बाध्य थियौं  । 
  तल नेपाल भित्र पसेको महाकालीको कर्कस आवाज आउथ्यो । माथि भोजपत्रको जंगल । निंगालाका मुल्जाको अडेस लाएर पहरामुनि ओत लागेका थियौ । प्रहरी भाइको टोपीमा थापेको भीरबाट चुहिएको पानी र बोकेर ल्याएका थोरै बिस्कुट बाडिचुडी गर्ने निर्णय भैसकेको थियो । अकस्मात गहुँको रोटी डढेको मीठो गन्ध फैलियो बाताबरणमा । केही रहस्य पो हो कि भनेर डरायौ पनि । तल माथि केही छ कि भनेर २/२ जनाको टोली खोजिमा खटियो । हो रै छ । हामी बसेको थुम्को मुनि बडेमाको ओडार भित्र त घोडेटोका ज्यामीहरु पो बस्दा रहेछन। खाना पकाउदै खादै नाचगान चलिराखेको । हामी विशिष्ट अतिथि बन्यौ । रात रमाइलो गरि बित्यो । अर्को बिहानै हिजो राति छुट्टिएको ग्रुपलाइ निगालाको झाडी भित्र चिसोले अनुहार सुन्निएको अवस्थामा भेट्टायौ । र निर्बाचन टोली सकुशल ब्यासतिर लाग्यो ।
  माथि नेपालपट्टि बाटो खुलेकै रहेनछ । हिउँ पग्ली चौरी हिडेपछि मात्र हिमाली बाटो निरापद मानिन्छ । यहिकारण जनाई भारतीय इन्डो तिब्बतियन बोर्डर पुलिसको स्थानीय कमानलाई भारतिय बाटो हिडने लिखित अनुमाति मागेका थियौ । सो पाइयो पनि । तर हामीसंग रिबाल्बर, क्यामरा, रेडियो समेत भएको कारण लफडा पर्नसक्ने आशंकाले खतरा भए पनि आफनै बाटो हिडने निर्णय गरि कुन्तिसाँउको उकालो लाग्यौ । आंशिक हिउँ पग्लेर ठुल्ठुला खाडल परेका थिए । हामी कुनै पनि खाडलमा खसेर सोझै पाताल प्रबेश गर्न सक्थ्यौ । तै उम्कियौ । राति छांग्रु सीमा प्रशासनको बाँझो घरको बास भयो । गर्ब्याङका  आइ टि बि पि क्याम्प कमान्डर नेपाली मित्र बालाराम गुरुङजीसंग अनुभव आदानप्रदान गरेर केही खानपिनका सामानको भौतिक सहयोग माग्यौ । ब स नि सितारामजीको टोली छांग्रुमा बस्यो । हामी अर्कोदिन हिमपैरोको कठीन बाटो जसरी तसरी तिङ्कर पुग्यौ । त्यहाँको समुच्चा गाउँमा हुम्ला माइत भएकी एउटी महिलाले मात्र अलि अलि नेपाली बुझ्ने रहिछन् । उनकै मध्यस्थतामा खाने बस्ने ब्यबस्था मिल्यो।
  बैशाख २७ गते  कर्मचारी सहित जम्मा २९ भोटर भएकोमा २३ जनाले भोट हाले । बहुपति प्रथाका कारण बाँकी मध्ये धेरै खर्क तिर रहेछन । मतदान सकेर सोही दिन हिडियो। दोस्रो दिन राप्ला र तेस्रो दिन राति राति ९ बजे खलंगा पुग्दा सबै  हाम्रो अन्तिम टोलीको प्रतिक्षामा रहेछन । बैशाख ३१ गते आएको निर्बाचन परिणाममा कुल ३७४४ भोट पाएर ४४ भोटले कम्मान बहादुर पाल राष्ट्रिय पन्चायत सदस्यमा निर्बाचित भएका थिए । 
पाँचौ पटक ब्यास क्षेत्रमा ; प्र जि अ को भ्रमण टोलीसंग
