Tuesday, April 11, 2017

पहाडी स्वर बोकेका कबिता



  1. सभ्यताओं की यात्रा पर गए हुए वर्तमान का गीत

    किसी एक समय
    भेड़ों का एक रेवड़ आपदा में दब गया
    और एक भेड़ बची
    सुविधा अनुसार और दृष्टि के अनुसार बचा भी कह सकते हैं आप
    भेड़ की पीठ पर
    एक कड़बज लदा रहा
    जिसमें नमक बचा रहा !

    पसीने का स्वाद नमक की तरह ही  होता है
    रकत भी  नमकीन होता है
    आंसू की धार भी नमकीन होती है 
    बहती नाख भी नमकीन होती है !

    पसीने से बनी औरत को मैं  आज भी माँ कहता हूँ,
    प्रेमिका कहता हूँ, बहन, बेटी कहता हूँ ,
    रक्‍त से बने आदमी को मैं आज भी अपना पुरखा कहता हूँ ,
    आँसू की धार को मैं आज भी
    षडयंत्रों से मारे गये अपने  शहीद पुरखों
    की गुमनाम  की कब्र कहता हूँ ,
    और बहती नाक को मैं आज भी  दुधमुहे बच्चे की तरह देखता हूँ
    जो भविष्य में फूटंगे विद्रहों सा
    कि जिनकी नाक  सूंघ लेगी अपने पूर्वजों की आदिम गंध !

    और नमक को मैंने जीवन कहा है
    क्योंकि पहाड़ मीठे नहीं होते
    लेकिन उन्हें खारा कहना उनका अपमान करना  है !

    मैं २१ वीं सदी के प्रथम दशक  को पार करता हुआ
    आ ही पहुंचा यहाँ तक
    और मेरे पुरखे
    राम नदी, अलखनंदा  भागीरथी से लेकर कर
    पनार , सरयू और गोरी-काली के किनारे
    आज भी प्रेतयोनि में भटक रहे हैं

    उन्हें भटकाना है अभी
    कि जब तक मैं अपने जाति प्रमाण पत्र में लिखता रहूँगा हिन्दू
    और कोष्टक में राजपूत

    मेरे  पुरखे जिनको इतिहास में कुचक्रों का
    शिकार होना पड़ा है बार-बार
    वो दुनिया के नक्शे  में
    पनार की तरह है,
    राम नदी की तरह है,
    और सरयू की तरह है,
    दक्षिण अफ्रीकाई नदियों की तरह है
    जिनका जल जल स्तर अब लगातार घट रहा है  !
    ‘पकाहू-आरा’ कबीले की तरह है *
    जिसे ब्राजील के रबड़ व्यापारियों ने मिटा दिया है

    मेरे पुरखे जो  पैक (पहलवान) थे  
    किसी तरह से कुचल दिए गये ,
    क्योंकि वे प्रेमी थे !
    और प्रेमी कुचल दिए जाते हैं आज भी
    उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनता है  प्रेम करना
    लेकिन वे  अलमस्त फकीरों की तरह करते रहे हैं ,  फिर भी प्रेम!

    मेरे पुरखे ग्वाले थे , अहीर थे
    इतिहास में  उन्हें अनपढ़ और मलेच्छ घोषित किया गया हर बार
    लेकिन सुना है कि वे  भी लड़े थे महाभारत युधिष्टर की ओर से
    और तिब्बत की चोटियों का पीला सोना
    उनके बकरियों के खांकर पर चमका करता था !
    उनके आँफरों पर बनते हथियार
    क्या वो चरवाहे थे ?

    वो इतिहास के उन पृष्ठों के पीछे  जिन्दा हैं 
    जिन पृष्ठों पर राजाओं और अवतारों का बोझ हैं  और उन कथाओं में जिन्दा हैं
    जिन्हें आज भी  गाता है
    मेरा भाई किसी जंगल ,आगन-पटागण
    मेरे ही पुरखे हैं जिनकी कथाओं में आज भी जीने कसक हैं 
    सवाभिमान की ठसक के साथ

    हाँ मेरे ही पुरखे
    जिन्हें 21 वीं सदी के
    पहले दशक के बीत जाने के बाद
    आज मैं अपने माथे, सर और अपनी गुमनाम पहचान के साथ ढो रहा रहा हूँ

    जो भैस चराते थे और पहाड़ों के सर पर हरे बाँस की  बासुरी बाजते थे
    प्रकृति और स्त्री के आदिम काल के रहस्यात्मक सबंध
    मेरे चरवाहे पुरखों के कंठ से किसी पहाड़ी जलस्रोत से फूटते थे  
    जिनकी दुनाली मुरली में बसता था
    मेहनत से उपजा संसार का महान सौन्दर्यशास्त्र
    उन्होंने जानवरों को प्राणों की तरह किया था प्यार
    उनके प्राण भैसों में बसते थे
    इसीलिए उन्हें भैस बड़ी लगती थी
    और अक्ल छोटी

    अपनी भैसों को उल्टी पनार की दिशा में  दौड़ाते थे वे
    क्या वे  किसी अनार्य रूद्र के  वंशज थे ?
    जिसे आर्यों से भंगेड़ी चरसी और अड़ीयाठ घोषित कर दिया
    बेचारी बलत्कृत आर्यों की औरतें फल खाकर    
    गर्भवती होने का ढोंग रचती रहीं
    पुरोहितों के  आश्रमों में मुँह ढककर रोती रहीं 
    और जनती रही विकलांग चक्रवर्ती सम्राटों को
    जिनके लिए मेरे पुरखे हमेशा बने बैसाखी!

    उस समय भी समुद्र  मंथन का सारा विष  परिधि पर खड़ा मेरा पुरखा पी रहा था
    आज भी माथे जा रहे है पहाड़, पर्वत, नदियाँ, समन्दर
    और आज भी पी रही है मेरी पीढ़ी विष
    और आज भी पहाड़ बने हुए है
    जीते जी उनके स्वर्गारोहण की सीढ़ी !

    क्या मुझे नहीं कहना चाहिए कि
    मैं भी उसी कतार में खड़ा हूँ जिस कतार में खड़े है मेरे भाई
    काले, हब्सी, अफ़्रीकी बलूची आदिवासी और अब फिलिस्तीनी भी
    क्या मुझे नहीं कहना चाहिए कि
    मेरी ही संस्कृतियों को ब्रांड की तरह डिब्बा बंद कर 
    वह मुझे ही बेच रहे हैं

    कितने सारे रंगों से भर दिए गये हैं  हमारे चहरे
    क्या हम पहचान सकते है अब अपनी माँ  चेहरा
    क्या हम पिता की दुखती रगों पर
    लगा सकते है अपार करुणा का  लेप ?
    क्या हम  एक भीतरी यात्रा पर निकल सकते हैं 
    हजारों वर्ष पहले
    सरयू , राम और काली कोशी के किनारे
    अपने पुरखों की शिनाख्त और
    अपने चहरे को  ढूंढने?

