Sunday, May 22, 2016

डोटीको संक्षिप्त ईतिहास ; कुमायँनी इतिहासकारको नजरमा


इतिहास के झरोखों से :  डोटी गढ़ और ऐतिहासिक सामाजिक  महता


उत्तराखंड के जागर लोकगीत  और लोक गाथाएँ  स्वयं में अतीत के असंख्य ऐतिहासिक घटनाओं को  अपने गर्भ में समेटें हुए है जिनमे पुरातन हिमालयी संस्कृति के सर्जन और विघटन से भरे  असंख्य पन्ने समाये हुए है | ये लोकगीत इस हिमालयी  राज्य की सनातन संस्क्रति का उद्घोष  तो करते ही इसके साथ साथ एक ओर ये प्राचीन वीर भड़ो का यशोगान भी करते है तो वहीं दूसरी और ये लोकगीत और लोक गाथाएँ इतिहास प्रेमी लोगौं के लिये काल चक्र परिवर्तन के रूप में अतीत  के अनछुए - बिखरे घटनाक्रम  को समझने - सजोने और एक विरासत के रूप में लोक इतिहास के क्रम में जोडने में  प्रमुख भूमिका निभाते आ रहे हैं  | 

इतिहासकारों के लिये भले ही ये ऐतिहासिक रूप से शोध के विषय हो परन्तु ये  समस्त लोकगीत और गाथाएँ उत्तराखंड के जनमानस के मानस पटल पर उनके असंख्य  आराध्य देबी-देबतौं   की आराधना -आह्वाहन  के मंत्रों ,लोकगीतों ओर साहित्यिक   धरोहर ओर  उनकी आस्था के बीज रूप में भी बिराजमान है और उनके समस्त सामाजिक क्रियाकलापौं,विवाह -पूजा संस्कारों , तीज -त्योहारौं,थोल म्यालौं आदि   में रच बस गए है |

इन्ही लोकगीत और लोक गाथाओं  विशेषकर गोरिल (ग्वील -गोलू -गोंरया  जो की चम्पावत  के  सूरज वंशी राजा झालराय का पुत्र  था और इतिहासिक काल में धामदेव -विरमदेव और हरु सेम के समकालिक  माना जाता है ) की गाथाओं और गीतों में  ,राजुला मालुशाही और गडु सुम्याल आदि में भी  डोटी गढ़ का अनेक बार उल्लेख    मिलता है | जो प्राचीन काल में डोटी गढ़ की इसकी ऐतिहासिक महता को सार्थक करता है |

डोटी शब्द  की उत्पति के सम्बन्ध  में दो  धारणायें व्यापत है | पहली धारणा के अनुसार इसकी उत्पति ‘Dovati’ ( which means the land area between the confluences of the two rivers ) sey  हुई है  जबकि दूसरी धारणा (DEVATAVI= DEV+AATAVI or AALAYA (Dev meaning the Hindu god and aatavi meaning the place of re-creation, place of attaining a meditation in Sanskrit) से इसकी उत्पति मानी गयी है |
  
डोटी गढ़ जो की नेपाल का एक सुदूर पश्चिम क्षेत्र है  , तथा उत्तराखंड के कुमौं  क्षेत्र की काली नदी तथा नेपाल की  कर्णाली नदी के बीच बसा है वर्तमान डोटी मंडल में नेपाल के सेती और महाकाली क्षेत्र के ९ जिल्ले कर्मश : धारचूला ,बैतडी ,डडेलधुरा ,कंचनपुर ( महाकाली में  ) और  डोटी,कैलाली,बझांग,बाजुरा और  अछाम  (सेती में )  हैं |

लोकगीतों ,लोककथाओं और उत्तराखंड और नेपाल के लोक इतिहास के अनुसार  डोटी गढ़ उत्तराखंड का  एक प्राचीन राज्य  था  जो सुदर नेपाल तक फैला हुआ था जो सन ११९१ तथा सन १२२३  में उत्तराखंड के  कत्युर राजवंश पर  खश  आक्रमण कारी अशोका- चल्ल और क्राचल्ल  देव आक्रमण के फलस्वरूप १३०० में स्थापित हुआ  ,अशोल चल बैतडी का ही महायानी बोध राजा (Atkinson  ,गोपेश्वर - बाड़ाहाट (उत्तरकाशी ) त्रिशूल अभिलेख )  था जबकि क्राचल्ल देव नेपाल के पश्चिम भाग डोटी का अधिपति था |
(दुलू ताम्रभिलेख  के अनुसार)  |

 डोटी  कत्युरौं के उन् ८ प्रमुख भागौं (बैजनाथ-कत्युर ,द्वाराहाट ,डोटी ,बारामंडल ,अस्कोट ,सिरा ,सोरा ,सुई (काली कुमोउन) में से एक  था  जो खश  आक्रमण  के कारण हुए  कत्युर साम्राज्य के विघटन के बाद  स्थापित  हुआ था |

विजय के पश्चात खश  आक्रमण कारी अशोका- चल्ल ने गोपेश्वर  में बैतडी धारा / वैतरणी धारा में पदमपाद राजयातन (प्रासाद ) का भी निर्माण किया था और उसे  अपनी राजधानी बनाया था जहाँ अब अवशेष  रूप में केवल बोध शैली के एक  भैरव मंदिर सहित कुछ अन्य मंदिर ही मौजूद है | उसने यहाँ   सन १२०० तक राज किया और इस  समय अंतराल में उसने बोध गया में बुद्ध मूर्ति की प्रतिष्ठा भी की  जो की  उसका मुख्या अभियान माना जाता है | जिसका उल्लेख गोपेश्वर त्रिशूल   में  "दानव भूतल स्वामी " के रूप में मिलता है (दानव  भूतल  गढ़वाल कुमोउन का दानपुर क्षेत्र,नंदा  जात का  प्रसिद्ध भड लाटू दाणु यहीं का बीर भड था जिसकी पूजा नंदा राज जात में होती है   )

अशोक चल्ल ने कर वसूली के लिये यहाँ बिभिन्न रैन्का चौकियों/चबूतरों का निर्माण भी  किया जिसके उतराधिकारी कैन्तुरी  रैन्का बाद में यहाँ शासन करते रहे (रैन्का = राजपुत्र ) इसके अतरिक्त प्रसिद्ध कैन्तुरी  राजा  ब्रहम देव (विरम देव ) जिसे गढ़वाली लोक गाथा गढ़ु  सुम्याल में "रुदी "   नाम से जाना जाता है और  जिसका शासन  काल सन १३७०-१४४३ ई समझा जाता है  ने महाकाली  क्षेत्र के कंचनपुर जिले में "ब्रहमदेव की मंडी " की स्थापना  भी की थी | 

क्राचल्ल  देव  जो की पश्चिम  नेपाल के डोटी गढ़ का अधिपति था और एक महायानी बोध था ने सन १२३३ मे उत्तराखंड के यत्र - तत्र   बिखरे कत्युरी राज्य पर आक्रमण किया जिसका उल्लेख दुलू  (क्राचल्ल  देव  का पैत्रेक राज्य ) के लेख में मिलता है | विजय के पश्चात  क्राचल्ल  देव ने इस भाग को दस सामन्तौं (जिन्हे मांडलिक कहा जाता था )के अधीन सौंपकर दुलू  लौट गया |

क्राचल्ल  देव द्वारा नियुक्त ये   दस मांडलिक सामंत निम्नवत थे :

(१) श्री बल्ला देव मांडलिक (२) श्री बाघ  चन्द्र मांडलिक (३) श्री श्री अमिलादित्य राउतराज    (४) श्री जय सिंह मांडलिक (५) श्री जाहड़देव मांडलिक
(६) श्री जजिहल देव मांडलिक (७) श्री चन्द्र  देव मांडलिक(करवीरपुर ,बैजनाथ अभिलेख ,१२३३ ई  ) (८) श्री वल्लालदेव मांडलिक (९) श्री विनय चन्द्र (१०) श्री मुसादेव मांडलिक

कालांतर में   कत्युरी राज्य के पश्चिम  भाग  अर्थात काली कुमौं में चन्द शक्ति  का उदय  हुआ उधर  गढ़वाल -कुमौं - नेपाल  के तराई पर यवनों के आक्रमण शुरू  हो चुके थे |