   यसपछि म जिल्ला प्रशासन कार्यालयमै काज राखिए । प्र जि अ द्वारिकानाथ ढुङ्गेलले मलाई जिल्ला प्रशासन कार्यालयमै सरुवाको प्रकृया पनि चलाएका थिए । उनको नेतृत्वमा मैले धेरै कुरालाइ नयाँ अर्थमा बुझन थालेको थिए । त्यसताका मुद्दाको काममा खप्पिस एक जना बुढा सुब्बाको मातहत बसेर काम सिक्न अह्राइयो । तर सुब्बा सापले लेखेको अक्षर  बुझ्न नै गारो हुन्थ्यो, उनले आफु बाहेक अरुलाइ केही सिकाउन नै नचाहने । कागतपत्र त अरुलाइ हेर्नै नदिने । यो समस्या मैले प्र जि अ ज्यूमा जाहेर गरे । “ के लेखे भनेर पढनु भन्दा किन लेखे भनेर नियत बुझ्ने कोसिस गर्नु “ भन्ने निर्देशन पाए । यो निर्देशन मेरोलागि भविष्यको पथप्रदर्शक बन्यो । यसैताका ब्यक्तिगत परीक्षार्थीको हैसियतमा जाँच दिन भारतको धारचुला स्थित इन्टर कलेजबाट आइ ए को प्राइभेट फर्म समेत भरेर पढाइलाइ निरन्तरता दिए ।       
  यसैताका प्रशासकीय अधिकृत को हैसियतमा सीमा प्रशासन कार्यालयका हाकिम पनि काजमा यतै आए । उनीसंग सीमामा बस्दाताका त्यति खुल्नै सकिएको थिएन । भएको के थियो भने तिङ्करमाथिको लिपुलेक तिर बम जस्तो देखिने केही बस्तु राखिएकोछ भनेर खवर पाइएको थियो । हाकिमले मलाइ सहयोगी लालबहादुर सहित त्यो बिकट ढलाने पाखो जान अह्राएका थिए  । साथै कुनै शंकास्पद बस्तु भेट्टिएमा त्यो जिनिस टिपेर ल्याउन समेत आदेश दिए । तर मैले त्यस्ता अज्ञातबस्तुलाइ साबधानी नअपनाइ छुन नहुने तर्क राखे । हाकिमले रुमाल निकालेर " ल यसमा बाध्नु " भने । अलि अलि च्याक्ति सबैले चढाएकै थियौ । मेरो पालो टोपी निकालेर " ल, टिपेर यो टोपिमा तपाईं राखिदिनोस । हामी बोकौला । साइडमा संगै जाउ । " भने । गलफत्ति भयो । अन्तमा पुलिस चेकपोष्टलाइ खवर गर्यौ । प्रहरीले पनि हात हाल्ने आँट गरेन । दार्चुलास्थित रणभीम गुल्मबाट आएको टोलीले त्यो बस्तु उठायो । चिसोले निष्क्रिय भेसकेको ठुलै बम थियो रे । खम्पा काण्डताका छोडिएको अनुमान गरिन्थ्यो । यो काण्डपछि आफनै हाकिम मसंग बमबम हुन थालेका थिए । रित पुर्याउन मात्र छांगरु पुगेर बाँकि दिन बस्तुस्थिति जाहेर गर्ने नाममा सदरतिर काज खटिने प्रबृतिप्रतिको झिनो बिरोध थियो मेरो ।
  तर पनि त्यो साउनमा प्र जि अ स्वयम् ब्यास जाने कार्यक्रम बनेकोले  फेरी ब्याससम्म जानू पर्ने भयो । साउन ५ मा जन्तिजस्तै २५ जनाको टोली प्र जि अ द्वारिकानाथको नेतृत्वमा ब्यासतर्फ हिड्यो । यो भ्रमणको चहलपहल विशेष हुने नै भयो । विशेष गरि तिङ्कर भंसारमा भएका भ्रष्टाचारजन्य कारवाहीको निगरानी गर्ने काम समेत मैले पाएको थिए  । त्यहाँका खरिदारको उखरमाउलो ज्यादै सहि नसक्नु देखियो । ताक्लाकोटबाट भारी बोकेर ल्याउने हुलका हुल खच्चर मध्ये ठुला साहुका खच्चर गिन्ति गरेर हिसाब राखी छोडीदिने