Friday, December 15, 2017

आफनो माटोमा आफ्नै बाल्यकाल

( साभार - डा अनिल कार्कीको संस्मरणहरुबाट )
अगास में पंछी रिटो धर्ती पड़ी छाया
जसि तेरी पानी तीस उसी मेरी माया
 सब किसी न किसी तंग दर्रे में ही पैदा हुए। वह तंग दर्रा संर्कीणताओं का भी हो सकता है। अन्धविश्वासों का भी हो सकता है या कि वह गरीबी और फटेहाल हालातों का तंग दर्रा भी हो सकता है। हम जब तंग दार्रों से खुले अकाश में आते हैं। तब तंग दर्रे हमें किसी रोमांचक अनुभव से भर देते हैं। पंछियों से हमारे मन ने उड़ना सीखा है। किसी लोकगायक ने इस पर क्या अद्भुद कहा है।
आसमान उड़न्या पंछी पानी पिन्या रैछ
मैं ज कूँ छ्युँ दिन जानान उमर जान्या रैछ।
(आसमान में उड़ने वाला पंछी भी पानी पीने के लिये धरती के पास ही उतरता है ओह मैं समझता था दिन गुजरते है पर असल में हम सब की उम्र गुजर जाती है)
पंछियों के बहाने हमने भी कई उड़ानें भरीं। जीवन के पाठ पढ़े । जिन पंछियों से मैंने बचपन में संवाद किया है। मैं, कभी-कभी उन पंछियों की आवाजें सुन के आज भी ठिठक जाता हूँ। आज मैं उन पंछियों के बारे में बात करूँगा जो कहीं स्मृतियों में बैठ गये हैं। पहली स्मृति बहुत बालपने है। ईजा अपने पैरों पर बैठा के लौरी गा रही है। लौरी में एक पंछी का जिक्र आता है।
घूघूती बासूती
आम् का छ
भाड़ मे छ
(ओ! घुघूती बास तो तू/और बता आमा कहाँ है? /भाड़ में है ।)
पहला गीत हम पहाड़ी या हिमाली लोगों ने शायद घुघूती पर यही सुना होगा। क्योंकि घुघूती से हमारा बचपन, जवानी और बुढ़ापा जुड़ा है। आप पूछेंगे कैसे? बचपन में हम घुघूती पर लौरी सुनते थे। जवानी में घुघूती के बहाने अपने प्रिय को याद करते । लोकगायक गोपालबाबू गोस्वामी का यह गीत याद तो है ना?
घुघूती न बासा
आमाकी डाई में
घुघूती नी बासा
तेरी घुरघुर सूणी
मैं लागो उदास
स्वामी मेरा परदेश
बर्फिला लदाख
घुघूती नी बासा
यानि कि ओ! घुघूती मत बोल। आम की डाली में बैठ कर/तेरी घूर-घूर सुन के / मुझे उदास लग जाता है/ मेरे स्वामी इस समय नोकरी पर है / बर्फीले लद्दाख में। घुघूती पर एक मार्मीक गढ़वाली गीत भी है। इस गीत में एक स्त्री घुघूती को याद करते हुए चैत का माह याद करती है। अपने पिता का घर याद करती है।
घूघूती घूरूण लैगी मेरा मैत की
बौड़ी बौड़ी आग्ये रितु रितु चैत की।
(मेरे मायके की घुघूती बोलने लगी है कि आ गई रितु चैत की)
हमारे यहाँ बुढ़ापे में जब कोई बहुत कमजोर हो जाता है । उसके बाल सफेद हो जाते हैं सा सूख उसकी गर्दन पतली हो जाती है। वह कृशकाय दिखने लगता है तो उस उससे कहते हैं, “देखो! घुघूत जितना रह गया है” (जब घुघूती अण्डे सेती है तो मरगिल्ली सी हो जाती है उसी का संन्दर्भ ले कहते होंगे) फिर वह पुसुड़िया उत्तरायणी में का त्यार (त्यौहार) याद आ गया। घुघूते उड़ाने का उत्साह तो अजब-गज्जब था। अलसुबेर चार बजे नहा धो के झन्नाटेदार ठण्ड में कौवे बुलाने लगते।
काले कौवा का का
पूसकि रोटी माँघै में खा
ले कौवा भात मै दे सुनु की थात
ले कौवा पुरी
मै दे सुनु की छुरी
ले कौवा लगड़
मै दे भ्ये बैणियों क् दगड़
ले कौवा बड़ो
मै दे सुनु को घड़ो
ले कौवा क्वे
मै दे भलि ज्वे
(कोले कौवा का का । आजा! पूस की रोटी माँघ मे ही खा जा। ले खा भात, मुझे दे बदले में सोने की थात। ले यह पूरी, मुझे बदले में दे सोने की छुरी। ले खा ले लगड़, बना रहे भाई बहनों का दगड़ (साथ)। ले कौवा बड़ा ले, बदले में सोने का घड़ा दे। ले कौवा क्वे, बदले में दे मुझे अच्छी सी ज्वे । यानी कि अच्छी पत्नी या पति )
बचपन में, मैं एक सवाल सभी से पूछता था। “घुघूते ही क्यों उड़ाते हैं कोई दूसरी चिड़िया कयों नहीं?” तो घर वाले या बड़े-बुजुर्ग कहते, “क्योंकि घुघूते पवित्र होते हैं।” मेरी जिज्ञासा यही पर दम तोड़ देती । मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि हमारे लोक में घुघूती जैसे सरल पंछी के प्रतीक को कौवे को खिलाने का क्या मतलब रहा होगा । जो भी मतलब रहा हो पर कौवा जब जूठा करके घुघूते छोड़ जाता तो गाँव के बड़े बुजुर्ग कहते, “इस झूठे को गर्भवती भैंसों व गाय को खिला दो ।” उनकी उटपटाँग धारणा थी इसे खाने के बाद जानवर मादा संन्तान ही पैदा करते हैं। कौवे को लेकर बड़ी रहस्यमय और रोमांचक बातें हमने बचपन में सुनी थी। जैसे, अगर कौवा आँगन में बैठ के काँव-काँव करने लगे तो वह यह बता रहा कि कोई प्रिय मेहमान आने आने वाला है। जब भी कौवा आँगन में बैठता तो हम चिल्ला उठते
साँचि छै सर
झुठि छै मर।
यानि कि, साँच है तो जा उड़कर दूसरी जगह जा और झूठा है तो मर जा। इसके विपरित यदि वह कड़ाती (कर्कश) हुई ध्वनि निकालता तो सब उसे भगाने लगते यह किसी बुरी खब़र का प्रतीक माना जाता । हमारे प्रवासी पहाड़ियों के लिये एक कहावत है जब वे परदेश में होते और उन्हें अपने देश का कौवा भी दिख जाये तो वह भी उन्हें लाडला लगता है। मैंने एक बार एक रूसी उपन्यास ’पराजय’ में छापामार यु़़द्ध के बाद अनाज को छोड़ कर भागे ग्रामीणों के खेतों में कौवे का अद्भुद चित्रण पढ़ा। मैं जब भी कौवा देखता हूँ इस उपन्यासकार को जरूर याद करता हूँ। उम्मीद करता हूँ कि कभी मैं भी कोई ऐसा ही अमिट चित्र गढ़ सकूँगा। बचपन में दूर आसमान में उड़ रहे चील से जिसके फैले डैने विशाल हाथों से लगते थे। उन डैनों के अगले हिस्से ठीक अंगुलियों की तरह होते। जैसे ही वो हमें दिखता हम चिल्लाते
अरे ओ ! चिलड़ी मुनड़ी हल्कै दे। ओ!
चील अपनी अंगुली में पहनी मुनड़ी तो हिला दे। वह सुनता था या नही पर जैसे ही हम यह कहते वह अपने डैनों को झ्याप-झुप्प से खोल-बन्द करता। हम कहते, “देखो उसने सुन लिया और अपनी मुनड़ी हिला दी। कोयल जैसे ही बोलती, “कूहू” हम समझते वह पूछ रही है कि कौन है? हम उत्तर देते, “अरे। हम है।” वह पिर बोलती, “कूहू” तो हम हड़का के कहते, “मैहूँ” पर कोयल कहाँ चुप रहती वह बोलती जाती और हम कौन कम थे, हम भी उस पर चिल्लाने लगते। वह बोलती “कूहू” तो हम कहते तेरी ईजा (माँ) है। तेरा बाब (पिता) है। इसी तरह जाने क्या अण्ड बण्ड उससे कहने लगते। पहाड़ में जब खेत में नाज पकने को होता है उस समय में एक चिड़िया बोलती है। उसका बोलना इस तरह सुनाई देता है। “बी कूई ग्यो” हम उसका अर्थ इस तरह लगाते थे, ’बीज सड़ गया है’। वह चिड़िया कह रही है, “गाँव वालो जल्दी से नाज समेटो वरना बीज सड़ जायेगा।” बड़े बुजुर्ग भी यही दोहराते थे। पहाड़ों में जब एक पहाड़ी जंगली मीठा फल ’काफल’ पकता है तो एक चिड़िया यों बोलती है “काफल पाक्को” लगतस है जैसे कह रही हो काफल पक गया है। जैसे ही वह बोलती हम उसे पलट जवाब देते “मैले नै चाख्खो” मतलब कि अभी मैंने नहीं चख्खा है और तू कह रही काफल पक गया है।