    मैं सुनता हूँ  आर्तनाद
    गहन जंगलों के भीतर
    मेरे पुरखे चीखते हैं 
    बहते हैं  खोद कर बनाई  गयी  भयानक सुरंगों में
    वो चीखते है
    दबते है खड़िया की खानों में उनके प्रेत
    वो चीखते हैं 
    सूखती हैं  नदियाँ
    वे चीखते है
    और अल-सुबह एक गहरे कुहरे की चादर ओड़ लेते हैं पहाड़
    नीम खामोशी  की तरह
    एक मातमी माहोल में
    आज भी जनती है  हमारी माँएं बच्चे

    आज भी चूल्हे के किसी डिलकण
    डाल दी जाती है हमारी गर्भनाल
    कि नहीं रहेंगे हमारे चूल्हे बिना आग के
    कि उठता रहेगा उनसे धुवां
    भयानक आपदाओं के बाद भी
    और जलते रहंगे चूल्हे

    21 वीं सदी के पहले दशक के बीत जाने के बाद भी
    हमारी माएं जानती है
    लौंटेंगे एक दिन
    उसके अफसर हुए बेटे
    अपनी नदियों की तरफ

    उस वक्त 
    फिर से कुनमुना शुरू करेगा धरती का वक्ष
    बसंत धरती की गोद में उतरेगा
    एक बच्चे की तरह

    और तांबई बाहों वाले हमारे बच्चे
    निकट भविष्य में
    पहाड़ों के सर पर बजायेंगे
    हरे बाँस की मुरूली !
    ***

    असहमतियाँ

    तुम मिलोगे मिलकर चल दोगे
    और सूरज का चिथड़ा झांकता रह जायेगा
    हाथों की नरमी के बदलते मौसम सा
    धूप छांह होता हुआ
    चाय की गिलासों के तलों पर बच जाएँगी
    असहमतियां 

    सिगरेट की ठुड्डीयों से उड़ता रहेगा
    हमारी सहमतियों का धुवां
    जबकि पड़ी रहेंगी
    उपेक्षित सी असहमतियां
    शीशे  के उन गिलासों में जिनमें भरी जानी है अभी
    गर्म खौलती चाय  
    नए लोगों के लिए

    फिर वह भी छोड़ जायेंगे अपनी असहमतियों को
    उपेक्षित सा
    किसी गिलास के तल में

    उपेक्षित सा ही क्यों रहता है
    हमारी असहमतियों का संसार
    कभी सोचा !
    *** 
     
    पहाड़ पर पगडण्डी

    जब घिरता है चौमास  
    छीज जाता है मडुवा1 का आटा
    मसाले विसोटे2 पे पनियाने लगते है
    सिलाप3 से भर जाता है
    गेहूं का भकार4

    इसी तरह
    पसरता है झड़5
    रिसने लगती है पाख6
    सड़ने लगती है मोल की लकड़ी

    धीरे धीरे टपकता रहता है आसमान
    पाख के सूराख से
    पीतल की परात पर
    और बजता रहता है पानी आंख का कानों पर
    अलौटे 8 लकड़ी से निकलता रहता है धुंवा आसमान की तरफ
    धरती वालों के प्यार की तरह  

    और एक दिन  
    वे  बना लेते हैं
    आंखिर पहाड़ पर पगडण्डी
    और चड़ जाते  हैं
    दरकते पहाड़ों के सीने में
    अपनी भेड़ों और देवताओं समेत
    नयी फसल बोने !

    1-एक मोटा अनाज 2- लकड़ी का मसाले रखने वाला वर्तन 3- सीलन 4- अनाज रखने का वर्तन 5 –लगातार पढने वाली वारिस 6- छत 7- दरवाजे का फर्मा  8 मोटा बिना छिली हुई लक्कड़

    ***
     
    नर्म चीज़ाें के नाम
    (दिसम्बर की किसी शाम माल रोड नैनीताल में घूमते हुए) 
    एक दिन जब बहुत मीठी ठंड
    चुभेगी गालों पर उस वक्त नर्म हथेलियों पर रिश्तों का एक गर्म मौसम साँस ले ही रहा होगा ।  
    मैं जानता हूँ कुछ चीजे़ं कभी नहीं बदलती कुछ मौसम नहीं जाते जीवन से बाहर
    मैं जानता हूँ कुछ 
    चीजे़ं बदल जाने का सिर्फ रचती है ढोंग कुछ चीजे़ं बहुत नर्म होने के बावजूद भी हमेशा दिखती रहती है बहुत कठोर चट्टान की तरह जैसे की पहाड़ ।    

    सबसे नर्म चीज़ ही होती सबसे कठोर आवरण में क्योंकि सबसे स्वादिष्ट चीजों को बसना होता है पहाड़ों के पार अपने एकांत में सबसे नर्म चीज ही खिलती है अक्सर बीहड़ों में ज्वालामुखी के फूल सी।   
    सबसे नर्म चीज़ अक्सर खो जाती है अक्सर गुमा देते है हम उसे कंचे खेलते नादान बच्चों की तरह या कि रख भूल आते हैं उम्र के किसी मोड़ ।  
    फिर ढूंढते रहते है चारपाईयों के नीचे टेबल दराज़ों में तकियों के नीचे कभी कभी एकांत के कोने छान डालते है अपने बटुवे को कई बार देखते है यहाँ तक कि अपने चहरे को भी एक खोजी की तरह खोजते है वक्‍़त की नदी बहे आदमी बनकर।   
    इस तरह एक दिन खुद के भीतर सब कुछ कितना कुछ घट जाता है नर्म 
    चीजे़ं कितनी ही बार हमारे कलेजे से मुंह तक आती-आती फिर वापस हो जाती है आखिर में एक दिन हम हम समझ पाते है नर्म चीजे़ं क्यों होती है हमसे दूर ।   
    एक दिन हम एक आवरण के भीतर कठोर होने का रचने लगते है ढोंग
    या कभी-कभी नहीं समझ पाने के विकल्प पर एक काला गोला लगाकर हम लिजलिजे घोंघे से दुबके रहते है सीलन भरी दीवारों में
    आहिस्ता आहिस्ता सरकते हुए !
    ***( साभार:- अनुनादमा प्रकाशित अनिल कार्की की नई कबितायें )
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Sunday, April 9, 2017