तर फुटकर साना भरियाका भारी खोतलेर हेर्ने र भन्सार काटने गरिदो रहेछ । मानसरोबरको यात्रा पूरा गरि फर्कदै गर्दा प्र जि अज्यू मा सोही ब्यहोरा सपष्ट जाहेर गरे । भंसारको चार्ज अरुलाई बुझाई नीज खरिदारलाई जिल्ला प्रशासनमा उपस्थित हुन पठाउने आदेश भयो । साउन २१ गते प्र जि अ टोली फर्कियो । पुन: म ब्यासमै एक्लिए । बल्लतल्ल तिङ्करको चार्ज अरुलाई दिएर साबिक हाकिमलाई कारवाही चलाइएको थियो ।  एकपल्ट रक्सी खाएर मस्त भएका चेकपोष्ट हाकिमको पिस्तोल नै स्थानियले खोसेर लगिदिएका रहेछन । हामीले मध्यस्त बनेर छुटाएका थियौ । 
२४ साउनका दिन आधा कपाल दुखेर म इन्तु न चिन्तु थिए । यस्तैमा मानसरोबर यात्राको क्रममा एक जना बाबा मेरो अफिसमा आएका थिए । म एक्लै थिए । सकी नसकी उनको सिफारिस लेखी दिए । उनले आफुलाई शिव चैतन्य ब्रमचारी नेपाली बाबाको नाम दिएका थिए । मेरो स्थिति देखेर थोरै जडिबुटि दिए । यो बुटि खाएपछि कहिले कपाल नदुख्ने भनेका थिए । मात्र २ मात्राले आजपर्यन्त यसरी आधा कपाल दुखेको छैन । ती बाबाको दोस्रोपल्ट दर्शन  पाइएन । अभिसप्त अश्वत्थामा यी पहाडमा घुम्छन भन्थे । उनै पो थिए कि ! अहिले सोच्दैछु ।
  त्यहि सालको हिउदमा शाही  नेपाल चलचित्र संस्थानले राष्टियता सम्बर्धन गराउन नेपाली लोकनृत्य सहितका केही डकुमेन्टरीको निशुल्क प्रदर्शन गरेको थियो  । राजा रानीको शाही भ्रमण पनि थियो । तर पुस २२ मा दार्चुलाको ब्यारेकमा मात्र आएर यो भ्रमणको अनुष्ठान पूरा भयो । त्यतैबाट फुर्र फिर्ति सवारी भयो ।  प्र जि अ लाई पनि खासै सरिक गराइएन । बाहिर विभिन्न अडकल काटिए । तत्कालिन प्र जि अ को भनाईको सम्झना आलै छ । भनेका थिए , जिल्ला प्रमुखलाई कुनै सुचना नदिइएबाट प्रमुख भएर बस्नुको औचित्य सकिएकोछ । नभन्दै केही दिनमा वहाँको एकीकृत बिकास  परीयोजनाको कोअर्डिनेटरमा सरुवा गरियो । चुरीफुरी देखाउने सीमा प्रशासन अधिकृतलाइ पो बिभुषित गरिएको रहेछ । स्थानिय निर्बाचन हुने तरखरमा थियो । यसपालाको निर्बाचनमा म कामबिहीन बनाइए । आइ ए को तयारीकोलागी यो पेलाइ पनि मेरो निम्ति अनुकूल हुन गयो ।
अधुुुुरो पढाइलाइ निरन्तरता र परिवारमा दोस्रो पुत्रको आगमन
  भारतमा आइ ए को परीक्षा र नेपालमा स्थानिय निर्बाचनको समय एउटै परेको थियो । ०३९ जेठ ११ गते बिहान ७ बजेदेखि ईतिहास र बेलुका ३ बजे नागरिक शास्त्रको  जाँच एकै दिन परेका थिए । पत्नी राति देखि नै छटपटिएकि थिइन । प्रसब ब्यथा पो रै , छ । बिहान ठिक ६.१५ मा दोस्रो सन्तान जन्मियो । छेउमै बस्ने प्रहरी परीवार भगत र भट्टजीलाई बच्चा भएकोले खबर गरि दिनु होला भन्ने अनुरोध गरि कलेज दौडिए । ५/७ मिनेट ढिलो भए पनि जाँच दिन पाए । ११ बजे घर पुगे । छोरा जन्मेेेको रहेछ ।  