सन १४४५-५० ई  के आसपास डोटी राजपरिवार  का छोटा राजकुमार नागमल्ल (सिरा का रैन्का राजा ) ने अपने बडे भाई अर्जुन देव  से राजगद्दी  छीन कर अपनी शक्ति का विस्तार किया | अर्जुन देव को चन्द राजा कलि कल्याण चन्द्र की शरण में जाना पड़ा | कलि कल्याण चन्द्र की जानता उसके बर्ताव  से खुश नहीं थी,अस्तु राजकुमार भारती चन्द (कलि कल्याण चन्द का भतीजा     ने विद्रोही कुमौनियों को साथ मिलकर अपना अलग संघ बना डाला और डोटी पर छापा  मरने निकल पड़ा |
(Atkinson , के अनुसार भारती चन्द्र ने अपना   शिविर बाली चोकड़    नामक  स्थान  पर (काली नदी के तट पर) लगया था |

कालान्तर में जब डोटी के राजा ने काली कुमोउन पर आक्रमण कर दिया तो कटेहर  नरेश (संभवतया हरु सैम ) ,मुसा सोंन   के वंसज तथा सोंनकोट के पैक मैद सोंन की मदद से उन्होने भीषण  युद्ध में  डोटी के  नागमल्ल को परास्त कर दिया |

डोटी के रैन्का  :

निरंजन  मल्ला  देव  ने १३ वी  सदी के आस पास ,कत्युर साम्राज्य के अवसान के बाद डोटी राज्य की स्थापना की | वह संयुक्त कत्युर राज्य के अंतिम कत्युरी राजा  का पुत्र था | डोटी के राजा को  रैन्का  या रैन्का महाराज भी कहा जाता था |

इतिहास कारौं ने निम्न रैन्का महाराजौं की प्रमाणिक  पुष्टि की है :

निरंजन  मल्ल  देव  (Founder of Doti Kingdom), नागी   मल्ल  (1238), रिपु  मल्ल  (1279), निरई   पाल  (1353 may be of Askot and his historical evidence of 1354 A.D has been found in Almoda), नाग  मल्ल  (1384), धीर  मल्ल  (1400), रिपु  मल्ल  (1410), आनंद  मल्ल  (1430), बलिनारायण  मल्ल  (not known), संसार  मल्ल  (1442), कल्याण  मल्ल  (1443), सुरतान    मल्ल  (1478), कृति  मल्ल (1482), पृथिवी  मल्ल  (1488), मेदिनी  जय  मल्ल   (1512), अशोक  मल्ल    (1517), राज  मल्ल  (1539), अर्जुन  मल्ल / शाही   (not known but he was ruling Sira as Malla and Doti as Shahi), भूपति  मल्ल / शाही  (1558), सग्राम   शाही  (1567), हरी  मल्ल /शाही  (1581 Last Raikas King of Sira and adjoining part of Nepal), रूद्र  शाही  (1630), विक्रम  Shahi  (1642), मान्धाता  शाही  (1671), रघुनाथ  शाही  (1690), हरी  शाही  (1720), कृष्ण  शाही  (1760), दीप   शाही  (1785), पृथिवी  पति   शाही  (1790, 'he had fought against Nepali Ruler (Gorkhali Ruler) with British in 1814 A.D').

इतिहासकार डबराल के  अनुसार कत्युरी राजा  त्रिलोक पाल देव जिसकी  शासन  अवधि १२५०-७५ ई ० मानी जाती है का राज्य डोटी से अस्कोट ,दारमा,जौहार,सोर ,सीरा,दानपुर ,पाली पछाउ - बारामंडल -फल्दाकोट तक फैला हुआ था | इतिहासकारों  के अनुसार राजा निरंजन देव ने अपने भाई अभय पाल की मदद से असकोट को जीत लिया था उसने कुंवर धीरमल्ल को सीरा ,धुमाकोट   और चम्पावत का शासक नियुक्त किया उसने अपने छोटे पुत्र को द्वाराहाट(पाली पछाउ ) का और बडे पुत्र को चम्पावत सुई  का मांडलिक बनाया जो कालांतर में डोटी का राजा बना |

कैन्तुरी   इतिहास में प्रीतम देव /पृथ्वीपाल /पृथ्वीशाही का भी  उल्लेख मिलता है  जो आसन्ति - वासंती देव पीड़ी के ७ वे  नरेश अजब राय  (पाली पछाउ ) के पुत्र गजब राय  (द्वाराहाट का कैन्तुरी राजा ) के पुत्र सुजान देव का छोटा भाई था  जिसने रानीबाग के भयंकर युद्ध में तुर्क सेना को परस्त किया था | पिथोरागढ़   उसका एक प्रमुख गढ़ था  और उसकी एक पत्नी मान सिंह की बेटी गांगला देई,दूसरी धरमा देई और तीसरी धामदेव की माता और हरिद्वार के निकट  के पहाड़ी  भूभाग के मालवा खाती  क्षत्रिय राजवंशी झहब  राज की पुत्री थी जिसे    "रानी जिया " और  "मौला देई " के नाम से जाना जाता था | प्रीतम देव शत्रु  का विनाश  करने वाला प्रतापी राजा था  जिसका वर्णन जागर गीतों में ( "जै पृथ्वीपाल ने पृथ्वी हल काई "  ) मिलता है  |

रानी जिया पृथ्वीपाल की मृत्यु के पश्चात गौला नदी के समीप सयेदौं से हुए युद्ध में विजय के पश्चात मृत्यु को प्राप्त हुई थी जहाँ आज भी उसकी समाधि  "चित्रशीला " नाम से उत्तरायणी मेले  के दिन पूजी जाती है | जिया रानी का पुत्र धामदेव था जो बड़ा प्रतापी  और  शक्तिशाली राजा था और  कत्युरी राज के इतिहास में उसके  शासन काल को  स्वर्णिम युग की संज्ञा दी जाती है | राजुला - मालूशाही की प्रसिद्ध लोकगाथा का नायक मालूशाही , राजा धामदेव का ही पुत्र था |

प्रसिद्ध गीत " तिलै धारू बोला  "   जो तिलोतमा पर  विरमदेव के बलपूर्वक अधिकार की गाथा को अपने गर्भ में लिये हुए है भी डोटी गढ़ से ही सम्बन्ध  रखती है क्यूंकि तिलोतमा दुलू पधानी और रिश्ते में  विरम देव की मामी थी |
विरमदेव और  चन्द राजा विक्रम  के बीच का  जवाड़ी सेरा का युद्ध जिसमे विरम देव  ने धामदेव के साथ मिलकर  चन्द राजा के पुत्र की बारात जो की डोटी की राजकुमारी  विरमा डोटियालणी  का डोला ले कर आ रही थी जवाड़ी सेरा में लुट ली थी क्यूंकि विक्रम चन्द ने उसकी अनुपस्थिति  में उसका गढ़ लखनपुर लुटा था और विरमदेव की सात वीरांगना पुत्रियाँ उससे युद्ध करते हुए वीरगति  को प्राप्त हुई थी | विरमदेव विरमाडोटियालणी का डोला लुट कर लखनपुर ले आया था और  युद्ध में चन्दराजा की हार हुई जिसका उल्लेख लोकगीतों  में मिलता इस  प्रकार से मिलता है :

 "जै निरमा ज्यू  को आल  बांको ढाल बांको 
 तसरी कमाण बांकी -जीरो (जवाड़ी) सेरो बाको "


इतिहासकारों  के अनुसार संन  १७९० के गोरखा विस्तार के दौरान सेती नदी के तट का नरी डंग  क्षेत्र में नेपाली  सेना का और धुमाकोट  क्षेत्र गोरखाली के विरुद्ध डटी  डोटी सेना का  शिविर था |

भाषा और संस्कृति :

डोटियाली या डुट्याली  तथा कुमोउनी , डोटी( पश्चिम नेपाल  क्षेत्र सहित ) में प्रचलित स्थानीय भाषाएं है | डोटियाली या डुट्याली जो की कुमोउनी भाषा से समानता  रखती है और इंडो यूरोपियन परिवार की एक भाषा है को महापंडित राहुल सांकृत्यान ने  कुमोउनी  भाषा की  एक उप बोली माना उनके अनुसार यह डोटी में कुमोउन के कन्तुरौं के साथ  डोटी में आई जिन्होने संन १७९० तक डोटी पर राज   किया था | परन्तु नेपाल में इससे  एक नेपाली बोली के रूप मे जाना जाता है समय समय पर डोटियाली या डुट्याली भाषा  को नेपाल की राष्ट्रीय  भाषा के रूप मे मान्यता देने की मांग उठती  रही है .  गोरा  (Gamra) कुमौनी  होली , बिश्पति , हरेला , रक्षा   बन्द्हब  (Rakhi) दासहिं , दिवाली , मकर  संक्रांति   आदि डोटी क्षेत्र के प्रमुख  त्यौहार रहे हैं .