मष्तिष्कको मलामी

प्लेटोभन्दा अगाडिका दार्शनिक हुन्। तर, गौतम बुद्धलाई भगवान मानेर आयौं हामीले। उता एथेन्समा प्लेटोलाई दार्शनिकभन्दा अर्को थोक मानिएन।
युरोपको सिङ्गो दर्शनशास्त्र नै प्लेटोले धानेको तर्क गर्ने विद्वानहरू प्रशस्तै छन्। प्लेटोपछिका युरोपेली दार्शनिकहरूले कि त प्लेटोका विचारलाई काटेर लेखेका छन्, कि भने प्लेटोकै विचारलाई विकसित गरेका छन्।
हामी व्यक्तिलाई भगवान बनाउन सधैं आतुर हुन्छौं। हरेक महान् व्यक्तिहरूले दिएका वाणीहरूमा समाज परिवर्तन गर्ने चाहना निहित हुन्छ। त्यसलाई विमर्शमा ल्याउने जाँगर सायद हामीले देखाएनौं कि भन्ने लाग्छ मलाई।
मस्तिष्कका वैज्ञानिक (न्युरोसाइन्टिस्ट) हरू भन्छन्, व्यक्ति-भगवानको अस्तित्व (धर्म), कला, साहित्यजस्ता विषयहरूमा दाहिने मस्तिष्कले काम गर्छ भने गणित, विज्ञान र तर्कशास्त्रजस्ता विषयहरूलाई देब्रे मस्तिष्कले हेर्ने गर्छ। हामीले देब्रे मस्तिष्क थोरै चलाउँदै रहेछौं जस्तो लाग्छ। पछिल्लोपटक त देब्रे मस्तिष्क चलाउनेहरू पनि दाहिने मस्तिष्क चलाउने भएर निस्किए। तर, यसमा वैज्ञानिकहरू भन्छन्, 'मान्छेको उमेर पाको हुँदै गएपछि देब्रेभन्दा दाहिने मस्तिष्क धेरै चल्न थाल्छ।'
बुढो हुँदै गएपछि कम्युनिष्ट नेताहरूले भगवानप्रति आस्था राख्नु, बुढो हुँदै गएपछि व्यापारी, डाक्टर र इन्जिनियरहरूले साहित्य लेख्न थाल्नुलाई यसैको उदाहरण मानिन्छ। बुढो मस्तिष्कहरू नै देशका नीति-निर्माणमा हावी छन्, राजनीतिक दलहरू तिनै बुढो मस्तिष्कले सन्चालित छन्। युवा मस्तिष्कहरू वैदेशिक रोजगारका नाममा दास झैं बेचिएका छन्। नेपालमा भएका युवा मस्तिष्कहरू गजल र कविता लेख्नमा व्यस्त छन् (अर्थात् दाहिने मस्तिष्क चलाउन व्यस्त छन्), कि भने नेपाल बन्द गर्न प्रयोग भएका छन्। युवा मस्तिष्क जो रचनात्मक हुने गर्छ- त्यसको सही प्रयोग राजनीतिशास्त्रले बिल्कुलै गर्न सकिरहेको छैन।
युरोप र अमेरिका अँध्यारोमा बाँचिरहेको बेला एसियाको विकास उचाईमा पुगिसकेको थियो। इश्वी सम्बत् ६ देखि १०१२ को करिब हजार वर्षको समय विश्वको दर्शन, व्यापार, राजनीति, कला र साहित्य एसियामा केन्द्रित थियो। भारत र चीन उहिलेदेखिकै विकसित देशहरू हुन्। भारत र चीनको छिमेकी भएर पनि उनीहरू सँगसँगै अगाडि बढ्न सकेनौं हामीले। हामीले निर्माण गर्न खोजिरहेको समाज सधैं अन्यौलमा रुमल्लिरहेको छ।
हामीले आधुनिक नेपालको परिकल्पना त गर्‍यौं तर, नेपालको भौगोलिक, साँस्कृतिक, जातीय, वर्गीय चरित्रहरूलाई पहिचान गरेर सबैलाई अगाडि लैजाँदा मात्रै नेपालको समग्र विकास हुन्छ भन्ने चेतना हामीमा पलाएन।
म सधैं सोच्ने गर्छु- ४८ सालको आम चुनावले बहुमतको सरकार बनाउन इजाजत दिएको गिरिजाप्रसाद कोइरालाको सरकारलाई ढाल्ने खेल नखेलिएको भए, सडकका रेलिङ भत्काएर, टायर बालेर र चक्काजाम गरेर उपद्रो मच्चाउनुको साटो पाँच वर्षपछि आउने आम चुनावलाई पर्खिने राजनीतिक संस्कार प्रतिपक्षीले बसाउन सकेको भए? सम्भवत: यतिबेला नेपाल सही ट्र्याकमा आइसक्ने थियो।
अझ म सोच्ने गर्छु- ३६ सालको जनमत सङ्ग्रहमा जनताहरूले पैसा र जाँडरक्सीमा नबिकेर बहुदललाई जिताएका भए? सायद हामी आत्मनिर्भर भइसक्ने थियौं। १७ सालकै राजनीतिक दुर्घटना नभइदिएको भए झन् हामी दुई शक्तिशाली छिमेकी देशहरूकै छेउछाउ पुग्ने थियौं। कस्तोसम्म भएको छ भने निर्दलीय व्यवस्थाका भक्तसेवकहरू नै बहुदलीय व्यवस्थाका व्याख्याता भएर निस्केका छन्। प्रजातन्त्रका असली योद्धाहरूलाई पन्छाउने काम भएको थियो। अवसरवादी राजनीतिशास्त्र नै हाम्रो चिन्तन प्रणालीमा घुसेको छ।