इस तरह के सैकड़ो पंछीयों से हम झगड़ते और संवाद करते। उनसे रूठते और उन्हें मनाते थे। क्या अजीब दौर है यह, हमने तो जैसे अपने बच्चों घरनुमा जेल में कैद ही कर दिया है। अब उन पर आरोप कि वे कार्टून देखने से बाहर ही नहीं निकल पाते। रात दिन टीवी से चिपके रहते हैं। दरअसल बच्चांे पर यह आरोप गलत है यह गुनाह हम बड़ों से हुआ है हम इसके दोषी है। क्योंकी हमने उन्हे प्रकृति से संवाद कर सकने की कला नहीं सिखाई। हमारी इस गलती को भविष्य के गंभीर नागरिक कभी माँफ नहीं करेंगे। वे अपनी काग़ज की डीग्रियाँ फाड़ कर एक दिन पूछेंगे कि हमको अपना बचपन क्यों नहीं जीने दिया गया? क्यों नहीं करने दिये गये पेड़, पहाड़, पंछी, पानी-नदी-सागर से हमें संवाद। क्यों हमें केवल रट्टू तोता बनाया गया। तब आप क्या कहेंगे? खैर आप भी क्या कहेंगे, मध्यवर्ग की दुहाई देने के अलावा। अब अन्त में एक लोककथा जो एक ऐसी पहाड़ी स्त्री की है जो कई जानवरों के साथ ही कागभक्या (कौवे की भाषा) जानती थी। वैसे मैंने एक तांत्रिक के पास कौवे का कटा पंजा देखा था। कौवे के पंजे इतने लचीले होते हैं कि वो तांत्रिक उस कटे पंजे से सबको ठगा करता था, “यह कौवे का पंजा आपकी अंगुली पकड़ के मुझे बतायेगा कि अपका भाग्य कैसा है?” मैंने कौवे के पंजे की पकड़ का कारण लोगों को समझाकर उस तांत्रिक की रोटी बन्द करवा दी थी । ओह वह कागभाषा जानने वाली औरत की कहानी ।
एक आदमी की शादी हुई। जैसे ही वे दोनों शादी से निपट के, कपड़े बदलने लगे दुल्हन अपने झुम्मर-झुमके उतारने को कान में हाथ लगा के रिंग घुमा रही थी कि ठीक उसी समय कहीं दूर शमशान में एक सियार बोला। दुल्हन का हाथ अचानक ठिठक गया। आदमी बोला, “क्या हुआ?” दुल्हन ने कहा, “मुझे थोड़ी देर के लिये बाहर खुली हवा में जाना है अकेले ” यह सुन के आदमी ने कहा, “ठीक है जाओ!” उस आदमी ने दुल्हन को जाने दिया पर चुपके से वह भी पीछे पीछे उसके साथ बारह निकल गया। जिस तरफ से सियार की आवज आ रही थी दुल्हन उसी ओर चली जा रही थी । आदमी अचानक चैंका, “यह क्या यह तो शमशान की तरफ जा रही है।” आदमी घबरा गया उसने देखा कि दुल्हन सियार के सामने वैसे ही हूँक रही है जैसे सियार हूँकता है। दुल्हन सियार के साथ पास ही रखे एक मुर्दे पर झुक गई । यह देख के आदमी डर के मारे थर-थर काँपने लगा । दुल्हन उस मुर्दे के पैरों के पास देर झुकी रही। फिर हाथों के पास, फिर छाती के पास, कान के पास। वह कुछ देर में उठ खड़ी हुई और सियार ने उस मुर्दे को खाना शुरू किया। दुल्हन ने अपना पल्लू ठीक किया और वह लौट आई यह सब आदमी देखता रहा। वह उसके पीछे पीछे घर आया । दुल्हन सबसे पहले जानवरों के गोठ (जहाँ जानवर बाँधे जाते हैं) में गई वहाँ दिवार पर बने फलिण्डे पर उसने कुछ रखा और और फिर कमरे में आई तो देखा कि आदमी थर-थर काँप रहा है। उसने एक नज़र दुल्हन को देखा और फिर भाग के अपने पिता के पास चला गया। बूढ़े पिता से उसने कहा, “पिता कैसी दुल्हन लाये आप मेरे लिये । वह ता नरभक्षी है । अभी अभी मैंने उसे सियार से बात करते हुए सुना। उसने शमशान में सियार के साथ मिलकर एक मुर्दे को खाया। यह सुन बूढ़ा बोला, “मैं कल ही इसे इसके पिता यहाँ छोड़ आऊँगा तू चिंता न कर।“ दूसरे दिन बूढ़़ा ससुर दुल्हन को लेकर वापस उसे उसके पिता के घर छोड़ आने को चल पड़ा। चलते-चलते जब वे थक गये तो वह एक छायादार पीपल के पेड़ की जड़ पर बने चबुतरे पर बैठे गये। पेड़ पर एक उड़ता हुआ कौवा आया और और काँव काँव करने लगा । दुल्हन समझ गई कि कौवा क्या कह रहा है? पर उसने कौवे की बात को अनसुना किया । जब कौवा जिद करने लगा तो वो अचानक बोल पड़ी, “तिरिया बोली ये गत भई, तू क्या बोले काग।” यह सुन के बूढ़ा ससुर ठिठक गया। वह बोला, “बहु! बात क्या है? क्या तू कागभाषा जानती हैं?” यह सुनकर बहु बोली “कल रात सियार बोला, “कोई मेरी बात समझ समझ सकते तो मेरी एक मदद कर दो, शमशान में एक लाश आई है। उसके पैरों से लेकर गले तक गहने है। तुम इन गहनों को खोल के ले जाओ और लाश मेरे लिये छोड़ जाओ।“ यह सुन कर मैं शमशान गयी और गहने ले आई जो मैंने बकरियों के गोठ के फलिण्डे पर छुपा दिये। पर तुम्हारे बेटे को लगा कि मैं उस लाश को पर झुक के उसे खा रही थी।” ससुर यह सुन कर और आश्चर्य में डूब गया। वह बोला, “अभी यह कौवा क्या कह रहा है?” तब दुल्हन ने बताया, “वह कह रहा है, ओ स्त्री! मेरी एक मदद कर दे, जिस पत्थर पर तू बैठी उसके दो हाथ नीचे एक सोने का घड़ा मिट्टी में दबा है। तू उस घड़े को निकाल ले जा, पर उस घड़े के मुँह में एक मेंढ़क बैठा है। मुझे बहुत तेज भूख लगी है उस मेंढ़क को मुझे दे जा। यह सुन कर बूढ़े ससुर ने पत्थर हटा के मिट्टी खोदनी शुरू की। दो हाथ नीचे उसे सोने के सिक्कों से भरा घड़ा मिला। उस घड़े के ऊपर एक मेंढ़क बैठा था कौवा झपटा और मेंढ़क को ले उड़ा । घड़ा वह वहीं पर छोड़ गया। यह देख के बूढ़ा ससुर खुश हो गया। उसने बहू से माफी माँगी उसे वापस घर ले आया । पहाड़ की लोक कथाओं में, गीतों में या कहावतों में सुनाई देने वाली उक्ति “तिरिया बोली ये गत भई, तू क्या बोले काग।” के पीछे यह रोमांचक कथा छुपी हुई है। ये मुझे भी बहुत बाद में जाकर पता चली । कागा, कोयल, पंछी तो अब गुजरे जमाने की बात हो गई।
एक सूफी सन्त फरीद ने तो जुदाई सह रही नायिका के लिये लिखा था।
कागा सब तन खाइयो
चुन चुन खाइयो मांस
दो नैना मत खाइयो
मोहे पीया मिलन की आश ।
जिसे आप इस समय के प्रचलित एक खूबसूरत हिंदी गीत ’नादाँ परिंदे घर आजा’ में सुन सकते है।
बची रहे आश और बना रहे विश्वास ।