जेठो छोरा, नवजात शिशु र नवप्रसुतिलाई सम्हाली फेरि अर्को पेपर दिन भारततिर लागे । जे होस जाँच छोडिएन र कामको दोहरो तेहरो पेलान बेहोरियो । कोठामा कपडाको पार्टिसन गरि ब्यबस्थित गरे सुत्केरीलाई । त्यो दिन नुहाएर राति १२ बजे एक छाक मात्र खाए । अर्को दिन पारीबाट सरसामान किने । खाना ख्वाए । अफिस जाँदा हाकिम त माथि ब्यास जाने तयारी गर्नोस पो भन्छ  । सिमित उपस्थितिमा न्वारानको औपचारिकता पुरा गरियो । अबिस्मरणिय शिबस्थलको यात्रापछि पाएको छोरा भनेर कैलाश नाम राखे । 
श्रीमती स्वयम् खाना पकाउन थाल्छिन । जेठको अत्यधिक गर्मीमा सद्यजात छोराको आँखा र नाइटोमा संक्रमण देखियो । थप अर्को पात्र अस्पताल लैजानुपर्ने भयो । जेठ २४ गते चिकित्सकको प्रमाणपत्र सहित बिमारी बिदाको निबेदन दिएर थकित गलित भएर घरमै बसि दिए । २५ गते आफनो हाकिमलाई २/४ कुरा सुनाए । त्यसपछि बोलचाल नै बन्द भयो । यसपछि भने एकान्तबास बसे । निर्बाचनको धामधुम सकिए लगतै ५ आषाढमा बिदाबाटै महेन्द्रनगर झरे । अंचलाधिश क्वार्टरमै गएर बिहानै अंचलाधिश पशुपतिदेब पाण्डेज्युसंग कुरा राखे । चाखसंग कुरा सुन्नु भयो । जिल्लाबारे केही बुझ्नु पनि भयो । १० बजे अफिसमा भेटन अह्राउनु भयो । भेटे । २ बजे सरुवाको काम सकेर फर्किए । 
अफीस गै हाकिम द्वयलाई फुर्तिसाथ सरुवाको कुरा सुनाए । १५ दिनको बाटो म्याद र ४ दिनको बिदा बल्लतल्ल स्वीकृत भयो । पत्रकारिता तथा कहानी लेखन महाबिद्यालय अम्बालाबाट पत्राचारको माध्यमबाट कोर्स गर्दै थिए । त्यसको पनि परीक्षा सकाए । १४ साउनमा आइ ए को रेजल्ट खुल्यो । ४५% पास रे ।  क्रस लिष्ट आईपुगेपछि १६ गते कलेज पुग्दा मेरै बारेमा कुरा गरिरहेका प्निन्सिपलबाट आफु राम्रो नम्बरले पास गरेको छडके जनाउसम्म पाए । प्राइभेटबाट मेरो नै राम्रो नम्बर रे । लगत्तै मेरो रवाना लिएर बैतडीतिर लागे ।
फेरी दार्चुलातिर; बीस बर्षपछि
यसरी  नयाँ आयाम लिएर जिन्दगीले कोल्टे फेर्दै गयो । कता कता पु-यायो, कहिले हँसायो ..कहिले रुवायो  । अलमस्त, सुस्त, आकांक्षा बिहीन र ब्यस्त भएर तिब्र गतिमा बर्षहरु बग्दै गए ।
०५८मा आइपुग्दा महेन्द्रनगरमा नयाँ घर बनाउन शुरु गरेको थिए । महेन्द्रनगरमै सरुवा भएको थियो ।