पारम्परिक लोकगीत  :  छलिया , भाडा , झोरा  छपेली , ऐपन , जागर  डोटी संस्कृति के प्रमुख  अंग है | जागर कैन्तुरी  काल की लोक कथाओं को उजागर करने वाला मुख्या लोक गीत   हैं |
Jhusia Damai ( झूसिया दमाई ) कुमोउनी संस्कृति के एक प्रमुक जागरी और लोकगायक थे जिनका जन्म  १९१३ में   रणुवा  धामी  बैतडी जिल्ले के बस्कोट ,नेपाल में हुआ  था |

आज भी गढ़वाल -कुमौं के अनेक गोरिल जागर गीतों तथा गाथाओं में  में डोटी का उल्लेख मिलता है ,जैसे की

जै गुरु-जै गुरु
माता पिता गुरु देवत
तब तुमरो नाम छू इजाऽऽऽऽऽऽ
यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
तै बखत का बीच में,
संध्या जो झुलि रै।
बरम का बरम लोक में, बिष्णु का बिष्णु लोक में,
राम की अजुध्या में, कृष्ण की द्वारिका में,
यो संध्या जो झुलि रै,
शंभु का कैलाश में,
ऊंचा हिमाल, गैला पताल में,
डोटी गढ़ भगालिंग में
कि रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
पंचमुखी दीपक जो जलि रौ,
स्योंकार-स्योंनाई का घर में, सुलक्षिणी नारी का घर में,
जागेश्वर-बागेश्वर, कोटेश्वर, कबलेश्वर में,
हरी हरिद्वार में, बद्री-केदार में,
गुरु का गुरुखण्ड में, ऎसा गुरु गोरखी नाथ जो छन,
अगास का छूटा छन-पताल का फूटा छन,
सों बरस की पलक में बैठी छन,
सौ मण का भसम का गवाला जो लागीरईए
गुरु का नौणिया गात में,
कि रुमनी- झुमनी संध्या का बखत में,
सूर्जामुखी शंख बाजनौ,उर्धामुखी नाद बाजनौ।
कंसासुरी थाली बाजनै, तामौ-बिजयसार को नगाड़ो में तुमरी नौबत जो लागि रै,
म्यारा पंचनाम देबोऽऽऽऽऽऽ.........!
अहाः तै बखत का बीच में,
नौ लाख तारों की जोत जो जलि रै,
नौ नाथन की, नाद जो बाजि रै,
नौखण्डी धरती में, सातों समुन्दर में,
अगास पाताल में॥
कि ऎसी पड़नी संध्या का बखत में,
नौ लाख गुरु भैरी, कनखल बाड़ी में,
बार साल सिता रुनी, बार साल ब्यूंजा रुनी,
तै तो गुरु, खाक धारी, गुरु भेखधारी,
टेकधारी, गुरु जलंथरी नाथ, गुरु मंछदरी नाथ छन, नंगा निर्बाणी छन, खड़ा तपेश्वरी छन,
शिव का सन्यासी छन, राम का बैरागी छन,
कि यसी रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
जो गुरु त्रिलोकी नाथ छन, चारै गुरु चौरंगी नाथ छन,
बारै गुरु बरभोगी नाथ छन, संध्या की आरती जो करनई।
गुरु वृहस्पति का बीच में।
.......कि तै बखत का बीच में बिष्णु लोक में जलैकार-थलैकार रैगो,
कि बिष्णु की नारी लक्ष्मी कि काम करनैं,
पयान भरै। सिरा ढाक दिनै। पयां लोट ल्हिने,
स्वामी की आरती करनै।
तब बिष्णु नाभी बै कमल जो पैद है गो,
तै दिन का बीच में कमल बटिक पंचमुखी ब्रह्मा पैड भो,
जो ब्रह्मा-ले सृष्टि रचना करी, तीन ताला धरती बड़ै,
नौ खण्डी गगन बड़ा छि।
....कि तै बखत का बीच में बाटो बटावैल ड्यार लि राखौ,
घासिक घस्यार बंद है रौ, पानि को पन्यार बंद है रौ,
धतियैकि धात बंद है रै, बिणियेकि बिणै बंद है रै,
ब्रह्मा वेद चलन बंद है रो, धरम्क पैन चरण बंद है गो,
क्षेत्री-क खण्ड चलन बन्द है गो, गायिक चरण बन्द है गो,
पंछीन्क उड़्न बंद है गो, अगासिक चडि़ घोल में भै गईं,
सुलक्षिणी नारी घर में पंचमुखी दीप जो जलण फैगो........
......कि तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
दिल्ली दरखड़ में, पांडव किला में,
जां पांच भै पाण्डवनक वास रै गो,
संध्या जो झूलनें इजूऽऽऽ हरि हरिद्वार में, बद्री केदार में,
गया-काशी,प्रयाग, मथुरा-वृन्दावन, गुवर्धन पहाड़ में,
तपोबन, रिखिकेश में, लक्ष्मण झूला में,
मानसरोबर में नीलगिरि पर्वत में......।
तै तो बखत का बीच में, संध्या जो झुलनें इजू हस्तिनापुर में,
कलकत्ता का देश में, जां मैय्या कालिका रैंछ,
कि चकरवाली-खपरवाली मैय्या जो छू, आंखन की अंधी छू,
कानन की काली छू, जीभ की लाटी छू,
गढ़ भेटे, गढ़देवी है जैं।
सोर में बैठें, भगपती है जैं,
हाट में बैठें कालिका जो बणि जैं।
पुन्यागिरि में बैठें माता बणि जैं,
हिंगलाज में भैटें भवाणी जो बणि जैं।
....कि संध्यान जो पड़नें, बागेश्वर भूमि में, जां मामू बागीनाथ छन।
जागेशवर भूमि में बूढा जागीनाथ रुनी,
जो बूढा जागी नाथन्ल इजा, तितीस कोटि द्याप्तन कें सुना का घांट चढ़ायी छ,
सौ मण की धज चढ़ा छी।
संध्या जो पड़ि रै इजाऽऽऽ मृत्युंद्यो में, जां मृत्यु महाराज रुनी, काल भैरव रुनी।
तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
सुरजकुंड में, बरमकुंड में, जोशीमठ-ऊखीमठ में,
तुंगनाथ, पंच केदार, पंच बद्री में, जटाधारी गंग में,
गंगा-गोदावरी में, गंगा-भागीरथी में, छड़ोंजा का ऎड़ी में,
झरु झांकर में, जां मामू सकली सैम राजा रुनी,
डफौट का हरु में, जां औन हरु हरपट्ट है जां, जान्हरु छरपट्ट है जां.......।
गोरियाऽऽऽऽऽऽ दूदाधारी छै, कृष्ण अबतारी छै।
मामू को अगवानी छै, पंचनाम द्याप्तोंक भांणिज छै,
तै बखत का बीच में गढी़ चंपावती में हालराई राज जो छन,
अहाऽऽऽऽ! रजा हालराई घर में संतान न्हेंतिन,
के धान करन कूनी राजा हालराई.......!
तै बखत में राजा हालराई सात ब्या करनी.....संताना नाम पर ढुंग लै पैद नि भै,
तै बखत में रजा हालराई अठुं ब्या जो करनु कुनी,
राजैल गंगा नाम पर गध्यार नै हाली, द्याप्ता नाम पर ढुंग जो पुजिहाली,......
अहा क्वे राणि बटिक लै पुत्र पैद नि भै.......
राज कै पुत्रक शोकै रैगो
एऽऽऽऽऽ राजौ- क रौताण छिये......!
एऽऽऽऽऽ डोटी गढ़ो क राज कुंवर जो छिये,
अहाऽऽऽऽऽ घटै की क्वेलारी, घटै की क्वेलारी।
आबा लागी गौछौ गांगू, डोटी की हुलारी॥
डोटी की हुलारी, म्यारा नाथा रे......मांडता फकीर।
रमता रंगीला जोगी, मांडता फकीर,
ओहोऽऽऽऽ मांडता फकीर......।
ए.......तै बखत का बीच में, हरिद्वार में बार बर्षक कुम्भ जो लागि रौ।
ए...... गांगू.....! हरिद्वार जै बेर गुरु की सेवा टहल जो करि दिनु कूंछे......!
अहा.... तै बखत का बीच में, कनखल में गुरु गोरखीनाथ जो भै रईं......!
ए...... गुरु कें सिरां ढोक जो दिना, पयां लोट जो लिना.....!
ए...... तै बखत में गुरु की आरती जो करण फैगो, म्यरा ठाकुर बाबा.....!
अहा.... गुरु धें कुना, गुरु......, म्यारा कान फाडि़ दियो,
मून-मूनि दियो, भगैलि चादर दि दियौ, मैं कें विद्या भार दी दियो,
मैं कें गुरुमुखी ज बणा दियो। ओ...
दो तारी को तार-ओ दो तारी को तार,
गुरु मैंकें दियो कूंछो, विद्या को भार,
बिद्या को भार जोगी, मांगता फकीर, रमता रंगीला जोगी,मांगता फकीर।