मुलुक : कुमाउँनी कविता की परंपरा एवं कुमाउँनी कविता के साम...

मुलुक : कुमाउँनी कविता की परंपरा एवं कुमाउँनी कविता के साम...: अनिल कार्की  यशपाल सिंह रावत दिव्या पाठक कुमाऊँ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में भिन्न-भिन्न धारणाएं प्रमुख हैं- “(1) कुमू या कुमाऊँ श...

Sunday, December 10, 2017

सेवा निबृत जीवन र जीवनसाथी


साभार- आशुतोष गर्गको ब्लगवाट )

सेवानिवृत्ति और आपके जीवन साथी के साथ संबंध - भाग 1

जब आप सेवानिवृत्त होते हैं, आपका बॉस बदल जाता है। किसी समय आपका बॉस वह था जिसने आपको नौकरी दी थी, अब आपका बॉस वह होता है, जिससे आपने शादी की। किसी ने ठीक ही कहा है, शादी, उस शराब की तरह है, जो जैसे-जैसे पुरानी होती चली जाती है, उसका नशा वैसे-वैसे ही बढ़ता जाता है।

आपकी सेवानिवृत्ति की अवधि तक आपकी शादी के लगभग तीन दशक हो चुके होते हैं। आपको लगने लगता है कि आप एक-दूसरे को बख़ूबी समझने लगे हैं, वैसे भी उन दिनों आप अपने-अपने करियर में इतने व्यस्त रहते हैं कि वास्तव में आपके पास एक-दूसरे को देने के लिए उतना समय भी नहीं होता है। आप अपने पूरे वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे की निजता का सम्मान करते हैं और कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आते, आप गंभीर मसलों को दबे-छिपे रहने देते हैं। अब आपको लगता है कि पिछले तीन दशकों से आप अपने साथी के साथ जिस तरह दिन के पूरे 24 घंटे बिताना चाहते थे, वह समय आ गया है लेकिन आप यह जानकर हैरत में पड़ जाते हैं कि जैसा आपको लगता था कि आप अपने साथी को पूरा जानते हैं, क्या आप वैसा सच में अपने साथी को पहचानते भी हैं, या नहीं?

कई नाख़ुश युगलों की समस्या तब शुरू होती है, जब सेवानिवृत्ति को लेकर उनकी अपेक्षाएँ समान नहीं होती हैं और यह तब और भी बढ़ जाती है जब वे इस बारे में कभी बात तक नहीं करते। कुछ लोगों के लिए यह कुछ रोमांचक करने का बहुप्रतीक्षित समय होता है, वे अपने प्रियजनों के साथ अपने रिश्तों में नयापन लाना चाहते हैं या उसे मजबूत करना चाहते हैं और नए उद्देश्य तलाशते हैं। जबकि दूसरों के लिए इसका अर्थ कंप्यूटर के सामने या गोल्फ़ के मैदान में आराम से ढेर सारा समय बीताना हो सकता है।

एक-दूसरे को हलकान कर छोड़ने की बजाए, अच्छा हो कि दंपत्ति अपने भविष्य के लिए कोई ऐसी योजना बनाए, जिस पर दोनों की आपसी सहमति हो। उन्हें इस बारे में सोचने और चर्चा करने की ज़रूरत है कि वे कितना समय साथ में व्यतीत करना चाहते हैं और उसे किस तरह से गुज़ारना चाहते हैं। यह संवाद आप दोनों को सेवानिवृत्ति से बहुत साल पहले शुरू कर देना चाहिए।

सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद के कुछ सालों में नोंक-झोंक-तकरार होना बहुत ही आम है। शादी का तनाव तब और भी गहरा हो जाता है यदि दोनों में से कोई एक पहले सेवानिवृत्त होता है। विवाह एक संस्था है, जिसे बनाए रखने के लिए किसी को पूरे जीवन उस पर काम करते रहना पड़ता है, न कि सेवानिवृत्ति तक उसे ऐसे ही अनदेखा पड़े रहने दिया जा सकता है। सेवानिवृत्ति के बाद कई जोड़े एक-दूसरे के साथ अपना समय बहुत ख़राब तरीके से बिताते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे के साथ निबाह नहीं कर पाते। हमारे कई ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने सेवानिवृत्ति की उम्र में जब उनके बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में लग गए थे, अपनी अलग दुनिया बसाना पसंद किया या कोई दूसरा जीवनसाथी चुन लिया।

यहाँ तक कि वे शादियाँ जो नौकरी-चाकरी के दिनों में बनिस्बत ठीक जान पड़ती थीं, उनमें भी किसी न किसी कारण झगड़े होना शुरू हो जाते हैं क्योंकि पति-पत्नी अब हर दिन एक-दूसरे के साथ बहुत-सारा समय बीताने लगते हैं।

इसकी वजह है कि सेवानिवृत्ति, वैवाहिक जीवन के कई पहलुओं में बदलाव ले आती हैं और कई चीज़ें खुद को भी बदलनी पड़ती है।