राजनीतिक दर्शनशास्त्रको बुझाई हाम्रो सधैं कमजोर रह्यो। अझ भन्नैपर्दा नेपालको कम्युनिष्ट आन्दोलनले जन्माएका राजनीतिक दर्शनशास्त्रका अध्येता र व्याख्याता निर्मल लामा, मोहनविक्रमसिंह र वैद्यहरूलाई समाप्त पार्ने काम राजनीतिक संगठकहरूले नगरिदिएको भए नेपालले राजनीति रूपमा सफलता हासिल गरिसक्ने थियो। अर्कोतिर, प्रजातान्त्रिक (लोकतान्त्रिक) धारमा प्रदीप गिरीहरू जस्ता विचारकहरूको स्थिति उस्तै निरिह छ, संगठकहरूले राजनीतिक विचारकहरूलाई सधैं ओझेलमा राख्न चाहन्छन्। राजनीतिशास्त्रले हजारौं वर्षपछिको समाजको परिकल्पना गर्नुपर्छ तर, नेपालमा निर्वाचनका लागि मात्रै चिन्तन गरिन्छ। यस्तो चिन्तनले राजनीतिमा 'डनपथ' विकसित हुन्छ र एउटा मान्छेको अकालमा 'इन्काउन्टर' गर्नुपर्ने बाध्यता आइलाग्छ।
अमेरिका दुई सय वर्षमै विश्वको शक्तिशाली राष्ट्र बन्यो। कतिपय राजनीतिशास्त्रका विद्वानहरू भन्छन्, 'अमेरिकामा संसारभरिका विशेषज्ञहरूलाई विभिन्न विश्वविद्यालय र अनुसन्धान केन्द्रहरूमा सरकारले काम दिएर राखेको छ। उनीहरू विश्वको जुनसुकै ठाउँको भए पनि, जुनसुकै नश्ल र साँस्कृतिक समुदायबाट आए पनि उनीहरूले आविष्कार गरेको या बाँडेको ज्ञान अमरिकी समाजको लागि हो।'
अझ अमेरिकीहरू भन्छन्, 'उनीहरूको हरेक काम विश्व मानव समुदायको लागि नै हो।'
म्यागसेसे पुरस्कार विजेता महावीर पुनले देखेको 'आविष्कार केन्द्र'को सपनालाई हाम्रो राजनीतिक दर्शनशास्त्रले सहयोग गरेन।
हाम्रो राजनीतिक दर्शनशास्त्रले महावीर या अरू कोहीलाई सुरूमै प्रश्न गर्ने गर्दछ- त्यो कुन दलको मान्छे हो? त्यो कुन जातिको हो? त्यो पूर्वको हो कि पश्चिमको हो? त्यो मधेसको हो कि पहाडको हो? महिला हो कि पुरुष हो? यस्ता प्रश्नहरूको अगाडि उभिँदा मलाई लाग्छ- आजभन्दा दुई हजार वर्ष पहिले ग्रीकेली प्रजातन्त्रले तल्लो वर्ग, दास र महिलाहरूलाई मताधिकारबाट वन्चित गरेजस्तै त होइन अहिले हामीले अभ्यास गरिरहेको गणतन्त्र?
अर्को विचार र दर्शनलाई, अर्को समुदाय र नश्ललाई, अर्को आस्था र आदर्शलाई वर्जित गरेर जानु विभिन्न रूपले विविधतामा बाँचिरहेको नेपाली समाजमा ठीक होइन भन्ने लाग्छ मलाई। वर्जना, साँध-सीमाना र दमनले जन्माउने दर्शनको अन्तिम रूप भनेको आतङ्कवाद हो।
मर्ने बेला बुद्धले एउटा पानी नचल्ने समाजबाट तिरष्कृत शुद्रको घरमा भोजन गरेका थिए। यही कारण मान्छेको वर्ण विभाजनमा विश्वास राख्ने शंकराचार्यले बौद्धग्रन्थ जलाए। मलाई लाग्छ, आजको समयमा हामीले शंकराचार्यजस्तो असहिष्णु हुनु हुँदैन।
हिन्दुदर्शनशास्त्र गरुड पुराणमा हैन, उपनिषदहरूमा छ। प्रमुख एघार उपनिषदहरूमा शुद्ध दर्शन पाइन्छ। यी उपनिषदमा पाइने दर्शनहरूलाई विमर्श गर्न सकेको अवस्थामा नेपालमा महान दार्शनिकहरू जन्मिसकेका हुन्थे। तर, कर्मकाण्डलाई मात्रै प्राथमिकता दिँदै आइयो। किरात जातिमा पाइने मुन्धुमहरूमा निहित दर्शनहरूको अध्ययनले नेपाली समाज नै विकसित भएर जाने हो। लिम्बू जातिमा पाइने सृष्टिमुन्धुममा पुस्ता हस्तानतरणको दर्शन पाइन्छ। जर्मन दार्शनिक सोफेन आवरले आफ्नो दर्शनको विकास उपनिषदबाट गरेका थिए। तीन हजार वर्ष नेपालमा राज्य चलाउने किरात जातिको अहिलेको स्थिति हेर्दा पत्याउनै मुस्किल पर्छ। किरातहरूले यति लामो समयमा निर्माण गरेको सभ्यता, कला र साहित्य कुन स्वाँठ शासकले नष्ट गर्‍यो होला!
समयको गर्तमा हराएका वेदहरू बेलायती राजले खोजेर भारतीयहरूलाई सुम्पेको इतिहास पढ्दा र हड्सन नामका बेलायती अनुसन्धानकर्ताले लिम्बू मुन्धुमको पाण्डुलिपि बेलायतको म्युजियममा लगेर संरक्षण गरेको थाहा पाउँदा गजब लाग्छ, युरोपियनहरूको देब्रे मस्तिष्क चलेकै हो। तीतो सत्य त बौद्धिक संस्कार नै बसाउन सकेनौं हामीले। राजनीतिक दलको सिफारिसमा त्रिभुवन विश्वविद्यालयले कोटाका आधारमा डक्टरेटको शोधपत्रमा अनुमति दिन्छ। प्रज्ञा प्रतिष्ठानमा बसेर बौद्धिक कसरत गर्न पनि राजनीतिक दलको आशिर्वाद चाहिन्छ।
कहिले निर्माण गर्न सकौंला हामीले राजनीतिक हस्तक्षेप मुक्त नेपाली बौद्धिक समाज र संस्कार? महावीर पुनले जस्तो कतिन्जेल विदेशमा मजदुरी गरिरहेका नेपालीहरूसँग याचनामा ओठ च्यातिरहनु पर्ने हो हामीले? कहिलेसम्म युवा मस्तिष्कको मृत्युमा मलामी गइरहनु पर्ने हो? यसको उत्तर कहिँ सुदूर भविष्यमा जरुर होला।
( साभार:- हाङयुग अज्ञातको लेख, सेतोपाटि)