०५८ जेठ १९ को दरबार हत्याकान्डले भावनाको जगै हलायो । " हावा लाग्छ, हेलिक्याप्टरसम्म नआउ फर्क, भनेर बिदाइका हात जोडने राजा कहाँ पाउनु अब । बिक्षिप्त जस्तै भए । जागिरका जिन्दगीका केही बाँकी बर्ष छोडेर चाँडै घर जाउ जस्तो लागि रह्यो । छोरा कैलाशले पनि आइएस्सी सकेर एपेक्स काठमाडौंमा भर्ना लिएको थियो । मैलौ  कुमायुँ बिश्वबिद्यालयबाट प्राइभेट अध्ययन गरि स्नातकोतर उतिर्ण गरेको थिए । खुल्लाबाट अधिकृत पास गरेको पनि डेढ दशक बित्दै थियो । बढुवामा यस बर्ष पनि परिएन । उल्टो बिदा नै नलिएको अवधिमा परीक्षा दिएको देखिएकोले जाली सर्टिफिकेटको शंका गरि परेको उजुरीको छानबीनमा पो परियो । सबै सक्कल प्रमाणपत्र मन्त्रालयमा बुझाएको थिए  । छानबिन पश्चात प्रमाणपत्र फिर्ता पाएको लगत्तै का मु प्रमुख जिल्ला अधिकारी तोकेर ०५९ कातिक २० गते फेरी दार्चुला पठाएको पत्र पनि पाए । 
त्यसताका माओबादी जनयुद्ध चरमोत्कर्षमा थियो । सुचना नै नदिइ दार्चुलाका तत्कालिन प्रजिअले जिल्ला छोडेका रहेछन । जिल्ला प्रशासन नै अस्तब्यस्त रहेछ । मलाइ बलिको बोका बनाइएको जस्तो लाग्यो । यथार्थ स्थिति बुझ्न तत्कालिन अन्चल प्रहरी कार्यालय का एसएसपीलाइ भेटन गए । उनले त सबै भगवति र धुराहरुका शिबशक्ति पीठमा पुजा गराइ भाकल समेत गरि सकेकोले ढुक्क भएर जान सल्लाह दिए । जे पो होस भन्दै माइलो छोरा कैलाश साथमा लिइ झन्डै २० बर्षपछि पुन: दार्चुला हाजिर भए । गएकै केही दिनमा ३ जना माओबादी जेलबाट छोडिए । ८ जना  थुनामा राखिए । 
यसै बीच जुम्ला र गोरखामा आक्रमण भए । कैलालीका माननीय चक्र डगौरा मारिए । ( अछाम घटनामा सहृदयी मोहन खत्री मारिएका घटना आलै थिए । )  माओबादीहरु धापसम्म आइ पुगेका खाल्डो खनिएका खबर सुनिन थाले । पुस ९ गते त दल्लेकमै माओबादि सशस्त्र टोली आइपुगेको खबर आयो । नजिकै गाउका कर्मचारी समेत सदरमुकाम मै डेरा गर्न थालेका रहेछन । 
यस्तैमा एक दिन  सुरक्षा समितिले रात भरी अतिरिक्त सतर्कतामा बस्ने निर्णय गर्यो । मृत्युको आसन्न सन्त्रास कति डरलाग्दो हुँदो रहेछ, बुझियो । बातबिकारले हिउँदको चीसोमा अररिएको जिउमा खलखली पसिना आउन थाल्यो । वाकवाकी लागेजस्तो पो भयो । हाम्रो धर्मशास्त्रमा अन्धकारका पनि देवता छन । अन्धकार पनि रक्षा कवच हुन सक्दछ । आज त उज्यालोका भन्दा अध्यारोका देवतासंग त्राण मागियो । बति निभाएर चुपचा्प बसी रहे । छतमा  हतियारधारी सुरक्षाकर्मी थिए । झन ब्लफ कल आउन थाले । म मरे पछि के होला भनेर पनि सोचिन थाल्यो । जेठो छोरा लापरवाह छ, सामाजिक सम्बन्धमा चासो राख्दैन , कसले घरेलु मिसन समाल्ने होला भन्ने सोचिन थाल्यो । निदानत: २ बजे खतरा टरेको खबर दिए डि एसपीले । तै पनि घाम नलागुन्जेल उनिदै थिए । दुनिया त्यसै दिन क्रिसमस मनाइरहेको थियो । म पनि रातभर जाग्राम थिए । उठदा रिङठा चलेर ढलेछु । तर थर्मस फुटे पनि म फुटिन । जीवन चली रह्यो । सदरमुकाम छाडेर जिल्लातिर जाने वातावरण नै थिएन ।