उपरोक्त के आधार पर कहा जा सकता है की  डोटी गढ़ का उल्लेख उत्तराखंड और नेपाल  के प्राचीन इतिहास के  एक साक्षी  भूखंड के रूप में होने के साथ साथ ही यहाँ के देबी-देबतौं जो की प्रसिद्ध  ऐतिहासिक वीर भड  थे ,के  अदम्य साहस , वीरता ,प्रेम-प्रसंग ,विद्रोह  की लोक-गाथाओं और लोकगीतों में प्रमुख रूप से मिलता है और उनकी   ऐतिहासिक भूमिका में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है |

संदर्भ ग्रन्थ : उत्तराखंड के वीर भड , डा ० रणबीर सिंह चौहान
                    ओकले तथा गैरोला ,हिमालय की लोक गाथाएं 
                    यशवंत सिंह कटोच -मध्य  हिमालय का पुरातत्व

विशेष आभार : डॉ. रणबीर सिंह चौहान, कोटद्वार  (लेखक और इतिहासकार ), माधुरी रावत जी  कोटद्वार
स्रोत : म्यार ब्लॉग हिमालय की गोद से (सिंगापूर प्रवास से )   
साभार- गितेश नेगी        
        

Tuesday, May 17, 2016

मन कही: उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास: ताकि सनद रहे........

मन कही: उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास: ताकि सनद रहे........: विश्व की तत्कालीन परिस्थितियों के आलोक में उत्तराखण्ड का इतिहास  उत्तराखण्ड में अंग्रेजों का आगमन बिहार के सिघौली में 1815 ...

Friday, March 11, 2016

विदुर नीति संस्कृत श्लोक अर्थ सहित



महात्मा विदुर धर्म के अवतार माने जाते हैं। माण्डव ऋषि के श्राप से उन्हें शूद्रयोनि में जन्म लेना पड़ा। ये महाराज विचित्रवीर्य की दासी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार ये पाण्डु और धृतराष्ट्र के एक तरह से सगे भाई थे। विदुर बड़े ही बुद्धिमान, नीतिज्ञ, धर्मज्ञ , विद्वान , सदाचारी एवं भगवद्भक्त थे।
Mahatma Vidur महात्मा विदुर“विदुर नीति” महाभारत का एक प्रमुख भाग है जिसमे महात्मा विदुर जी ने राजा धृतराष्ट्र को लोक-परलोक में कल्याण करने वाली बातें बताई हैं। आइये हम उनके कुछ अनमोल वचनों को जानते हैं :
श्लोक 1 :
निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते।
अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम्।।
अर्थ: जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है , साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है , उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
श्लोक 2 :
न ह्रश्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गंगो ह्रद इवाक्षोभ्यो य: स पंडित उच्यते।।
अर्थ: जो अपना आदर-सम्मान होने पर ख़ुशी से फूल नहीं उठता , और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगाजी के कुण्ड के सामान जिसका मन अशांत नहीं होता , वह ज्ञानी कहलाता है।।
श्लोक 3 :
अनाहूत: प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढ़चेता नराधम: ।।
अर्थ: मूढ़ चित्त वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाये ही अंदर चला आता है , बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वाश करने योग्य नहीं हैं उनपर भी विश्वाश कर लेता है।
श्लोक 4 :
अर्थम् महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा।
विचरत्यसमुन्नद्धो य: स पंडित उच्यते।।
अर्थ: जो बहुत धन , विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी इठलाता नहीं चलता , वह पंडित कहलाता है।
श्लोक 5 :
एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन: ।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते।।
अर्थ: मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं ; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
श्लोक 6 :
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रम सराजकम्।।
अर्थ: किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है किसी एक को भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।।
श्लोक 7 :
एकमेवाद्वितीयम तद् यद् राजन्नावबुध्यसे।
सत्यम स्वर्गस्य सोपानम् पारवारस्य नैरिव।।
अर्थ: विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं : राजन ! जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है , उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है , कुछ और नहीं , किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
श्लोक 8 :
एको धर्म: परम श्रेय: क्षमैका शान्तिरुक्तमा।
विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा।।
अर्थ: केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है , एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
श्लोक 9 :
द्वाविमौ पुरुषौ राजन स्वर्गस्योपरि तिष्ठत: ।
प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।
अर्थ: विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं : राजन ! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं – शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देनेवाला ।
श्लोक 10 :
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम नाशनमात्मन: ।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।
अर्थ: काम, क्रोध , और लोभ – ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं , अतः इन तीनो को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 11 :
पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: ।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ।।
अर्थ: भरतश्रेष्ठ ! पिता , माता अग्नि ,आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 12 :
षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।
अर्थ: ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा (उंघना ), डर, क्रोध ,आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (जल्दी हो जाने वाले कामों में अधिक समय लगाने की आदत )- इन छ: दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 13 :
षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन।
सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः।।
अर्थ: मनुष्य को कभी भी सत्य ,दान , कर्मण्यता , अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्तिका अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।
श्लोक 14 :
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योधिगच्छति।
न स पापैः कुतो नर्थैंर्युज्यते विजेतेँद्रियः।।
अर्थ: मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु – काम, क्रोध, लोभ , मोह , मद तथा मात्सर्य को जो वश में कर लेता है , वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की बात ही क्या है।
श्लोक 15 :
ईर्ष्यी घृणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्याशङ्कितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुः खिताः।।
अर्थ: ईर्ष्या करने वाला , घृणा करने वाला , असंतोषी , क्रोधी , सदा संकित रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन-निर्वाह करने वाला – ये छः सदा दुखी रहते हैं।
श्लोक 16 :
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति
प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।
अर्थ: बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता – ये आठ गन पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।
श्लोक 17 :
प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि-
दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः।
दुःखं च काले सहते महात्मा
धुरन्धरस्तस्य जिताः सप्तनाः।।
अर्थ: जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समयपर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।
श्लोक 18 :
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं
न पौरुषेणापि विकत्थतेन्यान।
न मूर्छित: कटुकान्याह किञ्चित्
प्रियं सदा तं कुरुते जानो हि।।
अर्थ: जो कभी उद्यंडका-सा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की डींग नही हांकता , क्रोध से व्याकुल होने पर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्य को लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं।
श्लोक 19 :
अनुबंधानपक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु।
सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्।
अर्थ: किसी प्रयोजन से किये गए कर्मों में पहले प्रयोजन को समझ लेना चाहिए। खूब सोच-विचार कर काम करना चाहिए, जल्दबाजी से किसी काम का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 :
भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रस्ते नानुबन्धमवेक्षते।।
अर्थ: मछली बढ़िया चारे से ढकी हुई लोहे की कांटी को लोभ में पड़कर निगल जाती है, उससे होने वाले परिणाम पर विचार नहीं करती।

—– पढ़ें संस्कृत श्लोकों का अर्थ सहित संग्रह——

Note: The collection of Vidur Niti Sanskrit Shlokas With Meaning in Hindi has been taken from “Vidur Neeti” book published by Gita Press, Gorakhpur.