Thursday, March 30, 2017

हमारी औकात से बाहरका बिज्ञान

(लेखक:- अनिल कार्की , साभार- नैनिताल समाचार )
बचपन में ठुल दा के साथ हल जोतते हुए भौत बार भिमल के लचकिया सिकड़े से पीठ की मालिश हो जाया करती थी। पहले बाज्यू, फिर ठुल दा हल जोतने लगा। जब वह भर्ती हुआ तो दो तूल हल मैने भी बाया। लेकिन उसके बाद मैं भी गाँव के स्कूल से पिथौरागढ़ आ गया। फिर कभी बताल के बखत गाँव की तरफ लौटना न हुआ। सारा लाजम ईजा ही संभालती रही और बल्द जोतने का ठेका शिवदा को दे दिया। हम कभी-कभार गौं गये तो शिवदा के साथ हल पकड़ कर ‘ह ह’ कर देते थे बस। बाज्यू ने सिखाया था कि जिम्दार के खेत बंजर नी रहने चाहिए। धरती माता शाप देती है। इसलिए वो जब तक जिन्दा रहे, मर-तर कर हल जोतते रहे। ईजा ने कहा जब तक प्राण हैं तब तक मैं जमीन को बंजर नी होने दूँगी। ईजा के हठ के आगे हम दोनों भाई भी मजबूर होकर काम करते रहे और अभी भी कर रहे हैं।
इस बार ठुल दा को छुट्टी नहीं मिली तो मुझे ईजा का फोन आया, ‘‘कब आ रा है घर ?’’ मैने कहा, ‘‘अभी तो कुछ विचार जैसा ही नी है।’’ तो दूसरी तरफ से आवाज आयी, ‘‘विचार ही करो तुम लोग बस। मुझे ही बाँध ले जाना है शैद तिथान में इस लाजम को। तुम लोग तो सब बणी गये हो। देप्त बिगड़ गया है शैद, तभी बिरबुती रखे हो।’’
दूसरे दिन चुपचाप पिथौरागढ़ की तरफ चल दिया। पिथौरागढ़ में काव्य-गोष्ठी थी, उसमें कविता पढ़ी और अगले दिन रात्तिब्यान ही आँगन में पहुँच गया। ईजा तो खेत जा चुकी थी। द्वारों पर साँकल लगी पायी। बकरियों के बच्चों ने आँगन में खूब उछल-कूद मचा रखी ठैरी। साँकल खोल, झोला चाख में रख कर सीधे खेत ही चला गया। बुति-धानि की बाताल आई ठैरी गाँव में। हम जैसे फसकिया लोगों के लिए किसको टैम। खेत में पहुँच कर ईजा पैलाग कहा, तो उसने ‘जी रौ’ कहते हुए शिवदा से कहा- ‘‘ए शिबु झट घड़ी टेकी जा रे,’’ और मेरी और मुड़ कर कहा, ‘‘जा बल्द पकड़।’’ मैं ज्यों ही आगे बढ़ा कि शिवदा ने कहा, ‘‘काखी अब इतना पढ़-लिख कर बल्द जुतवाओेगी क्या भाया से?’’ ‘‘किसने कहा रे कि पढ़-लिख कर बल्द नी जोतते, तब तो पढ़-लिख कर खाते भी नी होंगे।’’
शिव दा ने दोरन्त दिया, ‘‘अब तो भूल भी गया होगा भाया बल्द जोतना।’’ ईजा ने मेरी ओर प्रश्नभरी नजरों से देखा तो लगा जवाब देना चाहिए। मैंने कहा, ‘‘नी नी भूला नी हूँ, क्यों भूलूँगा?’’ मैंने ईजा की तरफ बिना देखे ही ये बात कही थी, पर जानता हूँ उसके चेहरे पर क्या भाव रहे होंगे उस बखत। बारह बजे तक जुताई हुई। शिव दा ने कहा, ‘‘अब खोल देते हैं बैल। टैम हो गया है, भाया भी थक गया होगा।’’ बैलों को खोलने वाले विचार से तो ईजा सहमत दिखी, पर मेरे थकने वाले विचार पर उसने फिर कहा, ‘‘सत्तर साल से मैं नी थकी तो ये कैसे थक सकता है ?’’ उस बखत ईमान से मुझे पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू ’पाश‘ की ये पंक्तियाँ याद है ।
पहले खूब बैल थे गाँव में। अब जमा पाँच हल बल्द रह गये हैं। इतने बड़े गाँव की जुताई का पूरा जिम्मा इन बैलों के कन्धे पर है। बैल भी उदास, भूखे-प्यासे और मरियल ही लगे। पैले तो वो बैल शुभ माना जाता था, जो दैं खेल कर अपने सीगों में मिट्टी लगा कर घर लौटता था। अब उत्तराखण्ड के मैंस ही गल्या बल्द हो गये हैं तो जानवरों से दैं खेलने की उम्मीद करना बेमानी है।
बैल भी हाल के हल गए थे लेकिन लगते थे, जैसे न जाने कितने बूढ़े। न सर पर फुन्ने, न सिंगों पर तेल, न ही कमर में जुडि़। कहाँ हरा गया होगा हमारे गाँव का रस, जबकि अभी वहाँ उतना पलायन भी नहीं हुआ है ? पहले तो बाज्यू कहते थे बल्द तो किसानों की शान होते हैं, इनके पेट नी पड़ने चाहिए। हमारे घर में जौं, मंडुआ और भट्ट एक में मिला कर आटा पीसा जाता था और फिर उसमें पीना (सरसों की खली) मिला कर खिलाया जाता था। तब इतने तगड़े बैल होते थे कि दो बेंत का चौड़ा नस्यूड़ा चार स्यु में पूरा खेत जोत जाता था। अब आजकल के बैल तो अच्छे से हल भी नी खींच पा रहे, न ही वैसे तजुर्बेदार हलिये मिट्टी की नब्ज पकड़ सकें। हाईस्कूल पास लड़के हल का हतिन्ना पकड़ने में कतराते दिखे। पिथौरागढ़ कालेज में बी.ए. कर रहे बच्चों को लगता है कि पढे़-लिखे को हल नहीं पकड़ना चाहिए। ये काम तो अनपढ़ गँवारों का काम है। फिर भला देश-प्रदेश गये लोग जो क्यों अपने खेतों की सुध लें ? पता नहीं पहाड़ के मैस कितने जो वेल एजुकेटेड हो गये हैं हमारे। बामण तो पहले ही हल से कतराने वाले ठैरे। खसिये तो हाल के वर्षों तक बैल जोत रहे थे अब लगभग सभी छोड़ रहे हैं। जो गरीब-गुरबे रह गये हैं, वही लोग हल जोत रहे हैं।
हल को गरीबी और अछूत समझने के पीछे जहाँ एक ओर पहाड़ी सामंती अभिजात चरित्र है, वहीं हाल हाल का बाजार और भूमण्डलीकरण के तीखे प्रभाव ने इसे हवा दी है। जहाँ एक तरफ हम फल और फूल उगाने वाले किसान के बारे में कभी-कभार अख़बारों में सचित्र खबर पढ़ लेते हैं, वहीं गम्भीर खाद्यान्न उगाने वाले किसान लगातार हाशिये पर धकेले गये हैं। नगद पूँजी कमाने और बाजार की चकमक से कौन बच सका है भला, फिर पहाड़ में तो बहुत कम जमीनें हैं। पर कई-एक सेरों में अच्छा नाज हो जाता है। लेकिन अब तो कई पहाडि़यों ने गाँव से अपना देवता भी शहर सार दिया है। लिंटर वाले मकान के सबसे ऊपर देवता थाप कर वहीं हो रही है देवता की भी मान-मिन्दी। सही ठैरा जब देश के सारे नेता और बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकारों के लिए देश बराबर दिल्ली और राज्य बराबर देहरादून हो गया है तो बेचारे उस लाटे देवता ने जो क्या बिगाड़ा।
बामन बुबू ने मरियल बैलों और हलियों की अकड़बाजी से परेशान होकर नया ‘हाथ ट्रैक्टर’ गाँव पहुँचाया है। बामन बुबू का कहना है, ‘‘नाती कौन कचकच सुने इन लोगों की, चाय पीकर गिलास तक नहीं धोते। उल्टा इनके नखरे सहो। ये हाथ टैक्टर चीज है, जै हो विज्ञान देवता की।’’
मैने पूछा कितने का पड़ा आपको ? तो बोले- ‘‘वैसे तो एक लाख बीस हजार का है, सब्सिडी में अस्सी हजार बैठा।’’ इतने में ईजा सुबह का कल्यो लाकर खेत आ गई और हाथ ट्रैक्टर को देखकर बोली, ‘‘दिगो बामणज्यू, तुम्हारी बैल की हल तो भौत अच्छी है ‘डिजल’ से चलने वाली। पंडित जी ने हँसते हुए कहा, ‘‘होय पाँच लीटर में चार घण्टे चल जाता है। पल्ले गाँव किराये पर दिया था वापस ला रहा हूँ।’’ मैं चौंका। मैंने पूछा, ‘‘किराये पर ?’’ तो शिव दा ने कहा, ‘‘हाँ भाया किराये पर दे रहे हैं गुरू ट्रैक्टर को।’’ मंने शिवदा से न पूछ कर सीधे गुरू से ही पूछा, ‘‘कितने पैसे में दे रहे हो ?’’ ‘‘चार सौ रुपये में सात बजे से लेकर बार बजे तक।’’ कहते हुए उन्होंने ट्रैक्टर स्टार्ट किया तो मैंने चुटकी लेकर कहा, ‘‘गुरू हल तो हल ही हुआ, लकड़ी का हो या लोहे का। कहीं आपके जजमान आपको हलफोड़ कहना शुरू न कर दें, खबरदार रहना।’’ एक घड़ी रुककर बोले, ‘‘जब इसमें जुताई वाली ‘फार’ लगाते हैं उस वक्त मैं इसमें हाथ नी लगाता। केसरी ही (मजदूर) जोतता है।’’
उनके जाने के बाद शिवदा ने उस ट्रैक्टर की कमियाँ (बुरायी) बतानी शुरू कीं, ‘‘भाया बल्द तो बल्द ही हुए। जो बात इस जुताई में है वो इस ट्रैक्टर में नहीं। फिर ये ट्रैक्टर आल-चाल, कन्सी-डिबाई नहीं लगने ठैरा। जुताई के बाद फिर कस्सी से आल-चाल सुधारने हुए। सभी जो ट्रैक्टर वाले हो जायेंगे तो बल्द किस काम आयेंगे ?’’ मैंने कहा, बात तू ठीक कह रहा शिवदा। पर विज्ञान भी तो कोई चीज है, आम आदमी का फायदा तो होने वाला ठैरा इसमें।’’


