Saturday, June 26, 2021

पर्यटकीय संभावना भएको ठाउँ- केआई सिंहको गाउँ

पर्यटकीय संभावना भएको ठाउँ- केआई सिंहको गाउँ: मोहन्याललाई शक्तिशाली देवताका रुपमा लिन्छन् त्यहाँका मान्छेहरु, जुन मन्दिरमा के आई सिह २०१२ लेखिएको घाँट (घन्ट) झुण्डिएको छ। यसबाट सजिलै भन्न सकिन्छ २०१२ सालमा के.आई.सिंहले चढाएको घण्टा भनेर।

Saturday, June 19, 2021

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !  

हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! सुन चाँदिको माया मारी माटोलाइ गरेकाछौ  सप्रेम स्विकार हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ** कोलाहलले टेक्न नसक्ने, सानो एक्लो शान्त निबास सुर्य चन्द्रमा जतिकै यसमा झांगिएको प्राण-प्रकाश श्रम बैभवको बलले यसको जगमा ग-यौ चैतन्य बिकास एक एक दानाभित्र लुकायौ सैयौ दानाको हरियो आश यसमा बग्ने पसिना सारा हुन  गंगाका धौला धार । हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ** आधा नांगो कायासंग कसिएका बलिया अस्थि-खण्ड दधिचिका हाडहरु यि, इन्द्रका हुन् बज्र प्रचण्ड गतिशील  दिनरात नभनि गर्मि बर्षा होस या ठण्ड अरुलाइ पुरुस्कार दिए पनि आफूलाइ केबल दण्ड । झोपडिसंग झूक्छौ तिमि अग्लो गर्दै राजद्वार, हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ** यि खेत तिम्रा भरिला श्रृष्टि, छर्दै यिनमा प्राण बीज बर्षा हिउँद गिन्ति गर्दै, पुर्णे औसि होस या तीज बादल सित्तै उडि गएमा धर्ति सुक्दा सुक्दछ बीज आँशु झारि खेत भिजायौ,मनमा दुख भरिदो खीज ।  पंच अन्नका अमृत दाना, नैबेद्य रुपले बने उदार हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ** अपहेलित यो नारी शक्ति, दुषित यस्को अंग-राग बादल जस्तै बदलिदै यि साहस बोकि ल्याउछिन ताप कबि हो! विर्स तिम्रा सारा उपमा,यि हुन कुसुम, केशर, पराग यि जननी हुन, यिनका गितले मृत अंकुर हुन्छ फलिफाप । जीबनभरि नै सिके सिकाए, सुखले गर्नु दुख दुलार  हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ** यि राम-श्यामका सरल रूप, मटमैला शिशु हाँस्छन  खूब, यि मुन्ना, मोहन, हरे कृष्ण, मंगल, मुरली, बच्चू, बिठूब, यिनलाइ के चिन्ता व्यापोस, यि हुन धरतीका हरीया दूब थोरै दिनको जाडो गर्मी  सब यि भित्रै जानेछन डूब । यि  ढाल बनेका हाम्रालागि रोक्न दुर्दिनका प्रहार  हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! **  जन मनका अधिनायक तिमि हाँसेमा फुल्छ फल्छ यो देश  आऊ, सिंहासनमा राख्छौ छ मनको  राज्य अशेष  उर्वरा भूमि यो नयाँ  खेतको  नयाँ धान्यले सजोस  वेश यो धरतिमा   रहदै बस्दै भूमि-भार धारण गर्छौ, हे मनुज-शेष! आज यो कवितामा तिम्रो, विमल आरतीले गरे उतार  हे ग्राम देवता ! नमस्कार ! ***** ( गाउमै बसेर ग्रामिण परिबेशमा रमाएका आम श्रमजिबीलाइ नै ग्राम देवता मानेर भारतिय महान कबि सुमित्रानन्दन पन्तले लेख्नु भएको कालजयि कबिताको नेपाली अनुबाद ) ** महेन्द्रनगर  आषाढस्य प्रथम दिवसे, 2078

Friday, June 18, 2021

इतिहासमा नलेखिएको मधुवा आउजीले नरसिंहा फुकेको रणमैदान

इतिहासमा नलेखिएको मधुवा आउजीले नरसिंहा फुकेको रणमैदान: डोटेली सेना सबै काटिएपछि रणमैदानको केही परको ढिस्कोबाट एकोहोरो शत्रुलाई हेरिरहेका मधुवाले सोचेहोलान्, ‘अब मलाई पनि यिनले बाँकी राख्दैनन्। यिनका हातबाट मर्नुभन्दा आफै सेतीमा हाम फालेर मर्छु।’

Tuesday, June 15, 2021

शव बाहिनी गंगा

  एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’ 

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरीथके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी  

दर-दर जाकर यमदूत खेले मौत का नाच बेढंगा साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा  

नित लगातार जलती चिताएँ राहत माँगे पल भर नित 

लगातार टूटे चूड़ियाँ कुटती छाति घर घर  देख

 लपटों को फ़िडल बजाते वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’ साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा 

 साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति 

काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थर, ना मोती  

हो हिम्मत तो आके बोलो ‘मेरा साहेब नंगा’ साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा  

=रचनाकार-पारुल खक्खर 

(सत्ता हल्लाउने गुजराती कविताको यो हिन्दी अनुवाद कपि पेष्ट गरिएको हो । नजलाइएका थुप्रै लाशहरु गंगामा बगाइएको देखेर यो कालजयि काब्य पंक्ति कोरिएको थियो ।  )

Friday, May 28, 2021

नेपालमै होला श्रावस्ती ?