Thursday, April 16, 2015

नेपाल गरिब छैन


भर्खरको कुरा हो, एक अमेरिकी बुद्धिजीवीले प्रश्न गरे– नेपाल किन यति गरिब भएको? त्यस प्रश्नले मलाइ नराम्रोसँग दुख्यो। तत्काल उत्तर दिएँ– नेपाल गरिब छैन।  मेरो कुरा उसले नपत्याएझैं लाग्यो, अझ सत्य कुरा के हो भने आफ्नै भनाइप्रति म आफैंलाई पनि पत्यार लागिरहेको थिएन। त्यसैले मैले थपेँ– नेपाल गरिब छैन्। यो धेरै हदसम्म सत्य हो, मैले स्वीकार गरें। तर नेपालले भौतिक पूर्वाधार निर्माण र सरसफाइको क्षेत्रमा धेरै काम गर्न बाँकी छ। मैले नेपाल गरिब छैन भन्ने कुरा ती अमेरिकी नागरिकलाई भन्दा पनि आफैं र आफ्ना नागरिकलाई बुझाउन जरुरी ठानेर यो लेख्ने जमर्को गरेको हुँ। किनभने मलाई मेरो औपचारिक शिक्षाले, मेरो सरकारले कहिल्यै नेपाल गरिब छैन भनेर पढाएन। यो नपढी नहुने पाठ रहेछ जसले हामीलाई आफ्नो आत्मसम्मान फिर्ता ल्याउन, आफ्नो सम्पन्नता चिन्न र त्यसमा गौरव गर्न सिकाउँछ।
मानिसले सम्मानपूर्ण, हाँसीखुसी, दुई छाक खाएर बाँच्न नपाउने अवस्था गरिबी हो। स्वच्छ हावा, सफा पानी, अनुकूल वातावरण, सुरक्षित बास, जीवनका लागि उपयोगी शिक्षा, बिरामी पर्दा आवश्यक औषधोपचार, सुरक्षा, सम्मान, आपसी भाइचारा मेलमिलाप मानिसलाई नभई नहुने कुरा हुन्। नेपाललाई अविकसित, गरिब, कमजोर र पिछडिएको भनेर हजारौं पटक दोहोर्यासउँदै हाम्रो मानसिकतामा हामी भनेको संसारको अति गरिब देश हो भनेर थोपर्ने काम भइरहेको छ। हामीलाई गरिब छौंँ भनेर नेपालीमाथि गरिबीको कलंक थोपर्ने काम पश्चिमाबाट नक्कल गरिएको औपचारिक स्कुले शिक्षाले दिएको ज्ञान हो। यो ज्ञान हाम्रो खोपडीमा गरिबीको परिभाषा निर्माताहरुले भरिदिएका हुन्। गरिबी के हो? यसको परिभाषा पश्चिमा विद्धान्हरु, पश्चिमबाट शिक्षा लिएका अर्थात विश्वलाई पश्चिम खासगरी युरोप र अमेरिकी आँखाबाट हेर्नेहरुले तयार पारेका हुन्। त्यसैले अहिले नेपालमा देखिएको, हामीलाई पढाइएको, घोकाइएको गरिबी पश्चिमाको कसीबाट हेर्दा देखिएको गरिबी हो। गरिबीसम्बन्धी हाम्रो आफ्नै परिभाषा बनाइएकै छैन। यो बनाउनु जरुरी छ।
पश्चिमाले दैनिक ६ डलरभन्दा कम आम्दानी हुने मानिसलाई अति गरिब भनेर मानेको छ। नेपालका दुरदराजका ग्रामीण भेगमा आफैंले उत्पादन गरेर आफ्नै बारीको हरियो सागपात, आफ्नै बारीको अन्न, आफ्नै वस्तुभाउको दूध दही खाने मानिसको हैसियत औपचारिकरूपमा देशको औपचारिक तथ्यांकमा देखिँदैन। फलस्वरूप त्यो परिवार खानै नपाउने, हरितन्नम अति गरिबको कोटीमा पर्छ। त्यस्ता परिवार नेपालमा अझै हजारौं मात्र होइन, लाखौं छन्। त्यसैले दैनिक कसले कति पैसा कमाउँछ भन्ने कुराका आधारमा मात्र कसैलाई धनी र गरिब मान्नु नेपालको सन्दर्भमा न्यायोचित हुनै सक्दैन। यद्यपि पैसाको महत्व छ भन्ने कुरा नकार्न भने सकिँदैन। अक्सफोर्ड विश्वविद्यालयको परिभाषाअनुसार माटोको घरमा बस्नु गरिबीको एउटा प्रमुख सूचक हो। जो समुदाय माटो, ढुंगा, रुख, नदीनाला जस्तो प्रकृतिको नजिक रहन्छ त्यसको जीवन स्वस्थ रहन्छ। माटोको घरमा बस्दा हुने अनेक फाइदालाई बेवास्ता गर्दै पश्चिममा भएको सिमेन्टीकरण नै विकास हो भन्ने भावनाबाट प्रेरित भएर बनाइएका यस्ता परिभाषाले नेपालीलाई गरिबको कोटीमा राख्न सहयोग पुर्यामएको छ। यसले परम्परागत माटोको घरमा बस्ने चलन हतोत्साही गर्न र माटोको घरमा बस्नु भनेको गरिबी हो भनेर सिकाएको पाइन्छ। खोज र अनुसन्धानबिना बनाइएका सूचकले आदिबासी, जनजाति, ग्रामीण भेगमा बसोबास गर्ने, प्रकृतिको नजिक रहेका करोडौं सुखी र आनन्दमा जीवन जिउने मानिसलाई गरिब भनेको छ। जसले मानिसलाई प्रकृतिबाट टाढा र कृत्रिम हुन प्रेरित गरिरहेको छ।