हल जोतते हुए शिवदा ने बल्द रोक दिये और गुस्से से बोला, ‘‘भाया अस्सी हजार का विज्ञान खरीदने की अपनी औकात नी हुई रे। ये तो कोई पैसे वाला ही खरीद सकता है। फिर क्या आम आदमी का फायदा हुआ इसमें ? हमारे पेट में तो पड़ गई ना लात।’’ फिलहाल मेरे पास शिव दा के इस सवाल का उत्तर नहीं था। मैं अवाक् रह गया। शिवदा ने पूरे जोर से बैल की पीठ पर भिमल का लचकदार सिपका जमाया और बैल तेजी से हल खींचने लगे। इस सड़ाक्क से मुझे अचानक ठुल दा याद आ गया।

Wednesday, March 29, 2017

मै जब लेख्लो त...

मैं जब  कविता माँइ  लेख्लो ब
 मेरा ईजा कि अनाऽर
गाऽड गोधरा लेख्लो्
चणा पिटिङा लेख्लो
बोट बटेउला लेख्लो
गणा खुनलान मणिको 
साउलो सोत्तर लेख्लो
नाऽजका गेणामेणानकि बात लेख्लो ।

डाङानका उच्चा भिटामाइ
पाठानलाइ दूद खोयुनोइ
घास चद्या बाकरो लेख्लो ।
संज्या बेला सिङमाई माटोलाइ
घर दउड्डो बल्लऽ लेख्लो ।

मै जब इजाका बारे माइ
कबिता बनौलो त
फिक्का चाहा कि कट्की लेख्लो
शिलामाइ पिसेको नून लेख्लो
बन मौरानको म ऽऽ लेख्लो।

मै जब इजाकाबारेमाइ
लेख लेख्लो त
मनमनै उनले गरेको भक्कल लेख्लो
केइ नसक्याऽ बेला गरेकि घाऽत लेख्लो
हलिभाणि बट्याएका बेला
                                                                                       उचाइन राख्खाकि खोज्याका
                                                                                     धोतिका गाँठा लुकाएका पैसा लेख्लो।

इजाका बारेमाई लेख्ख बार मै
निसुरी भयालै हाँसिरन्या
रुबस्या अनाऽरका बारेमाइ लेख्लो ।
जऽज्ज्यालै काममाइ लागिरन्या
खसरा हातौनका बारेमाइ लेख्लो
फुुटिबरे चिरा पड्याका खुुट्टानमणि लाएको
लिस्या मइनका बारेमाइ लेख्लो ।