अमेरिका, यूरोप और जापान में “सेवानिवृत्त पति सिंड्रोम (रिटायर्ड हसबैंड सिंड्रोम- आरएचएस)” बहुत चर्चित विषय है, यहाँ तक कि इस विषय पर शोध प्रबंध तक लिखे गए हैं। कुछ जापानी महिलाएँ तो अपने सेवानिवृत्त पतियों को “सोधीगोमी” या कि कहे “भारी-भरकम अटाला” तक कहती हैं। अमेरिकी और यूरोपीय महिलाओं के पास भी इसके लिए ऐसा ही कोई शब्द होगा। पुरुष के सेवानिवृत्त होने के बाद दोनों के लिए जीवन बदलता है और सेवानिवृत्ति के बाद के पहले कुछ वर्षों में ही कई महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ते हैं।

अब यह बात असामान्य नहीं रही कि जो दंपत्ति अपने कामकाजी जीवन में साथ रहते थे उन्होंने बुढ़ापे में "ग्रे" तलाक का निर्णय ले लिया हो। जिन समस्याओं को आम तौर पर “काम के नाम पर” दरकिनार कर दिया था अब उनके फन उभरने लगते हैं क्योंकि अब पर्याप्त समय होता है और दंपत्ति जानते हैं कि उनके पास इन समस्याओं से दो-चार होने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं बचा है।

यदि आप झटपट यह जानना चाहते हैं कि आप और आपका साथी एक-दूसरे के कितने अनुकूल हैं, तो एक-दूसरे के साथ सप्ताह के सातों दिन, 24 घंटे साथ रहकर देखिए। समस्याएँ ख़ुद-ब-ख़ुद मुँह-बायें खड़ी होने लगेंगी। यही वह परीक्षा है जिसका सामना दंपत्तियों को आम तौर पर सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद करना पड़ता है। जिन सालों में पति-पत्नी ने स्वतंत्र जीवन शैली को जीया था उसकी तड़प उन्हें उस दिन होती है, क्योंकि उन्हें इस सच्चाई का सामना करना पड़ता है कि उन दोनों के बीच कुछ भी समान नहीं है। पूरे वैवाहिक जीवन में वे आपस में कोई भी समान रूचि पैदा करने में नाकाम रहे हैं- उन्होंने आपसी सामंजस्य को बनाने के लिए कुछ नहीं किया होता। आपसी सम्मान और संवेदनशीलता पर कोई रिश्ता खड़ा करने की बजाए उन्होंने एक-दूसरे की भावनाओं को नज़रअंदाज़ किया और वैवाहिक जीवन को ही पूरे जीवनभर के लिए खो दिया।

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए एक दोस्त ने टिप्पणी की, “सेवानिवृत्ति से पहले मेरी पत्नी मुझसे मदद माँगती तो मैं अनिच्छा से उसका काम करता था। अब वह कहती है कि मुझे क्या करना चाहिए क्योंकि मेरे पास करने के लिए और कुछ नहीं है और उसका ऐसा कहना मुझे बहुत बुरा लगता है।”

किसी महिला के नज़रिए से देखे तो वह कहेगी, “आपके पति की सेवानिवृत्ति के बाद, मानो आपको दोगुना पति मिल जाता है, और वेतन आधा।” यह बहुत ही हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा गया वक्तव्य है। जबकि एक वृद्धा ने कहा, “कभी-कभी मैं सुबह झुंझलाहट के साथ उठती हूँ। किसी दिन मैं पति को सोने देती हूँ!”

मैंने अपने उन दोस्तों के सामने, जो अभी-अभी सेवानिवृत्त हुए, जिस सबसे बड़ी चुनौती को देखा वह है समय, जिसे उन्हें अपने जीवन साथी के साथ बीताना था। अधिकांश युगलों में जिनकी शादी को अभी तीन दशकों से कुछ अधिक हुए हैं, उन्होंने जीवनसाथी के साथ जो पहले समय बीताया था वह तब था, जब बच्चे साथ में थे, ऐसा तब तक रहा,जब तक बच्चे महाविद्यालय या काम की वजह से कहीं और न चले गए हो, पर उसके बाद भी वे उसी वक्त साथ होते थे जब फुर्सत के पल हो जैसे सुबह की चाय का समय या रात्रि के भोजन का समय। ध्यान दीजिए, शादी के लगभग तीन दशक बाद आप दोनों में से कोई भी इस स्थिति में नहीं है कि दूसरे इंसान की विचार शैली को बदल सके या बदलने की कोशिश तक कर पाए।

पूरा दिन घर पर रहकर बिताने का विचार करना भी एक चुनौती है, जिसे सोचना भी दुर्गम लगता है। आप दोनों एक दूसरे के साथ दिन के 24 घंटे कैसे बीता सकते हैं, वह भी एक ही जगह रहकर और तब भी कोशिश करें कि एक-दूसरे के पास खुद की एकांत की पर्याप्त जगह हो।

मैंने पति-पत्नी दोनों के मुँह से कई बार यह आम बात सुनी है कि “पता नहीं, हम लोग सेवानिवृत्ति के बाद कैसे जी सकेंगे।”

आप दोनों के बीच यह समायोजन बैठा पाना एक चुनौती है, जिसके पार करना होगा। यदि आपका जीवनसाथी कामकाजी है और अभी तक सेवानिवृत्त नहीं हुआ है, तो आपको कुछ और घरेलू जवाबदारियों संभालने की तैयारी दिखानी होगी। यदि वह कामकाजी नहीं है तो घर के उसके कुछ कामों में हाथ बँटाना होगा, जो हो सकता है आपने पहले कभी न किए हो। युगलों को पता चलता है कि वे एक-दूसरे के उतने अनुकूल नहीं है जितना उन्हें पहले लगता था क्योंकि उन्हें अब पूरे दिन एक-दूसरे का सामना करना पड़ता है।

मेरी पत्नी ने पूछा, "आज आप क्या कर रहे हो?"
मैंने कहा “कुछ नहीं "
उसने पूछा, "जो कल कर रहे थे उसका क्या हुआ"
मैंने कहा, "वह अभी तक पूरा नहीं कर पाया"

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए सामाजिक तौर पर जुड़े रहना बहुत ज़रूरी है। अधिकांश सुखी सेवानिवृत्त दंपत्ति वे देखे गए हैं जो कई दोस्तों के साथ बड़ी सक्रियता से अपना सामाजिक जीवन गुज़ारते हैं। महिलाएँ इसे बड़ी आसानी से अपना लेती है और वे आम तौर पर समाज से अधिक जुड़ी भी होती हैं, उनके दोस्तों और परिवार के साथ भावनात्मक संबंध बनिस्बत अधिक मज़बूत होते हैं। पुरुषों के लिए महिलाओं की तुलना में सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन अधिक कठिन होता है, इसकी एक प्राथमिक वजह तो यह है कि वे जीवन के शुरुआती समय से ही कभी गहराई से रिश्ते निभाने को लेकर अधिक चिंतिंत नहीं होते। पुरुष सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक बने रहने के लिए अपने साथी पर अधिक निर्भर रहते हैं और बहुत हद तक वे इसकी ऐसी माँग भी करते हैं।