  प्रशाशकीय संगोष्ठिमा छिमेकी भारत र महेन्द्रनगर सम्म भने आउजाउ चलि रहन्थ्यो । यसै क्रममा काठमाडौ पुगेर तत्कालिन प्रधानमन्त्री लोकेन्द्रबहादुर चन्दज्युसंग समेत दुखेसो सुनाए । उनले अन्यमनस्कता देखाए । तर माघ १९ मा अनायास युद्धबिराम भयो । माओबादीहरु सदरमुकाममा पनि देखिन थाले । माओबादी पक्षका क.खगराज भट्टलाई अफिसमै बोलाएर कुरा गरे । सदरमुकाममा सभा गर्न नदिने भने पनि बाङगाबगरमा उनिहरुले सभा गरे । हराएका सीडीओ, सहायक सिडिओ पनि सम्पर्कमा आउन थाले । दार्चुलाको  न बसु जस्तो पनि लागेकै थियो । धार्चुला गै गृह सचिबज्यूसंग फोनमा अनुरोध गरे, तर उनले चुपचाप बसिरहन मात्र आदेश दिए । 
यसरी युध्दबिरामसंगै मौसम उघ्रियो । गृहमन्त्री र गृहसचीवले जिल्ला भ्रमण गर्नु भयो । कैयौ अनुगमन र निरिक्षण टोलीहरु पनि जिल्लामा देखिए । कैयौ दिवस र जात्राहरु मनाइए । यहि मौकापारि चैतको पहिलो हप्ता  धेरै बर्षपछि म पनि घर पुगेर आमालाई भेटन भ्याए । गाउँ बदलिएछ । एउटा नयाँ घाम उदाए जस्तो । आवरण तरल थियो । तर गर्भमा ज्वालाहरु थिए । माओबादको नाममा अर्को अब्यबस्था समाज हुडल्दै थियो । कुनै मार्गचित्र सपष्ट थिएन ।
२०५९ चैत २२ गते तत्कालिन श्री ५ महाराजाधिराजको मल्लिकार्जुनन्दिरमा सवारी हुने औपचारिक खबर चैत १९ गते मात्र पाइयो । २० गते रातारात त्यसतर्फ हिड्यौ । जिल्ला न्यायाधीश, स्थानिय बिकास अधिकारी, प्रहरी नायब उपरिक्षक, जिशिअ समेत ४०/५० जनाको टोली दत्तु भर्तोला हुँदै जाँदै थियौ । बाटोमा माओबादी जत्थाले ब्यबधान हाल्ने प्रयास समेत गरे । हामीसंग झंडै ६ दर्जनको सशस्त्र जत्था थियो। एकाध दर्जन माओबादी माइकमा वारीपारीबाट नारा लगाउथै। मुठभेड नहोस, सिधा गाउले घानमा नपरुन भन्नेमा ज्यादै सतर्क थियौ । टोली नेता बनेर २१ गते बिहान मलिकार्जुन धामको दर्शन गरे । सेनाले सबै तयारी गरेको थियो । स्वागत समिति गठन गरे । शान्तिसुरक्षामा राम्रो समन्वय थियो ।  झरी र चिसोमा औपचारिक पोशाक समेत मागेर सिउरेको थिए । प्रधानसेनापति प्यारजङ्ग थापाको निरिक्षण भ्रमण पछि सबै कुरा थान्को लाग्यो । वहाँ मार्फत नै सबै कुरा जाहेर गरे । प्रफुल्ल मुद्रामा सरकारको भ्रमण निरापद सकियो । बिदाइ दर्शनमा दुनियालाइ पनि धन्यबाद भनी दिनु , म अहिले जाउ है , भन्ने हुकुम भयो । यहिक्रममा मैले पनि मलिकार्जुनको पुजा गरे । प्रसाद पाए । भोकर लगाइयो । फर्कदा भगवतिको पनि दर्शन गरेर बजानीको लेक र थपला हुँदै फर्कियो ।  