इजाका बारेमाइ लेख्ख बार मइ
काज ब-यात सकिया पछा
अफना घर झानबाऽर
देलि पुज्जलाकि
पिलपिलऽ आँँसु बगऔनलाकि
चुुपचाप हिट्टलााकि
चेेलि बैनिनका बारेमाइ लेख्लो ।

जब लेख्लो मै मेरि इजाका बारेमाइ
सरकारी नौकरिमाइ लागेका चेेलाधेकि
छाति फुुलाएका बाबा हैलइ
बेरोजगार हुनबार
भुुलिउनाकि लेखा
इजाले भण्याका निकीऽ अर्तिपुर्ति
हँस्यौन्या हउस्यौन्या शव्दौनकि कुरणि लेख्लो ।

इजाका बारेमाइ लेख्दबार मै
मइले काम नपाएका
 बेरोजगार बिरामी दिनौनकि बाऽत लेख्लो
तनै दिनौनसित मैलाइ
ठगौन्या भुुलौन्या हमरौनकि
"गँवल्या- सरकार" का हालचाल लेख्लो
हमलाइ हकारिबरे खान पल्केका
" ठालु-हाकिम" का चालमाल लेख्लो,
मै केइ  बेदना लेख्लो
केइ बुक्कुलि लेख्लो ।
 इसो भयाबरे मेरि इजा
रिसाइबरे आजिलै भणऽलि ब!
" तै तसि सरकारका घर
आग लागौ वज्जुर पणौ
तो तसो हाकिम मुणकट्या
अल्पाइ अचिराइ होइझौ
पख् , मै ज्याब् गरलो " ।

( साभार:- उदियमान उत्तराखण्डी लेखक अनिल कार्कीका कबिताको बैतडेली भावानुबाद )



Saturday, March 25, 2017

‘सुदूर’को अलौकिक सौन्दर्य, २१ फोटोमा :: Pahilopost.com

‘सुदूर’को अलौकिक सौन्दर्य, २१ फोटोमा :: Pahilopost.com: दीपसागर पन्त


सौन्दर्यको खानी सुदूरपश्चिम पर्यटनको ठूलो सम्भावना बोकेको क्षेत्र हो। यात्रीलाई मोहनी लगाउन थुम्काथुम्काबाट गाउँले युवतीझैँ जिस्क्याइरहन्छ, यहाँको अद्‍भुत…

गाउँका गराहरुमा उम्रिदै गरेका सपना

पृृष्ठ-प्रबेश

 बैतडी जिल्ला सदरमुकामबाट १४ कि मि मात्र टाढा रहेको मेरो गाउँ यस बर्षमात्रै सडक संजा्लसंग जोडिएकोछ । यो नयाँ ग्रामिण सडकमा देहिमाण्डौको पक्की राजमार्ग हुदै टेक्टर, जीप र मोटरसाइकलहरु निर्बाध चलिरहेकाछन् । यो सँगै केही नयाँ सपना र केही नयाँ चाहना पनि गाउँ भित्रिन थालेकाछन् । समय र परिस्थितिले समकालीन समाजलाइ कता डो-याउला ? ठ्याक्कै भन्न गारो छ । तर बदलिदो विश्व परिबेशमा मेरो प्राकृत जन्मथली बामे सर्न प्रयास गरिरहेको अडकल सहजै गर्न सकिन्छ । यिनै प्राथमिक पाइलाहरुको सानो परिचय यो आलेखमा राखिएकोछ।
समुद्र सतहबाट झण्डै ८२२-११६६ मिटर सम्म उचाईमा रहेको यो गाउँ तत्कालिन दुर्गास्थान गा बि स को सबैभन्दा बढि जनसंख्या भएको बस्ती हो । हालको पुनर्संरचनामा दशरथचंद नगरपालिकाको सात नम्बर वडामा समाबेश यो गाउँमा बिगत १० वर्षदेखि नै बिद्युत सेवा उपलब्ध थियो । ग्वाल्लेकधुराको पश्चिमी पार्श्वबाट बग्ने खोलाहरुले गर्दा पुरै बस्तिमा पानीको सुबिधा प्राप्त छ । ससाना कुलाहरुको मर्मत हुनसके सबै जसो जमिनमा सिँचाइ पुग्न सक्ने अबस्था छ । सारांशमा यहाँ जल, जमिन, जंगल र जनश्रमको छेलोखेलो छ । यहाँबाट बग्ने बगडागाड नै रौलाघाट हुँदै स्याडीगाडमा मिसिएकोछ र यसै गाडबाट निकालिएका कुलाहरुले पुजारागाउँ, स्याडी, कपर्त, धनचुलि र बगाउँसम्म सिन्चन गरिरहेकाछन् । हाल निर्माणाधिन बृहत्तर सुर्काल खाानेपानी योजना तयार भएमा गाउँभरि सिचाईको यथेष्ट सुबिधा प्राप्त हुने  आशा गर्नसकिन्छ ।
तत्कालिन दुर्गास्थान गाबिसको आबधिक योजना पुस्तिका २०७३ का अनुसार कुल साना ठुुला गरि १८ वटा बस्तिमा यहाँ २३९८ जना बसोबासि छन । गाबिस श्रोतका अनुसार कृषि र पशुपालनमा ९०% मानिस सँलग्न छन र ९८% घरधुरिको आफनै खेेति र पशुपालन ब्यबसाय छ । असीमकेदार मन्दिर र ग्वाल्लेक केदार धामको अवस्थितिले यो गाउँँ ऐतिहासिक र धाार्मिक दृष्टिले पनि महत्वपुर्ण छ । तर, बिडम्बना, समष्टिमा यहाँको गरिबी दर ३८.६८% आकलन गरिएकोछ । खान पुगेर खााद्यान्न बेच्नेहरु १०% होलान, ३० % ले मात्र यहाँको उत्पादनले गुजारा गर्न भ्याउछन् । यसरी हेर्दा यहाँको परम्परागत खेेतिप्रणाली र परम्परागत खाानपानका तरिकाहरुमा पनि परिवर्तन गर्नुपर्ने टडकारो आबश्यकता छ । र बिस्तारै कृषिलाई ब्याबसायिकरण गर्नु पर्ने देखिन्छ ।