अपने पूरे कामकाजी जीवन में आप दोनों अपने काम और बच्चों से बेहताशा घिरे रहे होंगे। पहला बदलाव तो आपको तभी दिखाई देगा जब आपके बच्चे स्कूली पढ़ाई के बाद घर के बाहर कदम रखेंगे। चाहे वे आपके ही देश के किसी महाविद्यालय में पढ़ने के लिए जाएँ या विदेश जाएँ, इतना तो तय है कि उन्होंने घर से उड़ान भर ली है और वे अपने जीवन में आगे बढ़ने लगेंगे। यह पहला समायोजन है जिससे अधिकांश दंपत्तियों को आगे जाना पड़ता है क्योंकि अब वे भी ऐसे माँ-बाप हो जाते हैं जिनके बच्चे बड़े होकर उनसे अलग हो गए हो, “खाली नस्ल” बनने की आशंका को झुठलाया नहीं जा सकता। हालाँकि अपने व्यस्त कार्यकाल और सामाजिक तानेबाने में आप दोनों इस बदलाव को आसानी से पार कर जाते हैं।

दूसरा बड़ा बदलाव तब होता है जब आप सेवानिवृत्त होते हैं। अचानक आप दोनों घर पर होते हैं और जब कई बदलावों के अनुरूप खुद को ढालने की कोशिश में होते हैं तब आप दोनों अपने रिश्ते में भी कुछ जगह तलाशते हैं। आप दोनों के बीच जितने भी मसले रहे हो उन्हें भूल जाइए और अपने जोड़ीदार को अपने आगे के पूरे जीवन के साथी के रूप में देखिए। किसी दूसरे साथी को खोजना जो आपके हर पागलपन और ग़लतियों को स्वीकार करने की तैयारी रखें और आपके साथ एक ही छत के नीचे रहने के लिए तैयार हो, काफी मुश्किल है।

योजना बनाइए,लेकिन योजनाओं की अति मत कीजिए न ही अपने या एक-दूसरे के रोज़मर्रा के जीवन में भारी फेर-फार कीजिए। थोड़ा समय खाली छोड़ दीजिए, शायद कुछ अप्रत्याशित हो जाए या फिर कभी कहीं यूँ ही घूमने निकल जाइए।

इससे आप वास्तव में अपने सेवानिवृत्त साथी के अपने आस-पास के साथ को पसंद करने लगेंगे और अगले कई सालों तक उसके साथ की चाहत को बरकरार रख पाएँगे।

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(लेखक गार्डियन फार्मेसीज के संस्थापक अध्यक्ष हैं। वे ५ बेस्ट सेलर पुस्तकों – रीबूट- Reboot. रीइंवेन्ट Reinvent. रीवाईर Rewire: 21वीं सदी में सेवानिवृत्ति का प्रबंधन, Managing Retirement in the 21st Century; द कॉर्नर ऑफ़िस, The Corner Office; एन आई फ़ार एन आई An Eye for an Eye; द बक स्टॉप्स हीयर- The Buck Stops Here – लर्निंग ऑफ़ अ # स्टार्टअप आंतरप्रेनर और Learnings of a #Startup Entrepreneur and द बक स्टॉप्स हीयर- माय जर्नी फ़्राम अ मैनेजर टू ऐन आंतरप्रेनर, The Buck Stops Here – My Journey from a Manager to an Entrepreneur. के लेखक हैं।

ट्विटर : @gargashutosh                                      
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ब्लॉग : ashutoshgargin.wordpress.com | ashutoshgarg56.blogspot.com)
                            
                                                 






Wednesday, December 6, 2017

पट्टु राम राम


( योगेन्द्रनाथ दिक्षितको हिन्दी कबिता " घर चाहता है, मै तोता बन जाउ" को भावानुुबाद )
पेन्सन पकाएर घर आउदा आफुत
पिंजराको सुगा जस्तो पो हुन पुगिएकोछ।
जाली भित्रको कमानीमा मात्र झुुन्डिएर
राम राम जस्तै केही मात्र बोलिरहन पर्ने
फगत एक थान पट्टुमा परिणत भइएछ।

पिजरामा राखिएको बासी दालमा 
जथाभावी मिसाएका टुक्रे रोटीसंगै
कटौराको फोहर पानी
मेरो दैनिकीको खाान्गी बनेकोछ ।

मेरो परीवारको कृपामा परेर 
साना फुुच्चेले सिकाएका केही जार्गन बोलेर 
म 
नयाँ भााषा सिक्दैछु ।
आँँखाा नचाउदैु ।
तोकिएको परिधिमा नाच्दैछु ।
त्यहि गर्दैछु
त्यहि बोल्दैछु।
आफनै प्वाख तोल्दैछु।
मुक्त आकाश हेर्दैछु ।
हात खुुट्टा तन्काएर
पट्टु राम राम भन्दैछु ।।
 म सुगा जस्तै बनुँ
म सोच्दैछु, मेरो घर सोच्दैछ ।।

Monday, November 13, 2017

सार संक्षेप ; आफनै इतिहासको

सार संक्षेप ; आफ्नै इतिहासको 


** हालको पश्चिम नेपाल पहाडखण्डभरि प्राचीन कालमा क्रमस: किरात, मंगोल तथा खस आर्यहरुको मिश्रित बस्ती ।
**बाह्रौ शताब्दितिर गंगा किनारका मैदानीआर्यहरुको यस पहाडी प्रदेशमा आगमन ।
# ज्ञात ईतिहासको  यही असपष्ट प्रारम्भिक कालखण्डमा  ( सम्भवत: बाह्रौ शताब्दितिर) #

१ -आत्रेय गोत्री शक्ति भट्ट  (कान्यकुब्ज, हालको कानपुर क्षेत्रतिर जन्म ) 
२-पृथ्बी भट्ट
३-कान्यकुब्जबाट उदय भट्टको  उत्तरान्चलतिर आगमन
४-५ छोराहरु कुर्मान्चल हुदै नेपालतिर
५-???????????????????
६-राजा बत्सराज (डोटीमा )
७-उपबत्सराज भट्ट……………………
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**चौधौ शताब्दी  आर्यहरुको आगमन क्रमको कैयौ श्रृंखला ।  भारतमा मुसलमानको शासन ।  

१-कालु भट्ट--  सम्भवत: बि सं १४५० तिर कान्यकुब्ज-काशि-कुमायुँहुँदै कालिपश्चिमका बायुतटीय बस्तीमा आगमन ।
२-त्रिपुरराज भट्ट----जासु र उदासु   ३ भाइ। जासु उदासु बारे जानकारी छैन ।
३-काशिराज भट्ट
४-गजराज भट्ट
५-श्यामराज भट्ट  - श्रीकेदार आलमा असिमकेदार मन्दिरको निकट पहिलो बासस्थल ।
६- मोति भट्ट-(संभबत: १५९५ बि सं ताका जन्म ) । यसैताका लमजुङे राजकुमार द्रब्यशाह गोर्खाको लिगलिगकोटका राजा बनेका थिए ।  स्वराडको सङौणकोट र बैतडीको कुल्लेक कोटमा समेत बैमनष्यता थियो । स्थानिय रजौटाबाट मोतिलाइ बडाभट्टको उपाधि । कालान्तरमा मोति बडूको नामबाट बंशावलीको माला उन्न, बुन्न  र  केही गुन्न समेत  हामीलाइ दरिलो आधार प्राप्त भएकोछ ।
 
