Friday, May 28, 2021

नेपालमै होला श्रावस्ती ?

नेपालमै होला श्रावस्ती ?: लामो समयसम्म लुम्बिनी गुप्त रहेपनि पछिल्ला ६० वर्षमा कछुवाकै गतिमा भएपनि लुम्बिनीको संरक्षण, विकास र प्रचार प्रसार भएको छ । वर्षेनी ठुलो संख्यामा बौद्ध धर्मावलम्बी र पर्यटकहरु लुम्बिनीमा पुगिरहेका छन्...

Wednesday, May 26, 2021

कोरोना महामारीभन्दा कम कष्टपूर्ण थिएनन् ती दिन 

कोरोना महामारीभन्दा कम कष्टपूर्ण थिएनन् ती दिन : भट्ट कहिले घर नजिकैको त्यो भँडार छेउमा गएर बस्छन्।  कहिले निकै माथि रहेको काफलीको मन्दिर अवस्थित डाँडातिर दृष्टि फिजाउँदै तमाखु सल्काएर एकोहोरो उडाइरहन्छन् धुँवा। आस्तिक भावनाका उनी कुराकानीको सिलसिलामा भनिदिन्छन्– ‘यो सब उनैको लिला हो।’

Sunday, May 2, 2021

दिल बहादुर

 

      साभार- अर्जुन बिष्टको ब्लग


दिल बहादुर एक मेट ( नेपाली श्रमिक ) था, जो भवाली में लोगों का सामान इधर से उधर ले जाने का काम करता था।

उसे भवाली आये शायद ज्यादा समय नही हुआ था,क्योकिं वो अभी तक यहाँ की जगहों से कम ही परिचित था।

बिल्लू दा के साथ भवाली लेबर ढूँढने के दौरान, दिल बहादुर हमें मिला, लड़का ठीक लगा तो, बिल्लू दा अपनी ठेकेदारी वाली जगहों पर काम करने के लिये दिल बहादुर को ले आये।

वैसे भी दिल बहादुर जैसे नये लड़के के लिये भवाली में करने को ज्यादा कुछ नही था, क्योकिं नया होने की वजह से ना तो उसे जगहों के बारे में जानकारी थी ओर ना ही वहाँ के लोगों से उसका कोई परिचय था, इसलिए बिल्लू दा के काम करने में उसे फायदा ही था।

क्योकिं स्थान के परिचय बिना मेटों की कोई वकत नही होती, सामान को इधर से उधर पहुँचाने के लिये उन्हें क्षेत्रों का ज्ञान होना बेहद जरूरी होता है।

यहाँ दिल बहादुर को रहने की जगह भी मिल गई ,ओर करने को लगातार काम भी, इससे उसको निरंतर आमदनी का जरिया मिल गया।

वैसे दिल बहादुर भी बड़ा मेहनती लड़का था, मन लगा कर काम करता था, बिल्लू दा भी उससे खुश थे।

बिल्लू दा की लेबरों में अगर बिल्लू दा ,किसी पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे तो वो था दिल बहादुर,इसके चलते बिल्लू दा अपनी साईट की चौकीदारी का काम भी दिल बहादुर को सौंपा हुआ था, ओर दिल बहादुर उसे बखूबी निभाता भी था।


दिल बहादुर बड़ा शर्मिला था, बात बहुत कम करता था, उससे बात करने पर वो हजूर, जी हजूर ही बोलता था अधितर,नया होने के कारण उसे हिंदी भी कम ही आती थी।

पर दिल बहादुर था बड़ा रंगीला, इस बात का पता हमें तब लगा, जब एक दिन रात को उस साईट पर जाना हुआ,जहाँ दिल बहादुर दिन में काम भी करता था ओर रात में वहीं रहता भी था।

जब मैं बिल्लू दा के साथ साईट पर पहुँचे तो अंदर से जोर जोर से गाने की आवाज आ रही थी, देखने पर पता लगा की गाना तो दिल बहादुर गा रहा था, अब कौनसा गा रहा था, ये तो नही पता पर एक लाइन जरूर समझ में आई, जिसमें दिल बहादुर कह रहा था, सुन लई छा ऐ हजूर, ये शायद नेपाली भाषा में था।

अचानक हमें देख दिल बहादुर चुप हो गया, हमनें उससे पूरा गीत गाने को कहा ओर उसने पहली बार बिना ना नुकुर किये पूरा गीत फिर सुना दिया।

बिल्लू दा ने उसे खुश होकर 100/- रुपये दिये ओर अच्छी सब्जी लाकर बनाने को कहा, फिर हम वहाँ से निकल लिये।

रास्ते में बिल्लू दा बोले आज दिल बहादुर पिन्नक ( नशे ) में था, तभी हमारे एक बार कहने पर दुबारा गाना गा कर सुना दिया, अगर पिन्नक (नशे ) में ना होता तो मरे ही ना सुनाता।

मुझे भी बिल्लू दा की बात में तंत नजर आया क्योकिं दिल बहादुर जैसा शर्मिला व्यक्ति, यूँ एक बार कहने में कैसे गा गया।

इस मेट कम्युनिटी के बारे में पता किया तो, पता चला की ये खाने पीने के काफी शौकीन होते हैं, दिन भर मेहनत मजदूरी करने के बाद रात को अच्छा खाते पीते हैं, ताकि शारारिक चुस्ती फुर्ती बनी रहे,ओर साल के आखिर में ये लोग अपने गाँवो की ओर निकल लेते हैं।

लोग चाहे इनसे ठीक व्यवहार नही करते दिखते, पर दिल बहादुर जैसे लोग ,आज भी पहाड़ की लाईफ लाइन मानी जाती है, पहाड़ी रास्तों पर भारी भरकम सामान लाने ले जाने के ये अभ्यस्त जो होते हैं।