नेपालमै होला श्रावस्ती ?: लामो समयसम्म लुम्बिनी गुप्त रहेपनि पछिल्ला ६० वर्षमा कछुवाकै गतिमा भएपनि लुम्बिनीको संरक्षण, विकास र प्रचार प्रसार भएको छ । वर्षेनी ठुलो संख्यामा बौद्ध धर्मावलम्बी र पर्यटकहरु लुम्बिनीमा पुगिरहेका छन्...

Wednesday, May 26, 2021

कोरोना महामारीभन्दा कम कष्टपूर्ण थिएनन् ती दिन 

कोरोना महामारीभन्दा कम कष्टपूर्ण थिएनन् ती दिन : भट्ट कहिले घर नजिकैको त्यो भँडार छेउमा गएर बस्छन्।  कहिले निकै माथि रहेको काफलीको मन्दिर अवस्थित डाँडातिर दृष्टि फिजाउँदै तमाखु सल्काएर एकोहोरो उडाइरहन्छन् धुँवा। आस्तिक भावनाका उनी कुराकानीको सिलसिलामा भनिदिन्छन्– ‘यो सब उनैको लिला हो।’

Sunday, May 2, 2021

दिल बहादुर

 

      साभार- अर्जुन बिष्टको ब्लग


दिल बहादुर एक मेट ( नेपाली श्रमिक ) था, जो भवाली में लोगों का सामान इधर से उधर ले जाने का काम करता था।

उसे भवाली आये शायद ज्यादा समय नही हुआ था,क्योकिं वो अभी तक यहाँ की जगहों से कम ही परिचित था।

बिल्लू दा के साथ भवाली लेबर ढूँढने के दौरान, दिल बहादुर हमें मिला, लड़का ठीक लगा तो, बिल्लू दा अपनी ठेकेदारी वाली जगहों पर काम करने के लिये दिल बहादुर को ले आये।

वैसे भी दिल बहादुर जैसे नये लड़के के लिये भवाली में करने को ज्यादा कुछ नही था, क्योकिं नया होने की वजह से ना तो उसे जगहों के बारे में जानकारी थी ओर ना ही वहाँ के लोगों से उसका कोई परिचय था, इसलिए बिल्लू दा के काम करने में उसे फायदा ही था।

क्योकिं स्थान के परिचय बिना मेटों की कोई वकत नही होती, सामान को इधर से उधर पहुँचाने के लिये उन्हें क्षेत्रों का ज्ञान होना बेहद जरूरी होता है।

यहाँ दिल बहादुर को रहने की जगह भी मिल गई ,ओर करने को लगातार काम भी, इससे उसको निरंतर आमदनी का जरिया मिल गया।

वैसे दिल बहादुर भी बड़ा मेहनती लड़का था, मन लगा कर काम करता था, बिल्लू दा भी उससे खुश थे।

बिल्लू दा की लेबरों में अगर बिल्लू दा ,किसी पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे तो वो था दिल बहादुर,इसके चलते बिल्लू दा अपनी साईट की चौकीदारी का काम भी दिल बहादुर को सौंपा हुआ था, ओर दिल बहादुर उसे बखूबी निभाता भी था।


दिल बहादुर बड़ा शर्मिला था, बात बहुत कम करता था, उससे बात करने पर वो हजूर, जी हजूर ही बोलता था अधितर,नया होने के कारण उसे हिंदी भी कम ही आती थी।

पर दिल बहादुर था बड़ा रंगीला, इस बात का पता हमें तब लगा, जब एक दिन रात को उस साईट पर जाना हुआ,जहाँ दिल बहादुर दिन में काम भी करता था ओर रात में वहीं रहता भी था।

जब मैं बिल्लू दा के साथ साईट पर पहुँचे तो अंदर से जोर जोर से गाने की आवाज आ रही थी, देखने पर पता लगा की गाना तो दिल बहादुर गा रहा था, अब कौनसा गा रहा था, ये तो नही पता पर एक लाइन जरूर समझ में आई, जिसमें दिल बहादुर कह रहा था, सुन लई छा ऐ हजूर, ये शायद नेपाली भाषा में था।

अचानक हमें देख दिल बहादुर चुप हो गया, हमनें उससे पूरा गीत गाने को कहा ओर उसने पहली बार बिना ना नुकुर किये पूरा गीत फिर सुना दिया।

बिल्लू दा ने उसे खुश होकर 100/- रुपये दिये ओर अच्छी सब्जी लाकर बनाने को कहा, फिर हम वहाँ से निकल लिये।

रास्ते में बिल्लू दा बोले आज दिल बहादुर पिन्नक ( नशे ) में था, तभी हमारे एक बार कहने पर दुबारा गाना गा कर सुना दिया, अगर पिन्नक (नशे ) में ना होता तो मरे ही ना सुनाता।

मुझे भी बिल्लू दा की बात में तंत नजर आया क्योकिं दिल बहादुर जैसा शर्मिला व्यक्ति, यूँ एक बार कहने में कैसे गा गया।

इस मेट कम्युनिटी के बारे में पता किया तो, पता चला की ये खाने पीने के काफी शौकीन होते हैं, दिन भर मेहनत मजदूरी करने के बाद रात को अच्छा खाते पीते हैं, ताकि शारारिक चुस्ती फुर्ती बनी रहे,ओर साल के आखिर में ये लोग अपने गाँवो की ओर निकल लेते हैं।

लोग चाहे इनसे ठीक व्यवहार नही करते दिखते, पर दिल बहादुर जैसे लोग ,आज भी पहाड़ की लाईफ लाइन मानी जाती है, पहाड़ी रास्तों पर भारी भरकम सामान लाने ले जाने के ये अभ्यस्त जो होते हैं।