**मोति बडाभट्ट को नामबाट अर्को नयाँ श्रृंखला ।


  1. ६- मोति बडू- ४ छोरा, १ छोरी ।
  2. ७-लखनदेव -(मुख्य सुर्काल)-रतनदेव (माइखर्क),सतनदेव (कोइराली) र प्रतापदेव (अज्ञात )  अनुमानित अवधि -बि संं-१६२५ । तीन छोरा ।
  3. ८-शंकरदेव( मुखिया राठ)-काशिदेव ( मल्लागाउ पट्टि) र दुल्लप बडू(डङाली पट्टि)  १६५५  बि सं तिर जन्मेका । २ छोरा ।
  4. ९-कपुरे( परीगाउपट्टि) र-मगी बडू (चोरा,देउला र पुजारागाउपट्टि)। बि सं१६८५ तिरको समय । गोरखामा राजा रामशाहको शासन । रौला र ढिककोटमा पनेरुको राज्य (१७०५)। सङौणमा जैतुको उदय र खेेम चन्दको अवशान । ३ छोरा ।
  5. १०-जसी बडू( परीगाउँपट्टि, २ छोरा )----हिरा (नोला पट्टी)----रामी बडू ( निसन्तान, बिनाभट्टलाइ निकाली आफू असिमकेदारका पुजारी बनेका । षडयन्त्रमा मारिएका । )
  6. ११-कालो बडू( तल्लाघरपट्टि )१ छोरा मात्र----हिमरे बडू ( मल्लाघरे पट्टि)
  7. १२-रतन बडू ( २ छोरा ) १७१० तिरको समय ।
  8. १३-लाटो बडू----धनी बडू( निसन्तान ) । रैका राज्यको पतन।
  9. १४-मनुवा बडू (१८५० तिर ।) गोर्खाली प्रबेशको प्रारम्भिक काल । ४ छोरा । २ को अपुताली ।
  10. १५-गुमानी बडू( खर्कबटा ),सकते ( निसन्तान), काशि( निसन्तान) र दामु बडू( तल्लाघरीपट्टि) ।
  11. १६-नन्दराम बडु ---( खर्कबटापट्टि)
  12. १७-मनिदत्त बडू---( सम्भवत: बिक्रम १९५० को जन्म )३ छोरा २ छोरी ।
  13. १८-धर्मानन्द(१९८५) -रामदत्त र दामोदर बडू३ भाइ / २ बैनी कुन्ति र काली पाण्डेय ।३ छोरा/१ छोरी
  14. १९-भानदेब बडू(२०१३)----दत्तराम र कृष्णदत्त बडू—३ भाइ र १ बैनी रमा बडू जोशी।
  15. २०-दीपेन्द्रदेब(२०३६), कैलाशदेव(२०३९), दिलिपदेव(२०४३) र बासुदेव बडू(२०४८)---४ जना भाइ ।     