अमर्त्य सेनले गरिबीलाई आम्दानीको आधारमा मात्र हेर्ने कुरा अस्वीकार गर्दै मान्छेले आत्मसम्मानपूर्ण ढंगले बाँच्न पाउने अवसर र क्षमताको अभाव भनेको गरिबी हो भनेका छन्। हाल आएर दीगो विकासका पक्षधरहरुले अब प्रकृतिसँग मिलेर प्राकृतिक जीवन जिउन सक्नु नै सम्पन्नता हो भनेका छन्। उनीहरुले जो मानिस प्रकृतिसँग जति समीप छ, जो प्रकृतिसँग नजिक छ, जसले आफ्नो जीवन सरल र प्राकृतिक स्रोत साधनको थोरै उपयोग र उपभोग गरेर जिउन सक्षम भयो त्यही व्यक्ति सम्पन्न हो भन्ने स्थापित गराउन थालेका छन्।  यदि प्रकृतिसँग मिलेर बस्नु, प्रकृतिमा भएका जीवजन्तु, हावापानी, खोलानाला, वन पखेरामा जीउनु सम्पन्नता हो भने हामी नेपाली कसरी गरिब हौं त? फेरिएको परिभाषा र चेतनाले फेरि हामी नेपालीलाई प्राकृतिकरूपमा आफ्नै गाउँबस्तीमा रहन र प्राकृतिक जीवन जिउन प्रेरित गरिरहेको छ। सम्पन्न त्यो हो जसले स्वच्छ हावामा श्वास फेर्छ, कञ्चन पानी पिउँछ, मानव अनुकूल वातावरणमा बस्न पाएको छ, आफ्नो सांस्कृतिक विविधतामा रमाएको छ, आपसी भाइचारा र मेलमिलाप छ, जसलाई कहिल्यै कसैले अधिनमा राखेको छैन, जहाँ पर्याप्त मात्रामा परम्परागत ज्ञान र सिप छ, जहाँ धार्मिक, भाषिक, जातीय, क्षेत्रीयताका आधारमा सहिष्णुता छ, जहाँ हरियाली पर्याप्त छ, जो प्रकृतिसँग नजिक छ, जुन देशमा संयुक्त परिवारमा मानिस बसोबास गर्छन् र एक पुस्ताबाट अर्को पुस्तालाई ज्ञान र सिप हस्तान्तरण गर्छन्। यी सूचकबाट हेर्दा नेपाली कुनै पनि दृष्टिकोणमा गरिब छैनौं।  तर हामीले यो कुरा न कहिल्यै विचार गर्यौंा, न त हामीलाई कसैले यो कुरा सिकायो। त्यसैले हामीले आफूलाई गरिब मान्दै र स्वीकार गर्दै आयौं तर यथार्थमा यो पूर्ण सत्य होइन। फेरि यसको मतलब हामीले गर्न बाँकी केही छैन भन्नेचाहिँ हैन।
विस्तारै पश्चिमाहरुको अन्धाधुन्द नक्कल गरेर विकासको नाममा गरिने क्रियाकलापले हामीलाई गरिब बनाउँदै लगिरहेको छ। यसको एउटा जिउँदो प्रमाणका रूपमा काठमाडौं उपत्यकालाई लिन सकिन्छ। काठमाडांैमा २०–२५ वर्षपहिलेको हरियाली, सफा खोला, मन्दिर र पुरातत्वका स्थल, सफा हावापानी, मलिलो माटो, परीश्रम गरेर खाने मानिस सबैजसो बदलिएका छन्। विकासका नाममा गरिएको अव्यवस्थित सिमेन्टीकरण, जथाभावी जमिन, पानी र अन्य प्राकृतिक स्रोतको दोहनले यस सहरलाई कुरूप कंक्रिटको जंगलमा परिणत गरेको छ। यहाँको हावा मानवले श्वास फेर्न योग्य छैन, न त पानी नै स्वस्थ छ। यसैले यहाँका मानिसको जीवन विविधखाले जोखिमले घेरिएको छ। भूकम्प आउँदा उद्दार गर्न नसकिने खतरा, सडक दुर्घटनाको जोखिम, फोहर पानी र फोहर मैलाका कारण रोगव्याधी फैलने जोखिम र सबैभन्दा बढी दूषित हावाका कारण लाग्ने दीर्घकालीन रोगको जोखिम। यस्तो जोखिमयुक्त प्रदूषित स्थानमा बस्ने मानिसभन्दा नेपालका ग्रामीण इलाकामा बस्ने मानिस धेरै कुराले सम्पन्न छन्। सादगीमा, सरलतामा सम्पन्नता छ। जहाँ मानिस प्रकृतिसँग दैनिक लुकामारी खेल्छ, आफ्नो स्वस्थ परम्परा, ज्ञान, सिप प्रयोग गरेर आफ्नो जीवन निर्वाह गर्छ, त्यो व्यक्ति गरिब भनेर कसरी परिभाषित गर्ने?
के माटोको घरमा बस्दैमा मानिस गरिब र हरितन्नम हुन्छ? यसैले पश्चिमाको परिभाषा नै हाम्रा लागि अनुपयुक्त छ। यसैले अर्काको चश्मा लगाएर नेपाल खत्तम भयो भनेर ढोल पिट्नु भन्दा आफ्नो वरपर भएको सम्पन्नता पहिचान गरी त्यसमा रमाउने र त्यही सम्पन्नता थप्दै लैजाने प्रयास गरे नेपाल गरिब छैन भनेर गर्वका साथ भन्न सकिन्थ्यो। अब हामीले प्रकृतिसँग रमाउने, जीवजन्तुसँग मिलेर बाँच्ने, माटोको घरमा बस्दा आनन्दित हुने, गाउँमा बसेर पनि विश्वलाई शिक्षा दिनसक्ने सोच विकास गर्नुपरेको छ। हामीमा भएका कमजोरी घटाउँदै हाम्रा परम्परागत सिप, ज्ञान उपयोग गरेर हाम्रा असल पक्ष जगेर्ना गर्नु अति जरुरी छ। हामीलाई हाम्रो पासपोर्ट बोकेर अरु देशमा जाँदा उनीहरुको अगाडि हामी गर्वले शीर उचो राख्न सकौं। यसका लागि हाम्रो भौतिक संरचना र सरसफाइमा सुधार भने अपरिहार्य सर्त हो। हामी सम्पन्न छौं किनभने हामी खुसी छौं। हामी प्रकृतिसँग नजिक छौं। हामी सफा हावा, स्वच्छ पानी, ताजा अन्न पात र आपसी भाइचारायुक्त समाजमा छौं। त्यसैले हाम्रो सम्पन्नता पैसामा तौलन मिल्दैन।
courtesy- Rajkumar Dhungana , http://nagariknews.com/opinion/story/36607.html
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Saturday, March 28, 2015