ब्याबसायिक कृषिका सम्भावना

उल्लेखित पृष्ठभुमीको यो गाउँमा ब्याबसायिक कृषिको उच्च सम्भावना रहेकोले आधुुनिक सोच सहित खेेतिपातिमा आधुुनिकिकरण गर्नुपर्ने देखिन्छ । यसकालागि माटो र हावापानी मिल्ने गरि उचित उन्नत बिउबिजनको ब्यबस्था, गोठेमलको उचित ब्यबस्थापन र प्रयोग, साना सिँचाइकालागी कुला-पोखरीहरुको निर्माण, अत्याबश्यक कीटनाशक बिषादिहरुको उपलब्धता, उत्पादित कृषिउपजको बजार ब्यबस्थापन, आधुुनिक कृषिऔजारहरुको प्रयोग, कृषिसडकहरुको निर्माण, उच्चमुल्यबालीको खेेतिको शुुरुवात, कृषि बन प्रणाली र गरा खेेति प्रणालीको शुुरुवात, बैकल्पिक उर्जाको प्रयोग, भुुक्षय नियन्त्रण र जलाधार क्षेत्र संरक्षण, चरनक्षेत्र बिकास, बाताबरणिय चेेतना र लोपोन्मुख बाली संरक्षण जस्ता कार्यक्रमहरुसंग गाउँले किसानहरुलाई परिचित र प्रशिक्षित गराउनु पर्ने हुन्छ ।
यसरी आधुुनिक कृषिको शुुरुवातकालागि उदाहरणिय नमुना हुनेगरि परम्परागतरुपमा धान र गहुँखेतिमात्र गरिने गाउँकै उच्चसमस्थलीमा रहेको खाँण खेतलाई प्रयोग गर्न सकिन्छ । करिब २०० रोपनीको यो समथल ऐतिहासिक- धाार्मिक शस्यश्यामला उर्बर खेेतमा गाऊँका प्रतेक बासिन्दाको भाग हुनैपर्ने मान्यताका कारण खण्डीकरण रोक्नुपर्नेे देखिन्छ । यो खेेतमा बर्षातको पानिबाट मात्र सबैले एकै पटक रोपाई गर्दाको हतारो र हडबडका किस्साकहानीहरु अहिले पनि गाउँमा ठट्यौलिका बिषय हुन्छन ।यो मैदानमा भुुमिगत श्रोतबाट पनि पानीको जोहो गर्नसकिन्छ । त्यसैगरि खोला छेउछाउका खरफगाला र बाँझो जमिनमा दालचिनी, अमला, तेजपत्ता र रिठा तथा डालेघाँस लगाउन सकिन्छ । खोला किनारमा अलैची, अदुवा र बेसार खेेतिका उच्च सम्भावना छदैछन । ग्वाल्लेक शिखरबाट बग्ने आधाा दर्जन जति खोलाहरुमा टाउट माछा लगायतको सम्भावनातर्फ पनि परिक्षण गर्न सकिन्छ ।
यसै सिलसिलामाबेसीको बगडाखेत वारिपारि अहिले पनि आलुखेति र तरकारी बीउ उत्पादन गरेको रमाइलो दृश्य दृष्टिगोचर हुन्छ । यसलाई ब्याबसायिक बनाउदाको उपलब्धिबारे कृषकहरुलाइ जागरुक बनाउनु छ ।यसरी तत्काल गाउँ वरपरको ३०० रोपनी जति जमीनलाई तरकारी पकेटको रुपमा बिकास गर्न सकिने सम्भावना छ । तरकारी खेेतिका लागि यो स्थान अती उत्तम रहेको कुरामा कृषि बिशेषज्ञहरु समेत एकमत छन् । त्यसो त सुर्कालको चोतो ( स्थानिय ठुुलो डल्लो मुला ) र घिउले उहिलेदेखि नै यो भेेगभरि चर्चा पाएकै हो । स्थानिय रैथाने बिउको संरक्षण सम्बर्धन भएमा तरकारी खेेतिको बिकासतर्फ नमुना योग्य काम मानिनेछ । यो गाउका खोलाहरुमा रहेका ५/७ पानी घट्टमा यहाँको अर्ग्यानिक उत्पादन कुटानी पिसानीगरि प्याकेजिंग गरेर बजारमा ल्याउदाको महत्वलाई पनि ब्यापारिकरण गर्नु आजको सन्दर्भमा सारै सामयिक लाग्दछ ।

हालसम्मका प्रयास

स्थानिय श्रोत जुटाएर असंगठित रुपमै भएपनि बिगत ८/१० बर्षदेखि यहाँ कृषि र पशुपालन सम्बन्धि केही आशलाग्दा काम भएकाछन् ।बचतका अतिरिक्त टुक्रे रुपमा तरकारी खेेति गर्ने, उन्नत बाख्रापालन गर्ने जस्ताकांममा केही उत्साही युवाहरु सक्रिय देखिन्छन्  । तर बाहिरको नगण्य सहयोग र पुराना स्थापित कृषकहरुको पुरानै सोचका कारण आशाातीत उपलब्धि देखिएन । शुुरुशुरुमा त तरकारी लगाउदा खेेति गर्ने भन्दा माग्ने धेेरै भएको गुनासो सुनिन आयो । त्यसैमा पनि असमानता र अभावको घाउलाई बल्झाएर पसल चलाउन खोज्ने कथित नक्कली नायकहरुले गर्दा नयाँ चााहनाका प्रयास समेत त्यति सफल भएनन् ।
हाल कृषिसमुहमा बिधिबत दर्ता भएको असीमकेदार तरकारी कृषक समुहले छोटो समयमै बचत परिचालनबाट २ लाख जतिको कारोबार गरि कोषमा करिब एकलाख बचत गरेकोछ। यो समूहले बिस्तृत छलफल पश्चात् कृषिबिकासको बिस्तृत कार्यक्रम बनाएकोछ । यसरी दीर्घकालीन कृषिबिकासका योजना संचालन गर्न गराउन समूहले सक्रियता देखाएको छ । सबै क्षेत्र र निकायबाट सहयोग प्राप्त भएमा " उन्नत कृषि- समुन्नत जीवन, हाम्रो गाउँको नयाँ चिन्तन " भन्ने समूहको आदर्श वाक्यले मुर्त रुप लिनसक्नेमा बिश्वस्त हुनसकिन्छ । यिनै संभावना र प्रयासका अन्तरघुलनबाट हुने उपलब्धिले एउटा समुन्नत समाजको श्रृ्जना हुनेछ भन्नेमा पनि स्थानिय आशाबादी बनेकाछन् । " हाम्रो गाउँ हाम्रो शान; हाम्रै प्रयास हाम्रै पहिचान" को नारा बोकेको स्थानिय युवकहरुको दूरगामी सोचमा गाउँको उज्यालो भबिष्य चम्किएको देखिन्छ।