Tuesday, November 7, 2017

घरेलु अपराधी

घरेलु अपराधी
( कथा )
***------***

यो तीन कोठाको घरभित्र एकान्तमा बसेर अखबार पढने कुनै पनि उपयुक्त ठाउँ छैन । कहिलेकाही छतमाथि उक्लिने सिढिमा बसेर पढन थाल्यो भने घर मालिक्नीको ओहोरदोहरको क्रम जानाजान थपिन्छ र टोकोटोक्सो शुरु हुन्छ ।
" यो के तरिका हो ? यो पनि यसरी बसेर पेपर पढने ठाउँ हो र ?
"
अती भएपछि यदाकदा उ प्रत्युतरमा सोध्छ ।
" कहाँ बसेर पढुँ त ?"
" मेरो टाउकोमा बस अब ।  अरु कहाँ ..  । "
सारै छि: भन्न नमिल्ने गहुँ गोरी मध्यम कदकाँठी कि अधबैसे मालिक्नी च्याठिन्छिन ।  खिरिलो जिउडालको प्रौढ मालिक लज्जित जस्तै भएर त्यहाँबाट उठ्छ ।
आफैले धोएर सुकाएको स्वेटर हातमा लिएर उ अहिले पनि असमञ्जसमै छ । स्वेटर कहाँ थन्क्याउने भनेर निर्णय लिन अप्ठ्यारो परेकोछ  ।  भएको यौटा दराज राजुका कपडाले भरिएकोछ, अर्कोमा छोराछोरीका । यस्तोमा जता राखे पनि खप्की खानु निस्चित जस्तै छ । नसोधी जहाँ राखे पनि राजुले स्वेटर बाहिर निकाल्ने त छन नै, " तमीज नभएको " भनेर बारसत्र कुरा पनि सुनाउनेछिन ।
पछिल्लो ५/७ बर्षदेखि यस्तै चलिरहेको छ । विशेष गरि सेवा निबृति पश्चात् । कुनै किताब पढदा पढदै उ बाहिर निक्लिनु प-यो भने" पढेर अब केही सिक्नु छैन " भन्दै राजु त्यो किताब अन्यत्र राखिदिन्थिन् । दिक्कलाग्दाको बेला बजाउने गरेको हारमोनीयम नचाहिने सामानको चाङ नजिक बुइगलतिर कुनामा राखिएकोछ । मनपरेको कुनै गीत सुन्नु पर्दा राजु बाहिर निक्लेको अबसर कुर्नु पर्छ । छोराले पठाइदिएको टु इन वान जस्ताको तस्तै कपडाले लपेटेर आलमारी भित्र सुरक्षित गरीएकोछ । हुदाहुदा रेडियो खोल्न थाल्यो भने पनि कहिले सानी छोरीको पढाइ डिस्टर्ब हुने र कहिले राजु स्वयमको आमासंग कुरा गर्ने समय हुने गर्छ । भन्ने हो भने उनी गाना बजाना र अखबार पढनुलाइ फाल्तु काम सम्झन्छिन । अझ ठुला मानिसले गर्न नहुने यो सामान्य काम मान्ने गरेकिछन् । घरका कोतेधन्दा सकेर जब कुनै पुराना गीतमा मन भुलाउन खोज्दै उ कानमा एयरफोन राखेर बस्छ भने पनि राजुले झटपट कामको नयाँ मेसो निकाली हाल्छिन् ।
" बस… अब गीत सुन्ने लहर चल्यो । बजारबाट तरकारी ल्याउनु पर्दैन… घरको पनि क्यै काम त गरिदिनोस्न ।"
" ल, एकै छिनमा ल्याइदिन्छु है ।"
" छाडेछुडेको, सडेगलेको थमाइ देलान । राम्रोसंग छानेर ल्याउनु होला नि । .. संगीतको सौख फुर्सतमा….।"
यसरी संधैको निहुँ खोजाइमा अपमानित हुँदा पनि झोला समातेर तरकारीपसलतिर लुरुलुरु लाग्नु बाहेकको बिकल्प रहदैन उसंग । बेमनले उ बजार चाहारेर आउँछ ।
तर जिन्दगी यस्तै गरि चल्दैछ । उ निष्पक्ष दार्शनिक मनले आफनो समीक्षा आफै गर्छ । चित्त बुझाउछ  र खुरुखुरु अर्हाएको गरिरहन्छ ।
" यो असन्तोष अस्वाभाविक नै हो त? " उ यदाकदा एक्लै च्याठिन्छ पनि । " यो माथिबाट पलाएकी ख्याउटी कुनै ज्यादै सम्पन्न ठुलाबडाको परिवारमा हुर्किएको पनि त होइन नि । हो, मेरो घरको हैसियत भन्दा केही बढि होला ।... यो  पापी मनको ठाउँ कहि नहुने …?" उ भित्रको ऋषि मन उसलाइ चुपचाप रहन आदेश दिन्छ ।
 उ पुराना दिन सम्झन्छ ।  सरकारी कार्यालयको सामान्य कर्मचारीको तलब नै कति थियो र  ? खानपिन, घरभाडा र छोरा छोरीको पढाइभन्दा पर उस्ले केही पनि सोच्न नसकेको सत्य हो । येनकेन यो शहरमा दुई कोठाको सानो घरसम्म जोडेकै हो । तर आफनो बाउको पाँचसात कोठाको घरसंग तुलना गरेर श्रीमतिले सँधै होचोमोचो गरेको हुँदा यो सानो घर नै ठूलो कचपचको माध्यम बनेकोछ । उ सोच्दा सोच्दै लामो श्वास फेर्छ ।
" घरमा भान्सा बाहेक तीन कोठा त हुनै पर्ने हो । … आफनो भने एउटा बाकस ,अलमारी र खत्र्याङखुत्रुङले भरिएको, अर्कोलाइ ड्राइङरुम या बेडरुम जे भने पनि भयो ।.. … यसरी कुरा  पैसामा आएर टुङ्गिन्छ ।" उ मनमनै हिसाब लाउछ । साधारण कृषकको सज्जन छोरो दुर्गेश स्वयम् आफनै नजरमा पनि सामान्यबाट सामान्यतर हुँदै जान्छ ।
"कति भित्र बाहिर गर्न सक्या हो यो बच्चा ? टीनको गेट बजाको छ, बजाको छ ।"
कानमा  राजुका परिचित कर्कश  शब्द पर्नु सँगै पर्दा थोरै सारेर बाहिर हेर्छ ।  टाढैबाट प्रष्ट देखिन्थ्यो, सानी छोरीका आँखामा भय छल्केको थियो । मुखका कुनाहरु तल झुक्न र बीच को भाग माथी उठ्न खोजे जस्तो देखिन्थ्यो । रुन रुन खोजे जस्ता चोसे ओठ देख्दा मन मा चोट परे पनि हेरुँ हेरुँ चाहिं भइरहेको थियो । डेरा मै बसी बसी उसले एसएलसी दिएको र बिराला ले छाउरा सारे झैं डेरा सार्दा सार्दै बीस वर्ष बिताएको  कुरा मनमा खेल्दै थिए । यो सानी बालिकासंग आमाले समेत सोझो मुखले कुरा नगरेकोमा उ अझ दिक्दारिन्छ ।
उ सम्झन्छ, कहिलेकाहि आउने सालासाली समेतले पनि अचेल अलि बढि नै हेप्ने गर्दछन् । एकदिन कान्छी सालीले भनेको उसलाइ टडकारो सम्झना छ ।
" भिनाजु, यो सर्ट पैन्टमाथि अरु थप अत्याचार नगरौ है । ब्रान्डेड जुत्ता र नयाँ हेयर स्टाइलमा मेरो भिनाजु कस्ता देखिएलान, कुन्नि ?"
उता सालाको सिकायत बेग्लै रहन्छ " भिनाजु! मेरो बर्थडेमा कुन गिफ्ट दिनु हुन्छ! साइकिल किनिदिनोस है । " यस्तो बेला राजुका चिम्सा तिरस्कारयुक्त आँखा उसैतिर सोझिएका हुन्छन । दुर्गेसको मुखमण्डल अपराधबोधको कालो बादलले नीलो भैरहेको हुन्छ ।
" यो जिन्दगी यतिकै जाने भयो ।" दुर्गेसको मनमयुर आफनै जंगलको उदास नाचमा रगमगिन्छ ।
" कसैलाइ पनि केही सन्तुष्टि दिन सकिएन । स्कुलका सहपाठी र शिक्षक समेत । परिक्षामा सार्न नदिएको कारणले साथिहरु रिसाए भने लेखाएको फर्मुला गलत प्रमाणित गरिदिएको कारण सिक्षक नाराज भए । आफ्नो ईच्छानुसार खेतिपातितिर मन नलगाएका कारण किसान पिताजी असंतुष्ट थिए भने आफनो भित्री धन्दामा सामेल नभएका कारण हाकिम कहिल्यै दाहिना भएनन् ।
उ भर्खर नौकरी गर्न थालेको थियो । पिताजी अर्थात ससुराजीले बिबाहको छिनोफानो हुँदाको त्यो दुर्भाग्यपुर्ण दिनमा उस्को समर्थन गर्दै भनेका शब्द पनि उसलाइ याद आउदैछन ।
" कार्यालयका असली मालिक त सुब्बा- खरिदार नै हुन। अफसर त टाढा देखाउन मात्र मिल्नेगरी उडीरहने चरा संझे हुन्छ। अफिसमा छरिएका पैसा बटुल्न सक्ने खुबी आफुमा हुनुपर्छ । "
तर दुर्गेसमा यो खुबी कहिले आएन । चारैतिर हताशा बाहेक केही देखिदैन । राजुका अधुरा ईच्छाका चाङमुनि दबिएर उ स्वयमका आकांक्षाहरु कहिले नउम्रिने बनेकाछन् ।