सिद्धनाथ मेला ; महेन्द्रनगर

नेपालगन्जको त्रिभुवन चोकका युवा व्यवसायी प्रेम सोनी पहिलोपटक सुदूरको सीमा बजार ब्रह्मदेव पुगे । उनीसँगै अन्य चार युवा पनि भारतको उत्तराखण्डको पर्यटकीय नगरी नैनीताल, तीर्थस्थल हरिद्वार र ऋषिकेश हुँदै ब्रह्मदेव पुगेका थिए । उनीहरू भर्खरै सुरु भएको मेलाको अवसर पारेर टनकपुरपारिको पूर्णागिरि  मन्दिर हुँदै कञ्चनपुरको ब्रह्मदेव आइपुगेका हुन् ।
फागु पूणिर्मालगत्तै सुरु हुने पूर्णागिरि मेला पारेर भारतका विभिन्न सहर र ग्रामीण भेगबाट समेत टनकपुर नाका हुँदै ब्रह्मदेव भित्रिनेको लर्को लाग्न थाल्छ । फागुन तेस्रो सातायता पूर्णागिरि हुँदै महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिर पुग्ने दर्शनार्थीको पनि बेग्लै घुइँचो देखिन्छ । "फागु पूणिर्मादेखि जेठसम्म मेला चलिरहन्छ,  दुवै देशका दर्शनार्थी पारिको पूर्णागिरि र नेपालको ब्रह्मदेव र महेन्द्रनगर पुगिरहन्छन्," सिद्धनाथ मन्दिर संरक्षण समिति, ब्रह्मदेवका कार्यालय सचिव गोविन्द महता भन्छन्, "मेला अवधिभर बर्सेनि तीनदेखि पाँच लाख भारतीय ब्रह्मदेव भित्रिने अनुमान गरेका छौँ ।"
 उत्तरप्रदेशको राजधानी सहर लखनउनजिकै हरदोइका राम आसरे बाजपेयी पूर्णागिरि मेलामा आउन थालेको दशक पुगिसक्यो । उनी जतिपटक पूर्णागिरि पुग्छन्, र्फकंदा ब्रह्मदेव पुगेकै हुन्छन् । भन्छन्, "हाम्रा लागि भारतको पूर्णागिरि देवीको जति महत्त्व छ, नेपालको सिद्धनाथको पनि त्यति नै महत्त्व छ ।" मेलाका  बखत पूर्णागिरि पुग्ने जोकोही ब्रह्मदेव अथवा महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिर पुग्नैपर्ने र नेपाल पसेर सिद्धनाथ मन्दिर दर्शन गर्न नपाए यात्रा अधुरै हुन्छ भन्ने मान्यता छ ।
धार्मिक पर्यटकीय गन्तव्य
भैरहवाको सीमावर्ती भारतीय सहर गोरखपुरबाट पूर्णागिरि मेलामा आएका अजयकुमार सिंह महेन्द्रनगर हुँदै मुक्तिनाथ पुग्ने सोच बनाइरहेका थिए । उनी पूर्णागिरिसँगै ब्रह्मदेव पनि पहिलोपटक पुगेका हुन् । दर्शनार्थी पश्चिम नाकाबाट नेपाल भित्रिएको देख्दा आफू छक्क परेको अनुभव सुनाउँदै उनले भने, "शिवरात्रिमा  जति भारतीय तीर्थयात्री काठमाडौँको पशुपतिनाथ पुग्छन्, त्यसभन्दा बढी त उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली र हरियाणालगायत राज्यबाट पूर्णागिरि मेलाका बेला ब्रह्मदेव र महेन्द्रनगर पुग्दा रहेछन् ।" उनका अनुसार नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री भएपछि सीमामा आउजाउ सहज भएको छ । पूर्णागिरि मेलालाई दुवै देशले धामिर् क पर्यटनको विकासका लागि अवसरका रूपमा लिनुपर्ने उनी सुनाउँछन् ।
मेला अवधिमा ब्रह्मदेवको मन्दिर परिसरमा फूल-प्रसाद बिक्री गर्ने स्टल राख्न मात्र यस वर्ष ४८ लाख रुपियाँको ठेक्का भएको छ । भेटी र दानपात्रमा संकलन हुने रकम मात्रै २० देखि २५ लाख रुपियाँ पुग्ने मन्दिर संरक्षण समितिको अड्कल छ । "यसबाहेक मन्दिरको स्वामित्वमा रहेका पसलहरूबाट वाषिर्क ६ लाख रु पियाँ भाडा उठ्छ," समितिका सचिव महताले भने, "संकलन भएजति खर्च पनि भइरहेको छ ।" यता महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिरमा पनि पसलको ठेक्का र भेटीबाट वाषिर्क १२ लाख उठ्ने गरेको मन्दिर व्यवस्थापन समितिका सचिव पुस्करराज उप्रेती बताउँछन् ।
मेला फागुनदेखि चैतसम्म झन्डै चार महिनासम्म चल्छ । दिनहुँ हजारौँ भारतीय दर्शनार्थी भित्रिन्छन् । यद्यपि, मेलालाई धार्मिक पर्यटनका रूपमा विकास गर्ने योजना भने देखिँदैन । "महेन्द्रनगरबाट १३ किलोमिटर टाढा रहेको ब्रह्मदेवसम्म सडक निर्माण हुन सकेको छैन," ब्रह्मदेवका स्थानीय दिलीपसिंह धामी भन्छन्,  "महाकाली सन्धि भएको बेलादेखि नै सडक बन्ने भनिए पनि अझै अधुरो छ, यात्रुका लागि विश्रामगृह र धर्मशाला पनि छैन ।" सरकारले ०५४ मै ब्रह्मदेवलाई व्यवस्थित बजारका रूपमा विस्तार गर्ने योजना बनाएर बजार र आवासीय क्षेत्र छुट्याए पनि योजना अझै अलपत्र छ ।
मेलामा निर्भर व्यापार
विगतका वर्षमा पूर्णागिरि मेला सुरु भएपछिका केही महिनाबाहेक अधिकांश समय ब्रह्मदेव सुनसान रहन्थ्यो । अहिले भने अन्य समयमा पनि चहलपहल बढ्दै गएको छ । ब्रह्देवका स्थानीय दिलीपसिंह धामीका अनुसार पछिल्लो समय दसैँ-तिहारजस्ता चाडपर्व र नयाँ वर्षका बेलामा समेत सिद्धनाथको पूजा र किनमेलका लागि आउने भारतीय पर्यटकको संख्या बढेको छ । चैते दसैँको नवरात्रि दर्शनार्थीको बढी घुइँचो लाग्ने समय हो । "नवरात्रिका बेला दैनिक २५ देखि ३० हजारसम्म  भित्रिन्छन्," मन्दिर संरक्षण समितिका सचिव महताको दाबी छ, "साढे ३ बिघा क्षेत्रफलमा फैलिएको मन्दिर परिसरमा खुट्टा राख्ने ठाउँ हुँदैन ।"
यस बेला ब्रह्देवमा करोडौँको कारोबार हुन्छ । महँगा र ठूलाभन्दा पनि कपडा, जुत्ता, चप्पल, टर्चलाइटजस्ता दैनिक उपभोग्य वस्तु ग्राहकको रोजाइमा पर्ने गरेका छन् । फर्किंदा चिनोस्वरूप केही न केही सामान लैजाने पनि धेरै हुन्छन् । विगत १४ वर्षदेखि भेल्भेट कपडा व्यवसाय गर्दै आएका रूपसिंह जोरा भन्छन्,  "व्यापारीहरूले भेल्भेट मात्रै ५० लाख रुपियाँभन्दा बढीको स्टक राखेका छन्, बजारमा दुई-तीन करोड रुपियाँजतिको सामान अहिले होला ।" मेला फागुन २३ बाट विधिवत् रूपमा सुरु भइसकेको छ ।
सुदूरको ऐतिहासिक थलो
वर्षौसम्म महाकाली किनारको यो सीमा बजार ब्रह्मदेवमण्डीका नामले चिनिन्थ्यो । सुदूरका पहाडी क्षेत्रका बासिन्दाले महाकालीपारिको भारतीय बजार टनकपुरबाट नुन-तेलदेखि लत्ताकपडा खरिद गरी यही नाका हुँदै पहाडका दुर्गम भेगसम्म बोकेरै पुर्‍याउँथे । अहिलको ब्रह्मदेव बजार खल्ला मछेटी भन्ने ठाउँ थियो ।  "सिद्धनाथको प्राचीन मन्दिर पनि त्यहीँ थियो," चार पुस्तादेखि ब्रह्मदेवमा पुजारीका रूपमा रहेका जगदीशानन्द उप्रेतीले भने, "अहिलेको ब्रह्मदेव त भैँसी बाँध्ने सिमल गोठका नामले चिनिन्थ्यो ।" उनका अनुसार खल्लाबाट बजार उठेर यहाँ आएपछि पारिका कुमैयाले पसल राखेर व्यापार गर्न थाले । त्यसपछि मात्र  यसलाई ब्रह्मदेवमण्डी भन्न थालिएको हो । ब्रह्मदेव सुदूरका किसान नेता भीमदत्त पन्तको क्रान्ति थलो पनि हो । ०१९ सालमा बजार ब्रह्मदेवबाट महेन्द्रनगर सारिएको स्मरण गर्दै उप्रेती भन्छन्, "बजार सारिएपछि वर्षौंसम्म सुनसान हुन पुगेको ब्रह्मदेवमा नगर विकास समितिले बजार व्यवस्थापन योजना सुरु गरेपछि  चहलपहल बढेको छ ।"
नगर विकास समितिले योजना अनुसार काम गर्न नसकेको स्थानीयको गुनासो रहे पनि पूर्णागिरि मेलाको महत्त्वकै कारण ब्रह्मदेव गुलजार हुने क्रम भने रोकिएको छैन । व्यवसायी जोरा भन्छन्, "पारितर्फ टनकपुर जलविद्युत् परियोजना बनेपछि उनीहरूको पनि विदेशी सामान किनमेल गर्ने बजार ब्रह्मदेव नै बन्यो ।"
( साभार- चित्राङ्ग थापा र भवानी भट्ट ; नेपाल ,प्रकाशित: चैत्र ८, २०७१ )