यसै मेसोमा मसान्ततिर हामी सुरक्षा टीमका साथीहरु चैत्र २९ गते नारायण आश्रमको भ्रमणमा निक्लियौ । नारायण स्वामीको साकार परिकल्पना । धौलागाडको बिद्युत परीयोजनाबाट बिस्फोटक पदार्थ ठुलो मात्रामा नेपालतिर चोरी निकासी हुने गरेको खबरको पुष्टि गरियो । पछि जुम्ला आक्रमणमा सो बिष्फोटक प्रयोग भएको अनुमान गरिएको थियो । नारायण आश्रमबाटै घरमा फोन गरेको त श्रीमति रुन पो थालीन् । कान थापेकी बाटो हेरेकी रे । कस्तो भ्रम  । यसरी आफुले गरेको कामको प्रगतिलाई आफनै ठुलो ऐनामा राखी नहेर्दा किमार्थ प्रगति पुरुषार्थ भेटिदो रहेनछ । अर्कासंग दाँज्दा तत्जन्य परीबेश पनि दाँज्नु पर्ने हुन्छ । लाग्छ दुनिया समथर छ । नियतिले सबैलाई सम्याउछ । हामी पनि त्यहि समयको पर्खाइमा बस्नुपर्दोरहेछ ।
 १५ पुषमा परीचय लुकाइ पिथौरागढको बाटो महेन्द्रनगर आयौ डिएसपी कृष्ण गौतम सहित । चल्थीमा गाडी बिग्रियो । राति बालुवा बोक्ने ट्रकको पछाडी बसेर १२ बजे टनकपुर पुग्यौ । यसरी राति हिडने वातावरण नेपालमा कहिले होला र भन्ने लागीरह्यो । दोस्रो दिन बल्ल दस बजे महेन्द्रनगर पुग्यौ र सीमा सम्बन्धी मिटिङमा सहभागी बन्यौ । त्यो मिटिङमा भएका दुइटा प्रसंग सान्दर्भिक छन ।
भारतीय पक्षका नापी सर्बेयरले ब्रह्मदेब सीमाको  पिलर भारततिर हुनुपर्ने जिकिर गर्दा त्यहाँका डिएमले हस्तक्षेप गरे। 
उनले भनेका थिए " मिष्टर खत्री! आप किस पक्ष में क्या बोल रहे है? क्या आप सपष्ट है?" । सेनाबाट खटिएका ती नापी सर्भेयरले तत्काल तन्केर जवाफ दिए, " मै नहि बोल रहा हुँ , सर! मेरा गणित ऐसा बोल रहा है । और मेरे साथ मे संयुक्त सीमा टोली के नेपाली समकक्षी भी रहते है । गणित एक हि बात बोलता है सर!।"
अर्को कुरा, हामीले धौली गंगा परीयोजनाबाट बिस्फोटक नेपालपट्टि बाहिरिएको जनाउ दिदा पिथौरागढको डिएमले " ऐसा हो हि नहि सकता " भनेर अडान लिए । तर एसएसबी कमान्डेन्डले हाम्रो कुरामा समर्थन जनाउदै बाटोका चियापसलमा समेत बिष्फोटक सामग्री ढुवानीकर्ताका ड्राइभरहरुले सो सामान बेचेर जाने गरेको खुलासा गरे । निदानत : धौलीगंगाको बिस्फोटक पदार्थ राखिएको गोदाममा छापा हानेर कारवाही चलाइएको थियो । 
आजपर्यन्त ; उस्तै जाँतोमा उस्तै जौं पिसिदै
 अचेल गणतन्त्र र संघीयतासंगै घरमा आगो लगाएर खरानीको व्यापार गर्ने प्रबृति भएकाहरु नेतृत्वमा हाबी छन । कोटमा भन्दा किलामा ध्यान दिने समुदाय छ । बिरालोको काम होइन रंग हेर्ने प्रचलन बढि छ ।अतीत खोस्रेर बसेका बुढाहरु सिहदरबारमा गजधम्म छन । त्रासद तरवारहरु वारीपारीबाट धारेहात लाउदैछन । आफनै मुलढोका पनि पसुँ कि नपसुँ जस्तो हुन थालेकोछ ।