उसका नजिकका आफन्तहरुमा आठ बर्ष जेठी दिदी कुन्तीले मात्र उसको भावना बुझेकिछन क्या रे । आमा नभएको अबस्थामा उनैले स्याहार सुसार गरेकी पनि हुन । दिदी कुन्ती पिताजीको सिद्धान्त अनुसरण गर्छिन र स्थानिय बिध्यालयमा शिक्षिका छन् । रुपरङ्ग जेसुकै होस, बैचारिक र भावनात्मक स्तरमा राजू उसको समकक्षी होइनन भन्ने उनलाइ मात्र थाहा छ । छलछामबाट टाढारहने इमान्दार र प्रतिभाशाली भाइमाथि भैरहने घरेलु अत्याचारको छनक यिनले मात्र पाएकी छन् ।
राजूका बुवाले बडो आग्रह पुर्बक आफ्नी छोरीका लागि दुर्गेसको प्रस्ताव राखेका थिए । दुर्गेसका पिताजीले त्यसबेला  भनेको कुरा कुन्ती दिदीलाइ प्रष्ट याद छ  ।
" हामी येनकेन खानलाउन पुग्ने सामान्य गाउँले हौ । दुर्गेसले पनि यौटा सानो नौकरी भरखर शुरु गरेकोछ । हुनेवाला बुहारीले यसै गरीब घरमा घरजम गर्नैपर्ने अबस्था छ । हजुरले राम्रोसंग बिचार गरि निर्णय गरि बक्सेला ।"
"यति भन्दाभन्दै पनि छोरीको हात स्वेच्छापुर्बक उनैले दिएका हुन । यसमा हामीले अपराधबोध लिने कारणै छैन । एउटा क्लर्कको तलब कति हुन्छ? ती ठेकेदारलाइ थाहा थिएन र?"
कुन्ती दिदी कहिले काही ती कुरा सम्झाउछिन् पनि ।
" स्थितिलाइ उनको नजरबाट हेरेर सबै सहिरहनु पर्दैन।द्रब्यपिचासले तेरो भावना बुझ्नसक्ने छैनन् । "
यसरी दुर्गेसको बैबाहिक जीबनको यो एकान्तिक प्लेटफार्म सार्बजनिक नहोस भन्ने सत्चाहना कहिलेकाहि अमीलोमा बदलिन्छ । उ पनि दोधारमा हुन्छ । जुन दुर्गेसको समाजमा प्रशंसा गरिन्छ, जस्को इमानदारिता, सरलपन, बौद्धिक प्रतिभा, तर्क क्षमता र सामान्य ज्ञानको इज्जत गरिन्छ , त्यस आधारमा हीनताबोध गराइ पालतु नौकर बनाइ राख्ने दुष्चक्रप्रति उ सहसा सतर्क पनि हुन्छ ।
राजुले समसाँझै फेरि उसका साथी पारसले किनेको शानदार कार, देबेन्द्रको भब्य भवन, जनकको श्रीमतीको डायमण्ड सेट जस्ता प्रसंग झिक्छिन । दुर्गेसले झर्को माने पनि सम्झाउन कोसिस गर्छ ।
" हेर राजू! म यी बस्तुको महत्व नकार्न त सक्दिन । तर आफ्नो हैसियतको पनि ख्याल राख्नुपर्छ । मानिसको महत्व नगदी जिन्सीमा राखेर मात्र तोल्नु पनि हुदैन र तोलिदैन पनि । मानिसको मूल्य उसको गुणमा हुन्छ । "
" बस्.. ।" राजुको चर्को स्वर थपिन्छ ।
" यिनलाइ त भाषण दिन मात्र सिकाएको रहेछ ।…?"
" सबैसंग गाडी र बंगला हुदैन नि । नभएकाहरु खुशी छैनन र ? "
 उ भन्दै गर्छ ।
" सादा जीवन, उच्च बिचारको सिध्दान्त बोकेका मेरा पिताजी को म एक्लो छोरा । वहाँको आदर्सलाइ इमानदारीकासाथ बोकेकोछु । ब्यबहारमा गलत र बेकार लागे पनि समाजले सम्मान दिएकोछ । मलाइ यसैमा खुशी छ । "
" यस्ता भाषण त्यहि सम्मान दिने समाजलाइ सुनाउनु नि । मैले त भोगी सकेकीछु । भाग्यै यस्तो….। " राजु झन ठुस्किन्छिन । बाध्य भएर दुर्गेस बाहिर निस्कन्छ । दिन त कनिकुथी बरालिदै बित्छ पनि ।
साँझ घर फर्किदाको अबस्था झन अस्तब्यस्त देखिन्छ ।
भान्छाभरि छरिएका जूठा भाँडाले पत्नी रिसाएर माइत गएको वर्णन गरीरहेका हुन्छन् । यति मात्रै हो र, कुनै खास कारण बिना नै उ यसै गरि बेलाबखत दिउसै साँझै माइत जानेगरेको उपक्रम नौलो कुरा थिएन । यो कुनै एक दिनको कथा त होइन । उ पनि चिया र ब्रेड खाएर सुत्न अभ्यस्त भैसकेकोछ ।
थकित र कुपित भएर दोस्रो दोपहर राजुसित फोन सम्पर्क गर्छ ।
" पापासंग राम्ररी कुरा गर्ने मौका नै लागेको छैन । सायद भोलि फर्किन्छु कि  । " राजुको बनावटी बार्ता सुनीरहने आबश्यकता नै रहेन ।
दोस्रो दिन " पापा " ले नै फोन गरे ।
" ज्वाइँ सा,पलाइ आउने फुर्सत नभए म कसैसंग पठाइ दिनेछु । अर्को महिनासम्म एउटा ४/५ कोठाको घरसमेत तयार हुन्छ होला । यहाँ नै बस्दा बढि सुबिस्ता होला । मौका लागे हेर्न आए हुन्छ नि । "
दुर्गेसको शरीर चिलाउछ । ससुराजी नियतबश नै उसलाइ कंगाल सिध्द गरीरहेका जस्ता लाग्छन् ।
मन धेरै बिचलित हुन्छ । हारमोनियम निकालेर राजुको अनुपस्थितिको फाइदा उठाउन खोज्छ । ठिक त्यसै बेला कुन्ति दिदी आइपुग्छिन् ।
" बुहारीको गैरहाजिरीमा शौख पूरा गर्दै हो ?..बजाउ, बजाउ…कता गइन ?। घर लथालिङ्ग पो छ त ? "
कुन्तीले जुठा भाँडा एकातिर गरी झाडू लगाइन् । ओछ्यानमा तन्ना मिलाइ दिइन् । प्यारो सानो भाइलाइ एक्लै देखेर संगसंगै जरुरी प्रश्न पनि सोध्दै गइन ।
" छोराछोरीकी आमा भएर पनि राजुले आफनो परीवारमा रमाउन जानेकै छैन । माइती कै भरमा जिन्दगी आरामले चल्नसक्छ भन्ने सोचेकीछ ।….. कहिले फर्किन्छन ? छोरीको पढाइमा यसरी बाधा पर्दैन त ?  । "
" म के गरौ त , दिदी…… उसको समझ नै त्यस्तो छ । त्यो उसको मामिला हो । .. आफनो जिम्मेवारी नबुझि दिएपछि … । "
कुन्तीले आश्चर्यकासाथ भाइलाइ हेरी रहीन् । उसको सुडौल मुखाकृतिमा समयका निर्दयी धर्साहरु कोरिएका छन । फक्कडहरुको जस्तो रुखासुखा जीवन बाँचिरहेको दुर्गेसको निन्याउरो अनहार हेर्दै कुन्ति द्रबित भइन ।
सानोछँदा दुर्गेसको गल्तिको समेत जिम्मा लिने कुन्ति दिदी भाइलाई सम्झाउदै गइन ।
" आफनो जिउज्यानको  ख्याल गर है भाइ…. आफनो हैसियत अनुरुपको स्थान लेउ । "
" दिदी, म मेरै हिसाबमा जीवन बाँचीरहेकोछु । राजु आफै सुध्रिने आशा अझै बाँकी छ । " दुर्गेस सपष्टिकरण दिने कोसिस गर्छ ।
" यसरी अपराधबोध बोकेर बाँच्न गारो पर्छ, भाइ! । तिम्रो ससुराले बिबाहताका भनेका थिए,- मेरो छोरीको लागि यो भन्दा राम्रो घर भेट्टाए पनि यिनीभन्दा राम्रा वर भेट्टिने छैनन । … किन भनेका होलान भनेको त बल्ल कुरा बुझिदेैछ ।… त्यस्ता बनावटी कुराको घेराबाट बाहिर आउ । तिम्रो अगाडि सम्मानले भरिएको सुन्दर संसार छ ।त्यो चमकदमकभन्दा पर कलाको दुनियाँको पनि तिमी नायक बन्न सक्छौ।"  " हजुरले ठिकै भन्नू भयो दिदी…. ।"
अचानक फोनको घन्टी बज्छ। हतारिएको जस्तो दुर्गेसले फोन उठायो ।
" हेलो, … किन ...ल ठिक छ...आउछु, आउछु ।" भन्दै फोन राख्यो पनि ।
कुन्तिलाइ माइतबाट राजुको फोन आएको अनुमान गर्न गारो भएन । तर केही बोल्न सकिनन् ।
" दुर्गेसको बानी बुझि नसक्नु छ ।" मनमनै भनिन ।
खालि जाने बेला यत्ति मात्रै भनिन ।
" भोलि ससुराली जादैछौ , है न त ।…. ल म पनि फर्किन्छु , है ।"
लगत्तै उनी हिडिन पनि ।
चुपचाप उभिइरहेको दुर्गेसले कसैलाइ पनि अहिलेसम्म सफाई दिन सकेको छैन ।
"सबै जना उसैको भलाइका कुरा गरीरहेको हुन्छन र पो ….. ।"
उ मनमनै गुनगुनाइ रहेको हुन्छ ।

( २२ कार्तिक २०७४, महेन्द्रनगर )
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