सिद्धनाथ मेला ; महेन्द्रनगर

नेपालगन्जको त्रिभुवन चोकका युवा व्यवसायी प्रेम सोनी पहिलोपटक सुदूरको सीमा बजार ब्रह्मदेव पुगे । उनीसँगै अन्य चार युवा पनि भारतको उत्तराखण्डको पर्यटकीय नगरी नैनीताल, तीर्थस्थल हरिद्वार र ऋषिकेश हुँदै ब्रह्मदेव पुगेका थिए । उनीहरू भर्खरै सुरु भएको मेलाको अवसर पारेर टनकपुरपारिको पूर्णागिरि  मन्दिर हुँदै कञ्चनपुरको ब्रह्मदेव आइपुगेका हुन् ।
फागु पूणिर्मालगत्तै सुरु हुने पूर्णागिरि मेला पारेर भारतका विभिन्न सहर र ग्रामीण भेगबाट समेत टनकपुर नाका हुँदै ब्रह्मदेव भित्रिनेको लर्को लाग्न थाल्छ । फागुन तेस्रो सातायता पूर्णागिरि हुँदै महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिर पुग्ने दर्शनार्थीको पनि बेग्लै घुइँचो देखिन्छ । "फागु पूणिर्मादेखि जेठसम्म मेला चलिरहन्छ,  दुवै देशका दर्शनार्थी पारिको पूर्णागिरि र नेपालको ब्रह्मदेव र महेन्द्रनगर पुगिरहन्छन्," सिद्धनाथ मन्दिर संरक्षण समिति, ब्रह्मदेवका कार्यालय सचिव गोविन्द महता भन्छन्, "मेला अवधिभर बर्सेनि तीनदेखि पाँच लाख भारतीय ब्रह्मदेव भित्रिने अनुमान गरेका छौँ ।"
 उत्तरप्रदेशको राजधानी सहर लखनउनजिकै हरदोइका राम आसरे बाजपेयी पूर्णागिरि मेलामा आउन थालेको दशक पुगिसक्यो । उनी जतिपटक पूर्णागिरि पुग्छन्, र्फकंदा ब्रह्मदेव पुगेकै हुन्छन् । भन्छन्, "हाम्रा लागि भारतको पूर्णागिरि देवीको जति महत्त्व छ, नेपालको सिद्धनाथको पनि त्यति नै महत्त्व छ ।" मेलाका  बखत पूर्णागिरि पुग्ने जोकोही ब्रह्मदेव अथवा महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिर पुग्नैपर्ने र नेपाल पसेर सिद्धनाथ मन्दिर दर्शन गर्न नपाए यात्रा अधुरै हुन्छ भन्ने मान्यता छ ।
धार्मिक पर्यटकीय गन्तव्य
भैरहवाको सीमावर्ती भारतीय सहर गोरखपुरबाट पूर्णागिरि मेलामा आएका अजयकुमार सिंह महेन्द्रनगर हुँदै मुक्तिनाथ पुग्ने सोच बनाइरहेका थिए । उनी पूर्णागिरिसँगै ब्रह्मदेव पनि पहिलोपटक पुगेका हुन् । दर्शनार्थी पश्चिम नाकाबाट नेपाल भित्रिएको देख्दा आफू छक्क परेको अनुभव सुनाउँदै उनले भने, "शिवरात्रिमा  जति भारतीय तीर्थयात्री काठमाडौँको पशुपतिनाथ पुग्छन्, त्यसभन्दा बढी त उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली र हरियाणालगायत राज्यबाट पूर्णागिरि मेलाका बेला ब्रह्मदेव र महेन्द्रनगर पुग्दा रहेछन् ।" उनका अनुसार नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री भएपछि सीमामा आउजाउ सहज भएको छ । पूर्णागिरि मेलालाई दुवै देशले धामिर् क पर्यटनको विकासका लागि अवसरका रूपमा लिनुपर्ने उनी सुनाउँछन् ।
मेला अवधिमा ब्रह्मदेवको मन्दिर परिसरमा फूल-प्रसाद बिक्री गर्ने स्टल राख्न मात्र यस वर्ष ४८ लाख रुपियाँको ठेक्का भएको छ । भेटी र दानपात्रमा संकलन हुने रकम मात्रै २० देखि २५ लाख रुपियाँ पुग्ने मन्दिर संरक्षण समितिको अड्कल छ । "यसबाहेक मन्दिरको स्वामित्वमा रहेका पसलहरूबाट वाषिर्क ६ लाख रु पियाँ भाडा उठ्छ," समितिका सचिव महताले भने, "संकलन भएजति खर्च पनि भइरहेको छ ।" यता महेन्द्रनगरमा रहेको सिद्धनाथ मन्दिरमा पनि पसलको ठेक्का र भेटीबाट वाषिर्क १२ लाख उठ्ने गरेको मन्दिर व्यवस्थापन समितिका सचिव पुस्करराज उप्रेती बताउँछन् ।
मेला फागुनदेखि चैतसम्म झन्डै चार महिनासम्म चल्छ । दिनहुँ हजारौँ भारतीय दर्शनार्थी भित्रिन्छन् । यद्यपि, मेलालाई धार्मिक पर्यटनका रूपमा विकास गर्ने योजना भने देखिँदैन । "महेन्द्रनगरबाट १३ किलोमिटर टाढा रहेको ब्रह्मदेवसम्म सडक निर्माण हुन सकेको छैन," ब्रह्मदेवका स्थानीय दिलीपसिंह धामी भन्छन्,  "महाकाली सन्धि भएको बेलादेखि नै सडक बन्ने भनिए पनि अझै अधुरो छ, यात्रुका लागि विश्रामगृह र धर्मशाला पनि छैन ।" सरकारले ०५४ मै ब्रह्मदेवलाई व्यवस्थित बजारका रूपमा विस्तार गर्ने योजना बनाएर बजार र आवासीय क्षेत्र छुट्याए पनि योजना अझै अलपत्र छ ।
मेलामा निर्भर व्यापार
विगतका वर्षमा पूर्णागिरि मेला सुरु भएपछिका केही महिनाबाहेक अधिकांश समय ब्रह्मदेव सुनसान रहन्थ्यो । अहिले भने अन्य समयमा पनि चहलपहल बढ्दै गएको छ । ब्रह्देवका स्थानीय दिलीपसिंह धामीका अनुसार पछिल्लो समय दसैँ-तिहारजस्ता चाडपर्व र नयाँ वर्षका बेलामा समेत सिद्धनाथको पूजा र किनमेलका लागि आउने भारतीय पर्यटकको संख्या बढेको छ । चैते दसैँको नवरात्रि दर्शनार्थीको बढी घुइँचो लाग्ने समय हो । "नवरात्रिका बेला दैनिक २५ देखि ३० हजारसम्म  भित्रिन्छन्," मन्दिर संरक्षण समितिका सचिव महताको दाबी छ, "साढे ३ बिघा क्षेत्रफलमा फैलिएको मन्दिर परिसरमा खुट्टा राख्ने ठाउँ हुँदैन ।"
यस बेला ब्रह्देवमा करोडौँको कारोबार हुन्छ । महँगा र ठूलाभन्दा पनि कपडा, जुत्ता, चप्पल, टर्चलाइटजस्ता दैनिक उपभोग्य वस्तु ग्राहकको रोजाइमा पर्ने गरेका छन् । फर्किंदा चिनोस्वरूप केही न केही सामान लैजाने पनि धेरै हुन्छन् । विगत १४ वर्षदेखि भेल्भेट कपडा व्यवसाय गर्दै आएका रूपसिंह जोरा भन्छन्,  "व्यापारीहरूले भेल्भेट मात्रै ५० लाख रुपियाँभन्दा बढीको स्टक राखेका छन्, बजारमा दुई-तीन करोड रुपियाँजतिको सामान अहिले होला ।" मेला फागुन २३ बाट विधिवत् रूपमा सुरु भइसकेको छ ।
सुदूरको ऐतिहासिक थलो
वर्षौसम्म महाकाली किनारको यो सीमा बजार ब्रह्मदेवमण्डीका नामले चिनिन्थ्यो । सुदूरका पहाडी क्षेत्रका बासिन्दाले महाकालीपारिको भारतीय बजार टनकपुरबाट नुन-तेलदेखि लत्ताकपडा खरिद गरी यही नाका हुँदै पहाडका दुर्गम भेगसम्म बोकेरै पुर्‍याउँथे । अहिलको ब्रह्मदेव बजार खल्ला मछेटी भन्ने ठाउँ थियो ।  "सिद्धनाथको प्राचीन मन्दिर पनि त्यहीँ थियो," चार पुस्तादेखि ब्रह्मदेवमा पुजारीका रूपमा रहेका जगदीशानन्द उप्रेतीले भने, "अहिलेको ब्रह्मदेव त भैँसी बाँध्ने सिमल गोठका नामले चिनिन्थ्यो ।" उनका अनुसार खल्लाबाट बजार उठेर यहाँ आएपछि पारिका कुमैयाले पसल राखेर व्यापार गर्न थाले । त्यसपछि मात्र  यसलाई ब्रह्मदेवमण्डी भन्न थालिएको हो । ब्रह्मदेव सुदूरका किसान नेता भीमदत्त पन्तको क्रान्ति थलो पनि हो । ०१९ सालमा बजार ब्रह्मदेवबाट महेन्द्रनगर सारिएको स्मरण गर्दै उप्रेती भन्छन्, "बजार सारिएपछि वर्षौंसम्म सुनसान हुन पुगेको ब्रह्मदेवमा नगर विकास समितिले बजार व्यवस्थापन योजना सुरु गरेपछि  चहलपहल बढेको छ ।"
नगर विकास समितिले योजना अनुसार काम गर्न नसकेको स्थानीयको गुनासो रहे पनि पूर्णागिरि मेलाको महत्त्वकै कारण ब्रह्मदेव गुलजार हुने क्रम भने रोकिएको छैन । व्यवसायी जोरा भन्छन्, "पारितर्फ टनकपुर जलविद्युत् परियोजना बनेपछि उनीहरूको पनि विदेशी सामान किनमेल गर्ने बजार ब्रह्मदेव नै बन्यो ।"
प्रकाशित: चैत्र ८, २०७१