  उहिले हामीहरुलाइ नेपालको सबभन्दा ठुलो ताल फेवाताल भनेर पढाइन्थ्यो । अहिले राराताल ठुलो मानिएकोछ । त्यसै गरि महाकाली नदिको उद्गमस्थल कालापानी हो भनेर पढाइन्थ्यो, पढाइदैछ । तर काली नदि जोलिङकाङ पर्बतबाट निक्लिन्छ । कुटियाङदि, काली, शारदा, सरयु हुँदै यो सीमा नदि गंगामा मिसिन्छ भन्ने तथ्यसंग थोरै नेपालीमात्र परिचित छन  । सुगौली सन्धी हुँदा नेपालका राजाले काली नदि पश्चिमको भुभाग छाडनेछन भनिएको थियो । महाकाली सन्धीले महाकालीको पानीलाइ समेत फिफ्टि फिफ्टि गरि दियो । टाढा लिपियाधुरा तिरको जिरो पिलरका त कुरै छोडौ । झापाको जंगे पिलर देखि ब्रह्मदेब स्थित टनकपुर बाँध नै सन्धी/सहमतिको नाममा वरपर गरिएका छन । यसरी कुटियाङदि देखि कुतियाकवरसम्मको सीमारेखा नै बिबादित र चर्चित बन्न गएकोछ ।
  सुन्छु, हाल पनि ब्यास गाउपालिका-१ मा रहेको उहि सीतापुल प्रहरी चौकि पश्चिमोत्तर सीमानाको अन्तिम  सुरक्षा पोष्ट हो रे । त्यहाँ उसै गरि १ दर्जन प्रहरी बसीरहेका होलान जस्तो लाग्छ । लिम्पियाधुरा, कालापानी र लिपुलेकको चर्चा चुलिएसंगै भारततिर भने अन्तिम बिन्दु कौवाबाट  कालापानी पुग्दा ९ वटा सुरक्षा पोष्टमा १० हजार जति जनशक्ति काममा खटिएर त्यता कालापानी लिपुलेक मोटरबाटो बनिरहेकोछ । हाम्रोतिर पंचायत कालमै बन्न थालेको खलंगा तिङ्कर सवासय कि मि घोरेटो बाटो पनि अस्तब्यस्त छ । सशस्त्र द्वन्दकालमा त राज्यको उपस्थिति नै रहेन । स्थानियले दिएको सुचना माथिल्लो निकायमा पठाइदिने काम सम्हालदै प्रहरीका दुई युनिट अझै ६/६ महिनामा तलमाथि गर्छन होलान । धेरै कुरा थाहा नपाएझै गर्नु पर्ने बाध्यता छँदैछ ।  सौकाहरुलाइ कुन्जा सार्न पनि उस्तै समस्या होला । यो आलेख लेख्न बस्दाा १५ दिसम्बर २०१९ को दैनिक जागरण नामको भारतिय पत्रिकाको ब्यानर न्यूजको शिर्षक थियो, अन्तिम भारतिय गाँव कुटि मे पेय जल लाइन जमी. १५० से मी बरफ । हाम्रा रक्षा मन्त्रीज्यूले भने आज यो ब्यासतिर १५ मिनेटको हेलि निरिक्षण भ्रमण गरेको खबर छ।
  तर  अझै पनि आफनै बाटो आफनो सदरमुकामसंम हिडन सकिने स्थिति छैन । सीमाक्षेत्रमा सुरक्षा स्थिति बलियो बनाउन कुटनैतिक पहल चालु रहोस भन्ने जनचाहना स्वाभाविकै हो । सीमाप्रतिको नागरिक सतर्कता सलामयोग्य छँदैछ । धेरै कुरा बुझेर पनि बुझ पचाइरहेका दुइजिब्रे  नक्क्ली नेतृत्वले आफुसंग भएको भारतिय मुद्रा सटहि गर्न नसकिरहेको अबस्थामा बाँकी के कुरा गर्नु र । झापामा अरबौको लागतले बन्ने भ्युटावरभन्दा महाकाली करिडोरमा बन्नुपर्ने तिंकर लिपुलेक खन्डको सडक राष्टको लागि धेरै महत्वपुर्ण छ भन्ने राष्टिय सोच बन्नु पर्छ । अनि सक्कली राष्टबाद आउछ । यसैमा मात्र हामी सबैको कल्याण छ । 
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- ०७६ फागुुन ५
महेन्द्रनगर